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Dr.Brijesh Kumar Tripathi
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Dr.Brijesh Kumar Tripathi posted a blog post

एक दिन की लिली

एक दिन की लिली प्राणप्रण  से खिली जी भर कर बांटा महक जो भी उसे मिली छोटी सी ज़िन्दगी छोटी सी काया थोड़े से फूलों में जग को महकाया ज़िन्दगी सुहानी है मीठी कहानी है संघर्ष किये बिना लगती अनजानी है सुख-दुःख हैं दिन-रैना इनके बिन क्या कहना फीके सब खान-पान मिलेगा नही चैना जीवन है  एक दिन पल-क्षण हैं अनगिन एक पल की खुशबू में खिल जाता है जीवन आओ चलें साथ मिल जोड़ कर दिलों से दिल यह जहाँ हमारा है   रहना  है हिल-मिल [मौलिक एवं अप्रकाशित ]डॉ. बृजेश कुमार त्रिपाठी   See More
Aug 4, 2015
Dr.Brijesh Kumar Tripathi commented on Dr.Brijesh Kumar Tripathi's blog post सावन
"shukriya adarneey vamankar ji"
Jul 31, 2015

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर commented on Dr.Brijesh Kumar Tripathi's blog post सावन
"आदरणीय बृजेश जी, इस सुन्दर दोहावली की प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकारें. सादर "
Jul 27, 2015
Dr.Brijesh Kumar Tripathi commented on kanta roy 's blog post दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ /कान्ता राॅय
"मन के अंतर्द्वंदों का सजीव चित्रण बड़ी खूबसूरती से किया गया है ...सुश्री कांता रॉय जी आप  एक सिद्ध हस्त रचनाकार की दिशा में यूँ ही आगे बढ़ती रहें...बधाई"
Jul 26, 2015
Dr.Brijesh Kumar Tripathi commented on Dr.Brijesh Kumar Tripathi's blog post सावन
"शुक्रिया भाई समर कबीर जी धन्यवाद भाई गिरिराज भंडारी जी"
Jul 26, 2015

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on Dr.Brijesh Kumar Tripathi's blog post सावन
"आदरणीय बृजेश भाई , सुन्दर सावनी दोहों के लिये हार्दिक बधाई ।"
Jul 26, 2015
Samar kabeer commented on Dr.Brijesh Kumar Tripathi's blog post सावन
"जनाब ब्रिजेश कुमार जी,आदाब,सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें"
Jul 26, 2015
Dr.Brijesh Kumar Tripathi commented on Dr.Brijesh Kumar Tripathi's blog post सावन
"धन्यवाद मोहिनी बहन"
Jul 26, 2015
mohinichordia commented on Dr.Brijesh Kumar Tripathi's blog post सावन
"bahut khoobsoorat varnan "
Jul 26, 2015
Dr.Brijesh Kumar Tripathi posted a blog post

सावन

हरियाली हर ले गई,  सबके मन की पीर झूले पड गए वृक्ष  में  झूल रही हैं हीर... 1 धरती के फिर वक्ष में  है उमंग का जोर  अंकुर फूटे कोख से,  ममता भरे हिलोर... 2 सावन सा वन है यहाँ    हरित दृश्य चहुँ ओरदादुर-ध्वनि की ताल में,   नृत्य कर रहे मोर... 3 सावन मनभावन तभी   जब प्रीतम हों पास निर्झर नयनों में दिखी, पिया मिलन की आस... 4 प्रियतम हैं परदेश में, भूल गए घरबार रिमझिम सावन की लगे,  अब तीरों के वार...5  बिना बताये आ गए,  प्रीतम घर के द्वार बौरन अब क्यों नयन में, हैं असुवन के हार ?...6 प्रीतम फिर से…See More
Jul 26, 2015
Dr.Brijesh Kumar Tripathi posted a blog post

नए हाइकू

झरना फूटा संगीत फ़ैल गया हुआ बावरायात्रा अनंत लक्ष्य का पता नहीं चलाचल रेनदी की धारा रोके नही रूकती हारीं चट्टानेंमानव मन उड़ने को आतुर पंख फैलायेकोलाहल में गहराया एकांत भागी उदासी . यह मेरी अप्रकाशित और मौलिक रचना है डॉ.बृजेश कुमार त्रिपाठीSee More
Jul 17, 2015
Srivastava amod bindouri commented on Dr.Brijesh Kumar Tripathi's blog post नए हाइकू
"हाइकू के वर्णों के बारे में कृपया जानकारी दे"
Jul 12, 2015
Manisha Saxena commented on Dr.Brijesh Kumar Tripathi's blog post नए हाइकू
"हाइकू अच्छे लगे| "चलाचल रे "शायद ज्यादा जमता और वर्ण भी पूरे हो जाते |"
Jul 12, 2015

