For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,173)

ग़ज़ल : नासूर है ...

फ़िक्रमंदों का अज़ब दस्तूर है 
ज़िक्र हो बस फिक्र का मंज़ूर है
 
जो कभी इक शे'र कह पाया नहीं 
वो मयारी हो गया मशहूर है
 
जो किसी परचम तले आया नहीं
वो नहीं आदम भले मजबूर है
 
मोड़ औ नुक्कड़ ज़हां के देख लो 
ये कंगूरा  तो बहुत मगरूर है
 
चन्द साँसों का सिला जो ये मिला 
चौखटों की शान का मशकूर है
 
ये कसीदे शान में किस की…
Continue

Added by ASHVANI KUMAR SHARMA on May 15, 2011 at 1:30am — 9 Comments

एक गीत...

आप सभी ने मेरी ग़ज़लों को सराहा...धन्यवाद के साथ हिंदी का एक गीत आप सबके समक्ष रख रहा हूँ...आशा करता हूँ कि इसके लिए भी आप लोगों का आशीर्वाद मुझे पूर्ववत मिलेगा...

= सावन के अनुबंध =

सावन के अनुबंध...

            नयन संग सावन के अनुबंध..... 

रिश्तों की ये तपन कर गई, मन…

Continue

Added by डॉ. नमन दत्त on May 14, 2011 at 4:49pm — 4 Comments

कुछ पल

कुछ पल चलना चाहता हू मैं ,…
Continue

Added by Ravindra Koshti on May 14, 2011 at 1:30pm — 2 Comments

मेरी अपनी दो ग़ज़लें....

साथियो,

सादर वंदे,

मैं संगीत की साधना में रत उसका एक छोटा सा विद्यार्थी हूँ और कला एवं संगीत को समर्पित एशिया के सबसे प्राचीन " इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ " में एसोसिएट प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत हूँ...मुझे भी ग़ज़लें कहने का शौक़ है...मैं " साबिर " तख़ल्लुस से लिखता हूँ... अपनी लिखी दो ग़ज़लें आप सबकी नज़र कर रहा हूँ...नवाज़िश की उम्मीद के साथ......

 

= एक =

रूह शादाब कर गया कोई.…

Continue

Added by डॉ. नमन दत्त on May 14, 2011 at 9:00am — 13 Comments

एक आरजू

मेरी आवाज़ में कुछ ऐसा असर हो जाये !

याद  जिसको मै करूँ उसको खबर हो जाये !!


काश तशरीफ़…
Continue

Added by Hilal Badayuni on May 14, 2011 at 5:30am — 8 Comments

महीन रेशम की डोरी है ये.

mere dost sankalp sharma ki sagaye pe kuch bhav vyakat karne ki koshish mai ye gahzal huee hai. umeed hai aapko pasand ayegi ..



---



महीन रेशम की डोरी है ये, ना ज़ोर इस पे तुम आज़माना

जहाँ ज़रूरत हो जीतने की, बस यूँ ही करना तुम हार जाना



न देखना एक दूसरे को...... भले ही आँखों मे प्यार क्यूँ हो

जो देखना हो, वो साथ देखो बस इक तरफ ही नज़र उठाना



कभी जो जाओगे बृंदावन तो बुलाना राधा ही राधा उसको

कन्हिया जो हो कहाना खुद तो, हां कान्हा जैसे नज़र… Continue

Added by vikas rana janumanu 'fikr' on May 13, 2011 at 1:00pm — 9 Comments

GAZAL by AZEEZ BELGAUMI

ग़ज़ल 



अज़ीज़ बेलगामी



हर शब ये फ़िक्र चाँद के हाले कहाँ गए

हर सुबह ये खयाल उजाले कहाँ गए



अब है शराब पर या दवाओं पे इन्हेसार

जो नींद बख्श दें वो निवाले कहाँ गए



वो इल्तेजायें मेरी तहज्जुद की क्या हुईं

थी अर्श तक रसाई, वो नाले कहाँ गए



मंजिल पे आप धूम मचाने लगे जनाब

मुझ को ये फ़िक्र, पांव के छाले कहाँ गए



दस्ते कलम में आज भी अखलाक सोज़ियाँ

किरदारसाज थे जो रिसाले, कहाँ गए



गुलशन के बीच खिलने लगे…
Continue

Added by Azeez Belgaumi on May 13, 2011 at 10:11am — 16 Comments

शाया हो गया

जो  कहा,वो,कह न पाया हो गया 
शब्द का सब अर्थ जाया हो गया
 
आदमी अब इक अज़ब सी शै बना 
आज अपना कल पराया हो गया
 
बाप उस दिन दो गुना ऊंचा हुआ 
जब कभी बेटा सवाया हो गया
 
ज़िन्दगी दी और सिक्के पा लिए 
सब कमाया बिन कमाया हो गया
 
जब दिमागों की सड़न देखी गयी
आसमां तक बजबजाया हो गया
 
कल नये रंगरूट सा भर्ती हुआ
चार दिन…
Continue

Added by ASHVANI KUMAR SHARMA on May 13, 2011 at 6:00am — 5 Comments

सामयिक गीत : देश को वह प्यार दे दो... ----संजीव 'सलिल'

सामयिक गीत :

देश को वह प्यार दे दो...

