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हमको समझ नहीं-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२


कहते है लोग प्रीत  की  हमको समझ नहीं
दुश्मन के साथ मीत की हमको समझ नहीं।१।
*
नफरत ही नित्य बँट  रही  सरकार इसलिए
आँगन में उठती भीत की हमको समझ नहीं।२।
*
न्योतो  न  आप  मंच  से  महफिल  बिगाड़ने
कविता गजल या गीत की हमको समझ नहीं।३।
*
हम ने सदा  ही  धूप  का  रस्ता  बुहारा  पर
रिश्तों में पसरी शीत की हमको समझ नहीं।४।
*
समझा नहीं है  खेल  मुहब्बत  को इसलिए
इस में ही हार जीत की  हमको समझ नहीं।५।
*
यूँ तो समूचे जग  का  चलन सीखा यार पर
क्योंकर स्वयं के रीत की हमको समझ नहीं।६।
*
हस्ती हमारी मिट के ही इक दिन रहेगी फिर
कुछ भी अगर अतीत की हमको समझ नहीं।७।


(२२-७-२१)
मौलिक /अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 31, 2021 at 9:59pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति व स्नेह के लिए आभार। 

Comment by TEJ VEER SINGH on July 31, 2021 at 6:18pm

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी। बहुत सुन्दर ग़ज़ल ।

नफरत ही नित्य बँट  रही  सरकार इसलिए
आँगन में उठती भीत की हमको समझ नहीं।२।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 30, 2021 at 12:46pm

आ. भाई समर जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by Samar kabeer on July 26, 2021 at 6:36pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

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