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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog (509)

एक ही  सपना  हमारा  जी  हजूरी की जगह - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२

अब किसी के मुख न उभरे कातिलों के डर दिखें

इस वतन में हर तरफ खुशहाल सब के घर दिखें।१ ।



काम हासिल हो सभी को जैसा रखते वो हुनर

फैलते सम्मुख किसी के अब न यारो कर दिखें।२।



भाईचारा जब हो कहते हम सभी के बीच तो

आस्तीनों में छिपाये  लोग  क्यों खन्जर दिखें।३।



हौसला कायम रहे  यूँ सच बयानी का सदा

आईनों के सामने आते न अब पत्थर दिखें।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 26, 2018 at 10:51am — 3 Comments

तिजारत वो  चुनावों  में  हमेशा  वोट  की करते - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' ( गजल)

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२

हुआ कुर्सी का अब तक भी नहीं दीदार जाने क्यों

वो सोचें  बीच  में  जनता  बनी  दीवार  जाने क्यों।१।



बड़ा ही भक्त है या  फिर  जरूरत वोट पाने की

लिया करता है मंदिर नाम वो सौ बार जाने क्यों ।२।



तिजारत वो  चुनावों  में  हमेशा  वोट  की करते

हकों की बात भी लगती उन्हें व्यापार जाने क्यों ।३।



नतीजा एक भी अच्छा नहीं जनता के हक में जब

यहाँ सन्सद…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 21, 2018 at 3:35pm — 12 Comments

घुटन के इन दयारों में तनिक परिहास बढ़ जाये - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

छलकते देख कर आँसू ग़मों की प्यास बढ़ जाये

कभी ऐसा भी मौसम हो चुभन की आस बढ़ जाये।१।



लगे ठोकर किसी को भी न चाहे घाव खुद को हो

मगर देखें तो दिल में दर्द का अहसास बढ़ जाये।२।



भला कब चाहते  हैं  ये  जिन्हें  हम  शूल कहते हैं

मिटे पतझड़ चमन का साथ ही मधुमास बढ़ जाये।३।



लगाई नफरतों  ने  है  यहाँ  हर सिम्त ही बंदिश

घुटन के इन दयारों में तनिक परिहास बढ़ जाये।४।



रखो ये ज्ञान भी यारो जो चाहत घुड़सवारी की

नहीं घोड़ा सँभलता है अगर जो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 12, 2018 at 12:36pm — 6 Comments

ओढ़े बुढ़ापा  जी  रहा  बचपन कोई न हो - ( गजल)- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१ २१२१/२२२/१२१२



घर में किसी के और अब अनबन कोई न हो

सूना  पड़ा  हमेशा   ही  आगन  कोई   न  हो।१।



कुछ  तो  सहारा  दो  उसे  हँसने  जरा लगे

होकर निराश  घुट  रहा  जीवन  कोई न हो।२।



झुकना पड़े तनिक तो खुद झुकना सदा ही तुम

यारो  मिलन  की  राह  में  उलझन  कोई न हो।३।



आओ बनायें आज फिर ऐसा समाज हम

ओढ़े बुढ़ापा  जी  रहा  बचपन कोई न हो।४।



जल जाएँ…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 4, 2018 at 12:22pm — 14 Comments

अपना तो फर्ज एक है तदबीर कर गुजर - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर" ( गजल )

221   2121   1221   212 

तुमको खबर है खूब खतावार कौन है

दो सोच कर सजाएँ गुनहगार कौन है।१।



यारो सिवा वो बात के करता ही कुछ नहीं

हाकिम से इसके बाद भी बे-ज़ार कौन है।२।



हम तो रहे जहीन कि जिस्मों पे मर मिटे

पहली नज़र का बोल तेरा प्यार कौन है।३।



सबसे बड़ा सबूत है मुंसिफ का फैसला

खाके कसम वफा की वफादार कौन है।४।



अपना तो फर्ज एक है तदबीर कर…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 25, 2018 at 1:14pm — 6 Comments

