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ग़ज़ल (क्या नसीब है)

2212 /1212 /2212 /12

क्या आरज़ू थी दिल तेरी और क्या नसीब है

चाहा था  टूट कर  जिसे वो अब  रक़ीब  है।

पलकों की छाँव थी जहाँ है ग़म की धूप अब

वो  भी   मेरा  नसीब  था  ये  भी  नसीब  है।

ऐसे  बदल   गये   मेरे   हालात   क्या   कहूँ

अब  चारा-गर  कोई  न  ही  कोई  तबीब है। 

कैसे  मिले  ख़ुशी  हों  भला  दूर  कैसे  ग़म

मुश्किल  कुशा  के  साथ वो  मेरा रक़ीब है।

उसने  बड़े  ही  प्यार  से  बर्बाद  कर …

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on July 6, 2020 at 2:16pm — 11 Comments

न इतने सवाल कर- ग़ज़ल

मापनी 

२२१२ १२१२ ११२२ १२१२ 

 

प्यारी सी ज़िंदगी से न इतने सवाल कर,

जो भी मिला है प्यार से रख ले सँभाल कर. 

 

तदबीर के बग़ैर  तो मिलता कहीं न कुछ, 

सब ख़ाक हो गए यहाँ सिक्का उछाल कर.

 …

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 6, 2020 at 11:30am — 12 Comments

मगर हम स्वेद के गायें - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

१२२२ × ४



कहीं पर भूख  पसरी  है  फटे कपड़े पुराने हैं

भला मैं कैसे कह दूँ ये सभी के दिन सुहाने हैं।१।

**

वो गायें गीत फूलों के जिन्हें गजरे सजाने हैं

मगर हम स्वेद के  गायें  हमें पत्थर उठाने हैं।२।

**

पुछें हर आँख से  आँसू  हमारा ध्येय इतना हो

न सोचो चन्द साँसों हित यहाँ सिक्के कमाने हैं।३।

**

बसाना हो तो दुश्मन का बसा दो चाहे पहले पल

पहल अपने से ही  करना  अगर घर ही जलाने…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 6, 2020 at 8:30am — 7 Comments

ख़्वाबों के रेशमी धागों से .......

ख़्वाबों के रेशमी धागों से .......

कितना बेतरतीब सा लगता है

आसमान का वो हिस्सा

जो बुना था हमने

मोहब्बत के अहसासों से

ख़्वाबों के रेशमी धागों से

ढक गया है आज वो

कुछ अजीब से अजाबों से

शफ़क़ के रंग

बड़े दर्दीले नज़र आते हैं

बेशर्म अब्र भी

कुछ हठीले नज़र आते हैं

उल्फ़त की रहगुज़र पर शज़र

कुछ अफ़सुर्दा से नज़र आते हैं

हाँ मगर

गुजरी हुई रहगुज़र के किनारों पर

लम्हों के मकानों में

सुलगते अरमान

हरे नज़र आते…

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Added by Sushil Sarna on July 5, 2020 at 9:32pm — 2 Comments

अहसास की ग़ज़ल: मनोज अहसास

22  22   22  22  22  2

मेरे दिल का बोझ किसी दिन हल्का हो.

मिल ले तू इक बार अगर मिल सकता हो.

मुझको लगता है तू मुझको भूल गया,

तेरे मन में भी शायद कुछ धोखा हो.

तेज तपन के साथ है सूरज अब सर पर,

मेरी दुआ है तेरे सर पर कपड़ा हो.

मैं तुझको खुद में शामिल कैसे रक्खूँ,

तेरे नाम के आगे जब कुछ लिक्खा हो.

अब तो अपनेपन की तुझमें बात नहीं,

शायद तू अब मुझको ग़ैर समझता हो.

छोटी सी एक बात बतानी थी…

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Added by मनोज अहसास on July 5, 2020 at 4:35pm — 2 Comments

क्यों ना जड़ पर चोट ?

पैसों से क्या जान को

हम पाएगें तोल ?

सदा - सदा को बुझ गए

जब चिराग़ अनमोल

किन-किन के थे वरद हस्त

जो पनपी यह खोट

खोज-खोज उनकी करें

क्यों ना जड़ पर चोट ?

इस बढ़ती विष बेल पर

यदि ना डली…

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Added by Usha Awasthi on July 4, 2020 at 5:50pm — 6 Comments

उमड़ता जब हृदय में प्यार कविता जन्म लेती है (११५ )

ग़ज़ल (1222 *4 )

.

उमड़ता जब हृदय में प्यार कविता जन्म लेती है 

प्रकृति जब जब करे शृंगार कविता जन्म लेती है 

***

नहीं देखा अगर जाये किसी से जुल्म निर्धन पर

बने संघर्ष जब आधार कविता जन्म लेती है 

***

हुआ विचलित अगर मन है किसी भी बात को लेकर

गलत जब हो नहीं स्वीकार कविता जन्म लेती है 

***

कभी पीड़ा हुई इतनी हुआ सहना जिसे…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on July 4, 2020 at 1:30pm — 6 Comments

अहसास की ग़ज़ल : मनोज अहसास

1222  1222  122

ज़माने भर में जितने हादसे हैं.

