For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

उसके हिस्से में क्यों रास्ता कम है- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२/२१२/२१२ /२२

जिसका अपना यहाँ दायरा कम है
आसमाँ को भी  वो  मानता कम है।१।
*
मुझसे कहता है क्यों पूजता कम है
देख तुझ  में  भी  तो  देवता कम है।२।
*
जो  ठहरना  नहीं  चाहता  साथी
उसके हिस्से में क्यों रास्ता कम है।३।
*
बात औरों के सिर डालकर देखो
अपने  ईमान  को  तौलता कम है।४।
*
पास  बैठा  है  लेकिन  अबोला  ही
कौन कहता है अब फासला कम है।५।
*
हर बुराई  यहाँ  मिट  तो  जायेगी
अच्छे लोगो में पर हौसला कम है।६।
*
नींद इस को भले ढब नहीं आती
देश अपना  मगर  जागता कम है।७।


(१५-७-२१)
मौलिक अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

Views: 1064

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 1, 2021 at 5:55am

आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन । लम्बे अंतराल के बाद आपकी उपस्थिति से हर्षित हूँ। आपकी व भाई समर जी की बात समझ गया हूँ । आप लोगों से बहुत कुछ सीखने को मिला है और मिलता रहेगा यही आस है। स्नेह व मार्गदर्शन के लिए सादर आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 1, 2021 at 5:51am

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। गजल पर पुनः उपस्थिति और मार्गदर्शन के लिए आभार। आपकी समझाइस समझ गया हूँ । बदलाव का दोनों रूप में प्रयास करता हूँ । सादर.. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 1, 2021 at 12:24am

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी, प्रस्तुति पर बधाई स्वीकारें. 

किंतु, आदरणीय समर साहब के बहर पर कहे का समर्थन मैं भी करूँगा. पंक्तियों का विन्यास मान्य बहर के अनुसार होना उचित होता है.

या फिर, छांदसिक विन्यासों पर ग़ज़ल कही जा सकती है. कहें.

शुभ-शुभ

Comment by Samar kabeer on July 30, 2021 at 2:45pm

//मैं जानना चाह रहा था कि क्या इसी बह्र को किसी अन्य बह्र के रूप में लिखा जा सकता है, बिना शब्द जोड़े घटाए ?//

भाई, 212 212 212 212 ये अरकान बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालिम के हैं, इसके अंतिम रुक्न 212 को ज़िहाफ़ लगा कर 212 की जगह 2(फ़ा) कर सकते हैं,यानी इसे 212 212 212 2 कर सकते हैं, इससे अधिक की गुंजाइश नहीं है,विस्तार से जानने के लिये फ़ोन पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 30, 2021 at 12:54pm

आ. भाई समर जी,सादर अभिवादन । गजल पर पुनः उपस्थिति और सराहना के लिए धन्यवाद।

लेकिन मैं जानना चाह रहा था कि क्या इसी बह्र को किसी अन्य बह्र के रूप में लिखा जा सकता है, बिना शब्द जोड़े घटाए ?

सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 30, 2021 at 12:49pm

आ. भाई सालिक गणवीर जी,सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 30, 2021 at 12:48pm

आ. भाई चेतन जी,सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए धन्यवाद।

Comment by Samar kabeer on July 24, 2021 at 8:17pm

//क्या इस बह्र को किसी और प्रचलित बह्र में बदला जा सकता है?//

बिल्कुल बदला जा सकता है, आपका मतला देखें:-

'जिसका अपना यहाँ दायरा कम है
आसमाँ को भी  वो  मानता कम है'

अब आपके इस मतले को हम 2122 1212 22/112 पर ऐसे कर सकते हैं:-

'जिसका अपना ही दायरा कम है

आसमाँ को वो देखता कम है'

बस इसी तरह हर शैर को इस बह्र में ढाल सकते हैं ।

Comment by सालिक गणवीर on July 24, 2021 at 11:24am

भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी

सादर अभिवादन

अच्छी  ग़ज़ल  हुई है, बधाई स्वीकार करें

Comment by Chetan Prakash on July 21, 2021 at 7:56pm

अच्छी  ग़ज़ल  हुई है, भाई 'मुसाफिर,  ! लेकिन  चौथा शैर , बात औरों के सिर डाल कर देखो  / अपने ईमान को तौलता  कम है " में  रब्त का अभाव है, सादर  

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

amita tiwari posted a blog post

गर्भनाल कब कट पाती है किसी की

कहीं भी कोई भी माँ अमर तो नहीं होती एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को फिर भी जानते बूझते भी…See More
2 hours ago
vijay nikore commented on Sushil Sarna's blog post दोहा दशम. . . . . उम्र
"भाई सुशील जी, सारे दोहे जीवन के यथार्थ में डूबे हुए हैं.. हार्दिक बधाई।"
7 hours ago
vijay nikore posted a blog post

प्यार का पतझड़

एक दूसरे में आश्रय खोजतेभावनात्मक अवरोधों के दबाव मेंकभी ऐसा भी तो होता है ...समय समय से रूठ जाता…See More
14 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"प्रारम्भ (दोहे) अंत भला तो सब भला, कहते  सब ये बात। क्या आवश्यक है नहीं, इक अच्छी…"
Sunday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"आदरणीय  जयहिंद रायपुरी जी अच्छा हायकू लिखा है आपने. किन्तु हायकू छोटी रचना है तो एक से अधिक…"
Sunday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"हाइकु प्रारंभ है तो अंत भी हुआ होगा मध्य में क्या था मौलिक एवं अप्रकाशित "
Saturday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"स्वागतम"
Friday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185

आदरणीय साहित्य प्रेमियो,जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Apr 8
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद ' जी सादर अभिवादन प्रथम तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ देरी से आने की…"
Apr 7
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा दशम. . . . . उम्र

दोहा दशम् . . . . उम्रठहरी- ठहरी उम्र अब, करती एक सवाल ।कहाँ गई जब जिंदगी, रहती थी खुशहाल ।।यादों…See More
Apr 6
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
Apr 3
आशीष यादव added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
Thumbnail

चल मन अब गोकुल के धाम

चल मन अब गोकुल के धाम अद्भुत मनहर बाल रूप में मिल जाएंगे श्याम कि चल मन अब……………………….कटि करधनी शीश…See More
Apr 3

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service