हुस्न तेरी आशिकी से कौन रखता दूरियाँ - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर" ( गजल )

२१२२/ २१२२/ २१२२/२१२

आप कहते पंछियों के , 'हमने पर कतरे नहीं'

आँधियों के सामने फिर क्यों भला ठहरे नहीं।१।



जो भी देखा उस पे उँगली झट उठा देता है तू

क्यों कहा करता जमाने ख्वाब पर पहरे नहीं।२।



एक जुगनू ही बहुत है वक्त की इस धुंध में

साथ देने  चाँद  सूरज  गर  यहाँ उतरे नहीं।३।



आईना वो बनके  चल  तू  पत्थरों के शहर में

जिन्दगी की शक्ल जिसमें टूटकर बिखरे…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 16, 2018 at 7:34pm — 8 Comments

जलूँ  कैसे  तुम्हारे बिन - लक्ष्मण धामी"मुसाफिर" ( गजल )

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२

अकेला हार जाऊँगा, जरा तुम साथ आओ तो

अमा की रात लम्बी है कोई दीपक जलाओ तो।१।



ये बाहर का अँधेरा तो  घड़ी भर के लिए है बस

सघन तम अंतसों में जो उसे आओ मिटाओ तो।२।



कहा बाती  मुझे  लेकिन  जलूँ  कैसे  तुम्हारे बिन

भले माटी, स्वयं को अब चलो दीपक बनाओ तो।३।



गरीबी, भूख,  नफरत, वासनाओं  का मिटेगा तम

इन्हें जड़ से मिटाने को सभी नित कर बटाओ तो।४।



महज दस्तूर को दीपक जलाते इस अमा को सब

बने हर जन…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 7, 2018 at 7:36am — 13 Comments

कहीं हद तोड़ कर तट भी अगर मझधार हो जाता - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२



किसी की बद्दुआ  से  गर  कोई  बीमार हो जाता

दुआ सा आखिरी वो भी बड़ा हथियार हो जाता।१।



ललक से धन की थोड़ा भी कहीं दो चार हो जाता

कसम से आईना भी तब महज अखबार हो जाता।२।



घड़ी भर को ही हमदम का अगर दीदार हो जाता

सुकूँ से मरने  का  यारो  तनिक  आधार हो जाता।३।



कहानी प्यार की  अपनी  किनारे  लग कहाँ पाती

कहीं हद तोड़ कर तट भी अगर मझधार हो जाता।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 3, 2018 at 6:00am — 20 Comments

कहो थोड़ा किसी को कुछ तो पत्थर ले के दौड़े है -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२

सरल सा रिश्ता भी अब तो चलाना हो गया टेढ़ा

वफा  तुझ में  नहीं  बाकी  बताना  हो  गया टेढ़ा।१।



मुहर मुंसिफ  लगा  बैठे  सही  अब बेवफाई भी

कि बन्धन सात  फेरों  का निभाना हो गया टेढ़ा।२।



कहो थोड़ा किसी को कुछ तो पत्थर ले के दौड़े है

किसी  को  आईना  जैसे  दिखाना  हो  गया  टेढ़ा।३।



बुढ़ापा गर धनी हो  तो निछावर हुस्न है उस पर

हुनर  से …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 30, 2018 at 5:30am — 20 Comments

दोनों तरफ है कत्ल का सामान बा-अदब -- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर" ( गजल )

२२१/ २१२१/ १२२१/ २१२

वाजिब हुआ करे था जो तकरार मर गया

आजाद जिन्दगी  में  भी  इन्कार मर गया।१।



दोनों तरफ है  कत्ल  का  सामान बा-अदब  

इस पार बच गया था जो उस पार मर गया।२।



जीने लगे  हैं  लोग  यहाँ  खुल  के नफरतें

साँसों की जो महक था वही प्यार मर गया।३।



सौदा वतन का रोज ही शासक यहाँ करें

सैनिक ही नाम  देश  के बेकार मर गया।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 27, 2018 at 9:00pm — 21 Comments