संजीव 'सलिल'

*

रूप को अब तक दिया जो,

देश को वह प्यार दे दो...



इसी ने पाला हमें है.

रूप में ढाला हमें हैं.

हवा, पानी रोटियाँ दीं-

कहा घरवाला हमें है.



यह जमीं या भू नहीं है,

सच कहूँ माता मही है.

देश हित हो ज़िंदगी यह-

देश पर मरना सही है.



आँख के सब स्वप्न दे दो,

साँस का सिंगार दे दो...

*

देश हित विष भी पियें हम.

देश पर मरकर जियें हम.

देश का ही गान… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on May 12, 2011 at 3:57pm — 2 Comments

गीत - तिनका तिनका लौटा दे



हे परोपकारी भगवन

तू रीते घट भर दे

सूखे ताल तलैया भर दे

पथिको को छैया दे…

Continue

Added by vimla bhandari on May 11, 2011 at 1:37pm — 3 Comments

प्यार की वैज्ञानिक व्याख्या

क्या?

प्यार की वैज्ञानिक व्याख्या चाहिए

तो सुनो

ब्रह्मांड का हर कण

तरंग जैसा भी व्यवहार करता है

और उसकी तरंग का कुछ अंश

भले ही वह नगण्य हो

ब्रह्मांड के कोने कोने तक फैला होता है



आकर्षण और कुछ नहीं

इन्हीं तरंगों का व्यतिकरण है

और जब कभी इन तरंगों की आवृत्तियाँ

एक जैसी हो जाती हैं

तो तन और मन के कम्पनों का आयाम

इतना बढ़ जाता है

कि आत्मा तक झंकृत हो उठती है

इस क्रिया को विज्ञान अनुनाद कहता हैं

और आम इंसान

प्यार



इसलिए… Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 11, 2011 at 1:04pm — 5 Comments

मैं जंगल का मोर

मैं जंगल का मोर
शहर में कैसे नाचूँ....
कहाँ मेरी चित चोर 
मैं जिनके नैना बाचूँ
दिखे मेरी मन मीत
कुहू कर उसे बुलाऊँ
छलके मन की प्रीत
झूमकर नाचूं गाऊँ 

Added by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on May 11, 2011 at 8:42am — No Comments

दूध का क़र्ज़

दूध का क़र्ज़



गंगा नहा आए जमुना नहा आए -2

क़र्ज़ तेरे ढूध का माँ कोई चुका ना पाए-२

काशी जा आए,मथुरा जा आए-२

भूलते नहीं माँ तेरी ममता के साए-२

गंगा नहा आए ज----------------

(१) बिन तेर दुनियां में कोई ना मेरा-2

बिन तेर सूना माँ रैन बसेरा-2

नींद ना आए माँ अखियों में बिन तेरे-२

बिन तेरे लोरी माँ कोई सूना ना पाए-२

गंगा नहा आए ज---------------

(२)उंगली पकड़कर चलना सिखाया-२

हर दुःख ग़म से हमको बचाया-२

तू ही बचाए माँ हर इक मुसीबत… Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on May 10, 2011 at 4:03pm — 2 Comments

औरत एक औरत भी है

औरत कभी मां है

कभी बहन, कभी बेटी

तो कभी पत्नी या प्रेयसी

इन सबसे अलग

औरत एक औरत भी है

 

अपने आप में मरती है

उफ! तक भी नहीं करती है और

पुरूष के अहं मो टूटने से

बचाए रखती है

 

वह जानती है

पुरूष एक बार टूट जाएगा तो

दुबारा जुड़ नहीं पाएगा

जबकि औरत?

 

औरत ने पाई है मिट्टी की प्रकृति

टूटते ही अपने आंसुओं से

गुथेगी खुद को, और जुड़ जाएगी

नई…

Continue

Added by rajendra kumar on May 10, 2011 at 1:42pm — 2 Comments

जताते क्यों हो

जताते क्यों हो


हमसे करते हो मुहब्बत तो जताते क्यों हो

दर्द-ए-दिल हमको ए-दोस्त  दिखाते क्यों हो
अपनें भी दिल में जख्मों की कमीं कोई नहीं
दास्ताँ दर्द की तुम मुझको सुनाते क्यों…
Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on May 10, 2011 at 11:44am — 3 Comments

मुक्तिका: तुम क्या जानो ---- संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

तुम क्या जानो

संजीव 'सलिल'

*

तुम क्या जानो कितना सुख है दर्दों की पहुनाई में.

