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गजल कहें - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/ १२२१/२१२


दिल से चिराग दिल का जलाकर गजल कहें
नफरत का तम जहाँ से मिटाकर गजल कहें।१।


पुरखे  गये   हैं   छोड़   विरासत   हमें   यही
रोते  हुओं  को   खूब  हँसाकर  गजल  कहें।२।


कोई न कैफियत है अभी जलते शहर को
आओ धधकती आग बुझाकर गजल कहें।३।


रखता नहीं  वजूद  ये  वहशत  का देवता
सोया जमीर खुद का जगाकर गजल कहें।४।


बैठा दिया दिलों में सियासत ने मैल कुछ
गंगा में फिर से  यार  नहाकर गजल कहें।५।


मिलजुल के रहना साथ  है तहजीब दोस्तो
सदियों की जो है रीत निभाकर गजल कहें।६।


हमको गजल का ठीक से आया न ककहरा
रखते अधिक हुनर हैं जो आकर गजल कहें।७।

****
मौलिक अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 14, 2018 at 3:00pm

आ. भाई बृजेश जी, स्नेह के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 14, 2018 at 2:59pm

आ. भाई अजय जी, सादर अभिवादन । गजल की प्रशंसा के लिए आभार।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 11, 2018 at 11:31am

वाह आदरणीय क्या ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है...

Comment by Ajay Tiwari on October 10, 2018 at 5:18pm

आदरणीय लक्ष्मण जी, खूबसूरत अशआर हुए हैं. हार्दिक बधाई. 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 9, 2018 at 11:13am

आ. भाई बसंत जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 9, 2018 at 11:00am

आ. भाई नवीन जी, सादर अभिवादन ।गजल की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 9, 2018 at 10:34am

आ0 मुसाफ़िर साहब अप्रतिम ग़ज़ल के लिए बधाई । हर शेर लाजवाब ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 9, 2018 at 10:20am

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी शुभ प्रभात, वाह लाजबाब गजल हुई है बहुत बहुत बधाई आपको 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 8, 2018 at 7:07pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 8, 2018 at 7:05pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । स्नहाशीष के लिए आभार ।

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