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एक ही  सपना  हमारा  जी  हजूरी की जगह - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२

अब किसी के मुख न उभरे कातिलों के डर दिखें
इस वतन में हर तरफ खुशहाल सब के घर दिखें।१ ।


काम हासिल हो सभी को जैसा रखते वो हुनर
फैलते सम्मुख किसी के अब न यारो कर दिखें।२।


भाईचारा जब हो कहते हम सभी के बीच तो
आस्तीनों में छिपाये  लोग  क्यों खन्जर दिखें।३।


हौसला कायम रहे  यूँ सच बयानी का सदा
आईनों के सामने आते न अब पत्थर दिखें।४।


एक ही  सपना  हमारा  जी  हजूरी की जगह
काम को तरजीह देते रोज अब अफसर दिखें।५।


हो गये सत्तर बरस आजाद होकर जब चमन
देश के हालात कुछ तो अब हमें बेहतर दिखें।६।


मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by PHOOL SINGH on December 28, 2018 at 2:26pm

वक्त से मेल खाती एक रचना बधाई स्वीकारें

Comment by Samar kabeer on December 27, 2018 at 8:30pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'अब किसी के मुख न उभरे कातिलों के डर दिखें'

इस मिसरे में 'मुख न उभरे' का अर्थ शायद चहरे पर,है? लेकिन रदीफ़ का बहुवचन मुझे कुछ खटक रहा है,मुमकिन है मैं समझ नहीं सका,कृपया थोड़ा सा स्पष्ट कर दें ।


'हो गये सत्तर बरस आजाद होकर जब चमन'

इस मिसरे का शिल्प मुझे कमज़ोर लग रहा है?

Comment by राज़ नवादवी on December 26, 2018 at 4:16pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी साहब, आदाब. सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे दाद के साथ मुबारकबाद. सादर. 

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