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on Dr.Brijesh Kumar Tripathi's blog post नए हाइकू
"आदरणीय , आपके हाइकू , बहुत अच्छे लगे , बधाई आपको ।"
Jul 12, 2015
Omprakash Kshatriya commented on Dr.Brijesh Kumar Tripathi's blog post नए हाइकू
"आदरणीय  जी आप के हाइकू अच्छे है . बस इस में " चलाचल बावरे " में ७ वर्ण हो रहे है ."
Jul 11, 2015
Dr.Brijesh Kumar Tripathi posted blog posts
Jul 11, 2015

Profile Information

Gender
Male
City State
Kanpur
Native Place
Kanpur
Profession
Homoeopathic Physician
About me
Ypu will better Know

Dr.Brijesh Kumar Tripathi's Blog

एक दिन की लिली

एक दिन की लिली …

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Posted on August 4, 2015 at 4:30pm

सावन

हरियाली हर ले गई,  सबके मन की पीर 

झूले पड गए वृक्ष  में  झूल रही हैं…
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Posted on July 26, 2015 at 5:30am — 7 Comments

नए हाइकू

झरना फूटा
संगीत फ़ैल गया
हुआ बावरा

यात्रा अनंत
लक्ष्य का पता नहीं
चलाचल रे

नदी की धारा
रोके नही रूकती
हारीं चट्टानें

मानव मन
उड़ने को आतुर
पंख फैलाये

कोलाहल में
गहराया एकांत
भागी उदासी
.
यह मेरी अप्रकाशित और मौलिक रचना है
डॉ.बृजेश कुमार त्रिपाठी

Posted on July 10, 2015 at 8:30am — 4 Comments

अनुभव (दोहे)

जीवन के जिस राग  का अनुभव में था ताप l  

बिन उसके जीवन वृथा, धन-वैभव या शाप ll 

 

भय वश मैं झिझका रहा प्रेम न फटका पास l 

गहरी नदिया पास थी अमिट और भी प्यास ll

 

मैं क्या जानूं उसे जो,   छिप कर करता वार  l

जीवन-रस अमृत सही,  छलक रहा हो सार  ll

 

कुछ तो फूटा है यहाँ, फैला है अनुराग l

बिन बदली भीगा बदन, ठंढी-ठंढी आग ll

 

यह सुगंध अनुराग की बढ़ा रही है चाह…

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Posted on May 24, 2015 at 6:00am — 8 Comments

Comment Wall (12 comments)

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At 5:59pm on January 1, 2011, Veerendra Jain said…
Wishing you a very Happy Birthday.... Tripathi sir...
At 1:17pm on January 1, 2011, Rash Bihari Ravi said…
janam din mubarak ho ,
At 9:23am on January 1, 2011,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
At 10:45pm on November 23, 2010, Lata R.Ojha said…
aap mitrmandali mein sarvpratham mitr hain bhai :) mitrta sweekar kijiye :)
At 2:17am on November 21, 2010, SARA MISRA said…
aapke aashirwaad aur sneh ki aakanchhi ..............SARA
At 9:31am on September 19, 2010, Admin said…
सर नीचे दिये गये लिंक या तरही मुशायरा-३ जहा आपकी ग़ज़ल पोस्ट हुई है उसके ठीक नीचे आने वाली प्रतिक्रिया को आप पढ़ सकते है, आप सीधे भी तरही मुशायरा-३ मे पोस्ट कर सकते थे किन्तु आप के नहीं कर सकने के कारण मै पोस्ट कर दिया था,
किसी भी जानकारी के लिये आप का स्वागत है ,
http://www.openbooksonline.com/forum/topics/obo-3?id=5170231%3ATopic%3A19991&page=13#comments
At 11:17pm on September 18, 2010, Admin said…
आदरणीय डॉ ब्रिजेश कुमार त्रिपाठी जी, इस पोस्ट(जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गयी.) को तरही मुशायरा -३ मे पोस्ट कर दिया गया है ,
http://www.openbooksonline.com/forum/topics/obo-3/showLastReply
At 8:40pm on September 15, 2010, Admin said…
आपका tarahi mushayarey key liyey भेजा गया पोस्ट जो नीचे लिखा हुआ है उसे मुशायरा मे पोस्ट कर दिया गया है जिसे आप नीचे के लिंक पर देख सकते है ....
http://openbooksonline.com/xn/detail/5170231:Comment:19883?xg_source=activity

दोस्तों नेट की खराबी के चलते मैं तरही मुशायरा में शामिल नहीं हो पाया लेकिन मेरी इसमें शामिल होने की बड़ी इच्छा थी चार लाइन पेश करना चाहता हूँ और लेट लतीफी की माफ़ी भी ...

जिनकी बातों से चिढ होती थी कभी
उन्ही को फर्शी सलाम बजाना है...
जिनके पीछे पड़े थे कभी पुलिस के दस्ते
उन्ही के कदमों में जा गिरा ज़माना है
At 10:29pm on July 15, 2010, PREETAM TIWARY(PREET) said…

At 12:33pm on July 15, 2010,
सदस्य टीम प्रबंधन
Rana Pratap Singh
said…

 
 
 

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