नाम हुआ करता आशिक का गली-गली रुसवाई में..

 

उषा और संझा की लाली अनायास ही साथ मिली.

कली कमल की खिली-अधखिली नैनों में, अंगड़ाई में..

 

चने चबाते थे लोहे के, किन्तु न अब वे दाँत रहे.

कहे बुढ़ापा किससे क्या-क्या कर गुजरा तरुणाई में..

 

सरस परस दोहों-गीतों का सुकूं जान को देता है.

चैन रूह को मिलते देखा गजलों में,…

Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on May 10, 2011 at 10:03am — 11 Comments

माँ ......

माँ , रहती हो हर पल मेरे साथ .....



जब निकलता हूँ घर से बाहर , चाहे मैं पलटकर देखूं ना देखूं

खड़ी रहती हो तुम दरवाज़े पर ही जब तक हो ना जाऊं ओझल गली के मोड़ पर ,

और फिर चलने लगती हो साथ मेरे दुआओं के रूप में .....



नींद ना आये जब मुझे तो गुज़ार देती हो सारी रात ,

थपकियाँ देते हुए मेरे माथे पर ,

और सो जाता हूँ मैं सुकून से .....



कभी जो आना-कानी करूँ खाने के नाम पे ,

तो यूं खिलाती हो अपने हाथों से ,

मानो भूख मेरी शांत होती हो और तृप्त… Continue

Added by Veerendra Jain on May 10, 2011 at 12:21am — 7 Comments

मेरे सपनों में अक्सर नेता जी आते हैं .

मेरे सपनों में अक्सर नेता जी आते हैं .

उनके आते ही मन में हलचल मच जाती हैं ,
और मैं उनको देखता हूँ ,
उन्हें सुनता हूँ
और उसके बाद ,
इस निर्णय पे…
Continue

Added by Rash Bihari Ravi on May 9, 2011 at 12:30pm — 1 Comment

पुछल्ले हो गये

जब से कॉलोनी मुहल्ले हो गये
लोग सब लगभग इकल्ले हो गये
 
दोस्ती हम ने इबादत मान ली 
बस कई इल्ज़ाम पल्ले हो गये
 
भोक्ता,कर्त्ता सुना भगवान है 
लोग महफ़िल के निठल्ले हो गये
 
ज़िक्र की पोशीदगी बढ़ने लगी 
बात में बातों के छल्ले  हो गये
 
बेअदब हो चाँद फिर मंज़ूर है
अब तो सब तारे पुछल्ले हो गये   

Added by ASHVANI KUMAR SHARMA on May 9, 2011 at 6:30am — 9 Comments

ऐ काश! मेरे भी माँ होती

ऐ काश! मेरे भी माँ होती ।

जब-जब मेरी अखियाँ रोती ।

लापरवाहियां दुख देती।

सिर पे मेरे हाथ फिरोती।

ऐ काश मेरे भी माँ होती।

 

ममतामयी जवानी खोती।

सीने पर ज्यूं चले करोती।

अंखियां बरसे जैसे…

Continue

Added by nemichandpuniyachandan on May 8, 2011 at 11:30pm — 5 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"इल्म गिरवी है अभी अपनी जहालत के लिए ढूँढ लो क़ौम नयी अब तो बग़ावत के लिए अब अगर नाक कटानी ही है हज़रत…"
21 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"आ. रिचा जी, सादर अभिवादन। तरही मिसरे पर सुंदर गजल हुई है। गिरह भी खूब लगाई है। हार्दिक बधाई।"
yesterday
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"2122, 1122, 1122, 112/22 सर झुका देते हैं हम उसकी इबादत के लिए एक दिल चाहिए हमको तो मुहब्बत के…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"सादर अभिवादन।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"सर कोई जब न उठा सच की हिमायत के लिएकर्बला   साथ   चले   कौन …"
Saturday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
" स्वागतम "
Friday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189

ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरे के 190 वें अंक में आपका हार्दिक स्वागत है | इस बार का मिसरा नौजवान शायर…See More
Apr 21
आशीष यादव posted a blog post

मशीनी मनुष्य

आज के समय में मनुष्य मशीन बनता जा रहा है या उसको मशीन बनने पर मजबूर किया जाता है. कारपोरेट जगत…See More
Apr 20
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब, प्रस्तुत दोहों की सराहना हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर"
Apr 19
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय जयहिंद रायपुरी जी सादर, प्रदत्त चित्र पर आपने  दोहा छंद रचने का सुन्दर प्रयास किया है।…"
Apr 19
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी  सही कहना है हम भारतीय और विशेषकर जो अभावों में पलकर बड़े हुए हैं, हर…"
Apr 19
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीया प्रतिभाजी हार्दिक धन्यवाद आभार आपका"
Apr 19

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service