हमें ख़ामोश होकर देखने हैं.

किसी को चलने में दिक़्क़त न आए,

चलो इतना सिमट कर बैठते हैं.

मेरी बेबाकियों के रास्ते में,

मेरी कुछ ख़्वाहिशों के कटघरे हैं.

बिना जिसके हुआ था जीना मुश्किल,

उसी के होने से शिकवे गिले हैं.

तुम्हारी याद भी इक रोग है क्या,

तुम्हारे ख़त को छूते डर रहे हैं.

दलीले रह गई कमज़ोर मेरी,

वो अपनी बात कह कर जा चुके…

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Added by मनोज अहसास on July 3, 2020 at 8:55pm — 6 Comments

पीड़ा के दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

मन को इतना  दे  गये, अपने  ही अवसाद

नाम पते सड़कें गली, क्या रक्खें अब याद।१।

**

जीवन जिसको रेतघर, बादल क्या दे नीर

उसको तो हर हाल में, मिलनी है बस पीर।२।

**

भूखा बेघर रख रहा, क्या कम यहाँ अभाव

उस पर करता रात - दिन, मँहगाई पथराव।३।

**

थकन बढ़ी है पाँव की, छालों के आसार

मिले कहाँ आराम को, तरुवर छायादार।४।

**

भले उजाले का हुआ, बहुत जगत भर शोर

दीपक नीचे  क्यों  रहा, तमस  भरा घनधोर।५।

**

आँसू अपने  डाल  दो, उस आँचल में और

हर…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 3, 2020 at 7:09pm — 8 Comments

मौत से कह दो न रोके -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२१२२/२१२२/२१२२/२१२

लेके आया फिर से बचपन शायरी का सिलसिला

मौत से कह दो  न  रोके  जिन्दगी का सिलसिला।१।

**

रोक  तेजाबों  घुएँ  की  गन्दगी  का सिलसिला

इन हवाओं में भरो कुछ ताजगी का सिलसिला।२।

**

कोशिशें दस्तक  जो  देंगी  शब्द तोड़ेगे कभी

मौन की गहरी हुई इस तीरगी का सिलसिला।३।

**

हैं बहुत  कानून  अपनी  पोथियों  में  यूँ मगर

रुक न पाया भ्रष्ट होते आदमी का सिलसिला।४।

**

एक जुगनू ने कहा  ये  भर तमस के काल में

डर न तम से मैं रखूँगा…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 3, 2020 at 12:25pm — 10 Comments

चीन के नाम (नज़्म - शाहिद फ़िरोज़पुरी)

212  /  1222  /  212  /  1222

दुनिया के गुलिस्ताँ में फूल सब हसीं हैं पर

एक मुल्क ऐसा है जो बला का है ख़ुद-सर

लाल जिसका परचम है इंक़लाब नारा है

ज़ुल्म करने में जिसने सबको जा पछाड़ा है

इस जहान का मरकज़ ख़ुद को गो समझता है

राब्ता कोई दुनिया से नहीं वो रखता है

अपनी सरहदों को वो मुल्क चाहे फैलाना

इसलिए वो हमसायों से है आज बेगाना

बात अम्न की करके मारे पीठ में खंजर

और रहनुमा उसके झूट ही बकें दिन भर

इंसाँ की तरक़्क़ी…

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Added by रवि भसीन 'शाहिद' on July 3, 2020 at 1:00am — 10 Comments

पीपल वाला गाँव नहीं है-ग़ज़ल

मापनी 22 22 22 22

पंछी को अब ठाँव नहीं है,

पीपल वाला गाँव नहीं है.  

 

दिखते हैं कुछ पेड़ मगर,

उनके नीचे छाँव नहीं है.

 

लाती जो पिय का संदेशा, 

कागा की वह काँव नहीं है  

 …

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 2, 2020 at 5:19pm — 4 Comments

हिसाब-किताब— डॉO विजय शंकर।



उम्र साठ-सत्तर तक की ,

आदमी पांच पीढ़ियों से रूबरू हो लेता है।

देखता है , समझ लेता है कि

कौन कहाँ से चला , कहाँ तक पहुंचा ,

कैसे-कैसे चला , कहाँ ठोकर लगी , ,

कहाँ लुढ़का , गिरा तो उठा या नहीं उठा ,

और उठा तो कितना सम्भला।

कर्म , कर्म का फल , स्वर्ग - नर्क ,

कितना ज्ञान , विश्वास , सब अपनी जगह हैं।

हिसाब -किताब सब यहीं होता दिखाई देता है।

बस रेस में दौड़ने वालों को सिर्फ

लाल फीता ही दिखाई देता है।

मौलिक एवं अप्रकाशित…

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Added by Dr. Vijai Shanker on July 2, 2020 at 9:36am — 4 Comments

दोहा मुक्तक :

झूठा तन का आवरण, झूठी इसकी शान।
झूठी दम्भी श्वास का, सत्य सिर्फ़ अवसान।
किसने देखा जीव का, कैसा नभ में धाम -
इस जग में तो जीव का, अंतिम घट शमशान। (1)…