इस  बार  तेरे  शहर  में  परछाइयाँ जलीं - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"(गजल)

२२१/२१२१/१२२१/२१२

सुनते हैं खूब न्याय  की  सच्चाइयाँ जलीं

कैसा अजब हुआ है कि अच्छाइयाँ जलीं।१।



वर्षों पुरानी बात है जिस्मों का जलना तो

इस  बार  तेरे  शहर  में  परछाइयाँ जलीं।२।



कितने हसीन ख्वाब  हुये खाक उसमें ही

ज्वाला में जब दहेज की शहनाइयाँ जलीं।३।



सब कुछ यहाँ जला है, तेरी बात से मगर

हाकिम कभी वतन में न मँहगाइयाँ जलीं।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 25, 2018 at 2:30am — 18 Comments

दर्द का आँखों में सबकी - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर' ( गजल )

२१२२ /२१२२  /२१२२/ २१२

दर्द का आँखों में सबकी इक समंदर कैद है

चार दीवारी में हँसता आज हर घर कैद है।१।



हो न जाये फिर वो हाकिम खूब रखना ध्यान तुम

जिसके  सीने  में  नहीं  दिल  एक  पत्थर  कैद है।२।



जब से यारो ये सियासत हित परस्ती की हुयी

हो गया  आजाद  नेता  और  अफसर कैद है।३।



राज्य कैसा राम का यह ला रहे ये देखिये

बंदिशों से मुक्त रहजन और रहबर कैद…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 24, 2018 at 7:30am — 18 Comments

राजनीति के दोहे - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

नेताओं की मौज है, राजनीति के गाँव

छाले लेकर घूमती, जनता दोनों पाँव।१।



सत्ता  बाहर  सब  करें, यूँ  तो  हाहाकार

पर मनमानी नित करें, बनने पर सरकार।२।



जन की चिंता कब रही, धन की चिंता छोड़

कौन  मचाये  लूट  बढ़, केवल  इतनी  होड़।३।



कत्ल,डैकेती,अपहरण, करके लोग हजार

सिखा रहे हैं  देश  को, हो  कैसा व्यवहार।४।



साठ बरस पहले जहाँ, मुद्दा रहा विकास

आज वही संसद करे, बेमतलब बकवास।५।



राजनीति में आ बसे, अब तो खूब…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 17, 2018 at 1:04pm — 4 Comments

दुख बयानी है गजल - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२२/२१२

अब न केवल प्यार की ही दुख बयानी है गजल

भूख गुरबत जुल्म की भी अब कहानी है गजल।१।



कल तलक लगती रही जो बस गुलाबों का बदन

अब पलाशों की  उफनती  धुर जवानी है गजल।२।



वो जमाना और था जब जुल्फ लब की थी कथा

माँ पिता के प्यार की  भी  अब निशानी है गजल।३।



पंछियों की चहचहाहट  फूल की मुस्कान भी

गीत गाती एक नदी की ज्यों रवानी है…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 14, 2018 at 3:30pm — 23 Comments

गजल कहें - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/ १२२१/२१२



दिल से चिराग दिल का जलाकर गजल कहें

नफरत का तम जहाँ से मिटाकर गजल कहें।१।



पुरखे  गये   हैं   छोड़   विरासत   हमें   यही

रोते  हुओं  को   खूब  हँसाकर  गजल  कहें।२।



कोई न कैफियत है अभी जलते शहर को

आओ धधकती आग बुझाकर गजल कहें।३।



रखता नहीं  वजूद  ये  वहशत  का देवता

सोया जमीर खुद का जगाकर गजल कहें।४।



बैठा दिया दिलों में सियासत ने…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 8, 2018 at 6:34am — 14 Comments

