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तिजारत वो  चुनावों  में  हमेशा  वोट  की करते - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' ( गजल)

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२

हुआ कुर्सी का अब तक भी नहीं दीदार जाने क्यों
वो सोचें  बीच  में  जनता  बनी  दीवार  जाने क्यों।१।


बड़ा ही भक्त है या  फिर  जरूरत वोट पाने की
लिया करता है मंदिर नाम वो सौ बार जाने क्यों ।२।


तिजारत वो  चुनावों  में  हमेशा  वोट  की करते
हकों की बात भी लगती उन्हें व्यापार जाने क्यों ।३।


नतीजा एक भी अच्छा नहीं जनता के हक में जब
यहाँ सन्सद में  होती  है  महज  तक़रार जाने क्यों।४।


बहुत बढ़चड़ के करते हैं चुनाओं में सभी नेता
हुआ करते नहीं  वादे  मगर  साकार जाने क्यों।५।


बिना  कुर्सी  के   उम्मीदें   जताते   देश  बदलेंगे
मगर कुर्सी को पाकर सब हुए लाचार जाने क्यों।६।


मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 25, 2018 at 7:35pm

आ. भाई राजनवादवी जी, हार्दिक आभार ।

Comment by राज़ नवादवी on December 25, 2018 at 4:07pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी साहब, आदाब. सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें. सादर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 25, 2018 at 3:39pm

आ. भाई नवीन जी, गजल पर उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 25, 2018 at 3:38pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद । हक के बहुवचन की त्रुटि का ज्ञान कराने के लिए आभार । बदलाव का प्रयास करता हूँ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 25, 2018 at 3:32pm

आ. भाई बृजेश जी, प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on December 22, 2018 at 5:54pm

बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई आदरणीय हार्दिक बधाई आपको । यह तो मैं भी कबीर सर की इस्लाह से जान पाया हक का बहुबचन हकूक है । धन्य हैं गुरुदेव ।

Comment by Samar kabeer on December 22, 2018 at 3:52pm

जनाब लक्षण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

एक बात आपके संज्ञान में लाना चाहूँगा:-

' 

हकों की बात भी लगती उन्हें व्यापार जाने क्यों '

इस मिसरे में 'हकों' शब्द ग़लत है 'हक़' शब्द का बहुवचन होता है "हक़ूक़" ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 22, 2018 at 12:26pm

वाह जी वाह आदरणीय खूब ग़ज़ल कही है..

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 22, 2018 at 6:07am

आ. भाई दयाराम जी, सादर अभिवादन । गजल की प्रशंसा के लिये हार्दिक धन्यवाद । सन्सद शुद्ध रूप ही है ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 22, 2018 at 6:04am

आ. भाई गोपाल नारायण जी, सादर अभिवादन । लम्बे अंतराल के बाद उपस्थिति और स्नेह से अनुग्रहित करने के लिए आभार ।

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