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Added by Sushil Sarna on July 1, 2020 at 9:30pm — No Comments

550 वीं रचना मंच को सादर समर्पित : सावनी दोहे :

गौर वर्ण पर नाचती, सावन की बौछार।

श्वेत वसन से झाँकता, रूप अनूप अपार।। १



चम चम चमके दामिनी, मेघ मचाएं शोर।

देख पिया को सामने, मन में नाचे मोर।।२



छल छल छलके नैन से, यादों की बरसात।

सावन की हर बूँद दे, अंतस को आघात।।३



सावन में प्यारी लगे, साजन की मनुहार।

बौछारों में हो गई, इन्कारों की हार।। ४



कोरे मन पर लिख गईं, बौछारें इतिहास।

यौवन में आता सदा, सावन बनकर प्यास।।५



भावों की नावें चलीं, अंतस उपजा प्यार।

बौछारों…

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Added by Sushil Sarna on June 30, 2020 at 9:30pm — 4 Comments

रिमझिम - रिमझिम बदरा बरसे

रिमझिम - रिमझिम बदरा बरसे

अजहूँ न आए पिया रे..

ये बदरा कारे - कजरारे 

बार- बार आ जाएँ दुआरे

घर आँगन सब सूना पड़ा रे

सूनी सेजरिया रे

रिमझिम....

तन-मन ऐसी अगन लगाए

जो बदरा से बुझे न बुझाए )

अब तो अगन बुझे तबही जब

आएँ साँवरिया रे

रिमझिम...

छिन अँगना छिन भीतर आऊँ

दीप बुझे सौ बार जलाऊँ

पिया हमारे घर आएगें

छाई अँधियारी रे

रिमझिम .....

मौलिक…

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Added by Usha Awasthi on June 30, 2020 at 9:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल ( जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी...)

(221 2121 1221 212)

जाना है एक दिन न मगर फिक्र कर अभी

हँस,खेल,मुस्कुरा तू क़ज़ा से न डर अभी

आयेंगे अच्छे दिन भी कभी तो हयात में

मर-मर के जी रहे हैं यहाँ क्यूँँ बशर अभी

हम वो नहीं हुज़ूर जो डर जाएँँ चोट से

हमने तो ओखली में दिया ख़ुद ही सर अभी

सच बोलने की उसको सज़ा मिल ही जाएगी 

उस पर गड़ी हुई है सभी की नज़र अभी

हँस लूँ या मुस्कुराऊँ , लगाऊँ मैं क़हक़हे

ग़लती से आ गई है ख़ुशी मेरे घर…

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Added by सालिक गणवीर on June 30, 2020 at 8:00am — 14 Comments

लोटा है साँप फिर से जो उसके कलेजे पर - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२१/२१२१/१२२१/२१२



पाँवों में  छाले  देख  के  राहें नहीं खिली

दिनभर थकन से चूर को रातें नहीं खिली।१।

**

सुनते हैं  खूब  रख  रहे  पहलू में अजनबी

यार ए सुखन से आपकी आँखें नहीं खिली।२।

**

थकते  न  थे  जो  दूरी  का  देते  उलाहना

उनकी ही मुझको देख के बाँछें नहीं खिली।३।

**

लोटा है साँप फिर से जो उसके कलेजे पर

कहता  है  कौन  घर  मेरे  रातें  नहीं खिली।४।

**

लाया करोना  दर्द  तो राहत भी साथ में

ताजी हवा में कौन सी साँसें नहीं…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 29, 2020 at 9:20am — 4 Comments

तुरंत ' के चन्द विरही दोहे(११४ )

'तुरंत ' के चन्द विरही दोहे

=======================

वर्षा लाई देश में , जगह जगह पर बाढ़ |

प्रिय तेरे दर्शन बिना , शुष्क गया आषाढ़ ||

**

इधर विरह में सांवरे , गात हो रहा पीत |

इस बारी भी क्या हुआ , काम न पूरा मीत ||

**

पशु-पक्षी भी कर रहे , पिय के साथ किलोल |

अँसुअन बारिश झेलते , मेरे रक्त कपोल ||

**

दिन कटता गृह कार्य में , कठिन काटनी रात |

पल सुधियों…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 28, 2020 at 3:30pm — 2 Comments

आँखों के सावन में ......

आँखों के सावन में ......

ओ ! निर्दयी घन

जाने कितनी

अक्षत स्मृतियों को

अपनी बूँदों में समेटे

तुम फिर चले आये

मेरे हृदय के उपवन में

शूल बनकर

क्यों

मेरे घावों की देहरी को

अपनी बूँदों की आहटों से

मरहम लगाने का प्रयास करते हो

बहुत रिस्ते हैं

ये

जब -जब बरसात होती है

बहुत याद आते हैं

मेरे भीगे बदन से

बातें करते

उसके वो मौन स्पर्श

वो छत की मुंडेर से

उसकी आँखों का…

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Added by Sushil Sarna on June 27, 2020 at 8:42pm — 8 Comments

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