जीवन में लड़ाते हैं क्यों यार गड़े मुर्दे - गजल

२२१/१२२२/२२१ /१२२२



इस द्वार  गड़े  मुर्दे  उस  द्वार गड़े मुर्दे

जीवन में लड़ाते हैं क्यों यार गड़े मुर्दे।१।



हर बार नया  मुद्दा  पैदा तो नहीं होता

देते हैं  सियासत  को  आधार गड़े मुर्दे।२।



मौसम है चुनावी क्या राहों में खड़ा यारो

लेने जो  लगे  हैं  फिर  आकार  गड़े मुर्दे।३।



भाता नहीं जिनको भी याराना जमाने में

लड़ने  को  उखाड़ेंगे  दो  चार  गड़े  मुर्दे ।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 20, 2018 at 10:00am — 16 Comments

क्या मन है बीमार पड़ौसी - गजल - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२२२/२२२२



खाता क्यों है खार पड़ौसी

क्या मन है बीमार पड़ौसी।१।



इतनी जल्दी भूल गया क्यों

बचपन के हम यार पड़ौसी।२।



सच जाने पर खूब करे क्यों

बेमतलब  तकरार  पड़ौसी।३।



जो कहना है सम्मुख कह दे

मत कर  पीछे  वार पड़ौसी।४।



जबरन हम तो नहीं घुसेंगे

क्यों ढकता है द्वार पड़ौसी।५।



लड़ना भिड़ना पागलपन है

इसमें सब की हार…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 19, 2018 at 12:02am — 16 Comments

बरबादियाँ ही सब तरफ आती हैं इससे बस - गजल

221 2121 222 1212



हाकिम ही  देश लूट के जब यूँ  फरार हो

ऐसे में किस पे किस तरह तब ऐतबार हो।१।



रूहों का दर्द बढ़ के जब जिस्मों को आ लगे

बातों  से  सिर्फ  बोलिए  किसको  करार हो।२।



इनकी तो रोज ऐश  में  कटती है खूब अब

क्या फर्क इनको रोज ही जनता शिकार हो।३।



हर शख्श जब तलाश में अवसर की लूट के

हालत में देश की  भला  फिर क्या सुधार हो ।४।



मुट्ठी में सबको चाहिए पलभर में चाँद भी

मंजिल के  बास्ते  किसे  तब  इन्तजार हो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 13, 2018 at 4:56am — 13 Comments

मालिक वतन के  भूख  से - गजल - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/ २१२१ /२२२/१२१२

हर शख्स जो भी दूर से भोंदू दिखाई दे

देखूँ करीब से  तो  वो  चालू  दिखाई दे।१।



अब तो हवा भी कत्ल का सामान हो रही

लाज़िम नहीं कि  हाथ  में चाकू दिखाई दे।२।



मालिक वतन के  भूख  से  मरते रहे यहाँ

सेवक की तस्तरी में नित काजू दिखाई दे।३।



सच तो यही कि जग में है मन से फकीर जो

सोना  भी  उसको  दोस्तो  बालू  दिखाई दे।४।…



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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 10, 2018 at 9:01pm — 6 Comments

शिक्षक दिवस के दोहे - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

शिक्षक दिवस के दोहे



बनते शिष्य महान तब, शिक्षक अगर महान

शिक्षक बिन हर इक रहा, अधकचरा इन्सान।१।



जिसने जीवन  भर किया, शिक्षक  का सम्मान

जग ने उसका  है  किया, इत उत  बड़ा बखान।२।



शिक्षक थोड़ा  सा  अगर,  दे  दे जो उत्साह

भटका बालक चल पड़े, सदा सत्य की राह।३।



पथ की बाधा नित हरी, जिसने राह बुहार

दे थोड़ा सा मान कर, शिक्षक का आभार।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 4, 2018 at 9:00pm — 9 Comments

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