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ओढ़े बुढ़ापा  जी  रहा  बचपन कोई न हो - ( गजल)- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१ २१२१/२२२/१२१२


घर में किसी के और अब अनबन कोई न हो
सूना  पड़ा  हमेशा   ही  आगन  कोई   न  हो।१।


कुछ  तो  सहारा  दो  उसे  हँसने  जरा लगे
होकर निराश  घुट  रहा  जीवन  कोई न हो।२।


झुकना पड़े तनिक तो खुद झुकना सदा ही तुम
यारो  मिलन  की  राह  में  उलझन  कोई न हो।३।


आओ बनायें आज फिर ऐसा समाज हम
ओढ़े बुढ़ापा  जी  रहा  बचपन कोई न हो।४।


जल जाएँ जिसकी आग से मासूम बच्चियाँ
डूबा हवस में  इस  तरह  यौवन कोई न हो।५।


संसद में उनको  जाने  से  अब  के तो रोकिये
कोशिश है जिनकी और अब मंथन कोई न हो।६।


वारिस उन्हीं  के  आजकल  बस्ती  जला रहे
जिनको थी फिक्र आग में गुलशन कोई न हो।७।


हाकिम कोई तो ऐसा अब हमको खुदा तू दे
शासन में जिसके  लूटता  जनधन कोई न हो।८।

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' yesterday

आ. भाई फूल सिंह जी, गजल की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by PHOOL SINGH on Tuesday

सूंदर रचना

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Monday

आ. भाई आशुतोस जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on Sunday

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी ...इस सार्थक ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई सादर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 6, 2018 at 9:08pm

आ. भाई छोटेलाल जी, गजल की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 6, 2018 at 9:07pm

आ. भाई राज नवादवी जी, प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on December 6, 2018 at 4:18pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी साहब बेहतरीन गजल के लिए बहुत बहुत बधाई

Comment by राज़ नवादवी on December 5, 2018 at 10:03pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए  दाद के साथ मुबारकबाद. सादर.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 5, 2018 at 6:37pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । गजल की प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 5, 2018 at 6:35pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति, प्रशंसा व मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद ।

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