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मेरे कातिल

पास आ कातिल मेरे मुझमें जान आने दे,

जान ले लेना पर थोडा तो संभल जाने दे।

 

तूँ तसव्वुर में मेरे रहा है बरसों से,

खुद को नजरों से सीने में उतर जाने दे।

 

कुछ ठहर जा कि छुपा लूँ मैं दर्द सीने का,

या तेरे सीने से लिपट कर बिफर जाने दे।

 

तुझको पाना नहीं है मेरी मंजिल,

तूँ जरा खुद में मुझको समां जाने…

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Added by Gyanendra Nath Tripathi on August 18, 2011 at 1:30pm — 2 Comments

चोरों का देश

यह देश चोर और लूटेरों का है. यहां चोर और लुटेरों की संस्कृति विद्यमान है. वजह भी साफ है हजारों सालों से हम लुटते आ रहे हैं. लुटेरे थक गये पर हम नहीं थके. सोने की चिडि़यां दुनिया भर के दानवों का शिकार बनती रही है और आज भी बनी हुई है. फर्क सिर्फ इतना आया है कि आज हमें आजादी जैसी लाॅलीपाॅप थमा कर हमें लूटा जा रहा है. छोटा सा एक उदाहरण है: रोजगार सेवक जैसी नौकरी करने वाले स्वीकार करते हैं कि महिने में कम से कम 1 लाख से डेढ़ लाख की कमाई होती है. मुखिया जैसे बिना वेतन के कार्य करनेवाले थौक के भाव…

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Added by Rohit Sharma on August 18, 2011 at 12:14pm — No Comments

व्यंग्य - देश को समर्पित कर दें ‘भ्रष्टाचार’

भ्रष्टाचार का जिन्न एक बार फिर बाहर आ गया है और इस बार वह सब पर भारी नजर आ रहा है। सत्ता के रसूख का दंभ भरने वाली सरकार भी डरी-सहमी हैं। आधुनिक भारत के ‘गांधी’ के नए अवतरण के बाद ‘भ्रष्टाचार का भूत’ को देश से भगाने के लिए ‘अनशन यज्ञ’ का सहारा लिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि यह नए भारत की ‘अगस्त क्रांति’ है। हालात ऐसे बन गए हैं, जो भी भ्रष्टाचार की खिलाफत में मुंह मोड़ेगा, वह क्रांति की चपेट में आ जाएगा और देश में इस क्रांति से हजारों-हजार बावले नजर आ रहे हैं, ‘हजारे’ के साथ। भले ही कई बरसों…

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Added by rajkumar sahu on August 18, 2011 at 1:15am — No Comments

हमारा देश

स्वर्ग सम है, भू ज़हाँ की, वो हमारा देश है |
इक तिरंगा ही सभी का, मन-पसंद परिवेश है ||
भिन्न-भिन्न हैं प्रांत इसमें, भिन्न-भिन्न इसमें धर्म |
अनेकता मैं एकता का, जग को ये सन्देश है || स्वर्ग सम है, भू ज़हाँ की, वो हमारा देश है |
शान्ति का दूत जग मैं, पंचशील इसका नियम…
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Added by Shashi Mehra on August 17, 2011 at 6:29pm — No Comments

अन्ना हजारे

अन्ना हजारे आज जिस लोकपाल बिल हेतु संघर्ष कर रहे हैं, यह भविष्य में कितना सार्थक होगा यह कहना भविष्य की बात है. परन्तु उनका संघर्ष इस बात को पूरजोर तरीके से एकबार फिर साबित कर दिया है कि इस देश में अपने अधिकार और अपनी बातों को रखने की कहीं से भी आजादी नहीं है. यहाँ अभिव्यक्ति की कोई भी स्वतंत्रता नहीं है. उनको तो बिल्कुल ही नहीं जो देश के शासक वर्ग के खिलाफ आवाज उठाते हैं. भ्रष्टाचार जैसे सर्वव्यापी घृणित रोग के खिलाफ लड़ने वाले जब इस ‘‘आजाद’’ देश में अपनी बात नहीं रख पा रहे हैं और उन्हें…

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Added by Rohit Sharma on August 17, 2011 at 3:49pm — No Comments

सरकार

शर्मशार किये गाँधी को, नहीं माफ़ करेंगे
लायेंगे वक़्त को , तेरा भी इन्साफ़ करेंगे
माँग रहे बस रास्ता,  दे दो ऎ जंगल मुझे
मज़बूर किये तो तुझे, जड़ से साफ़ करेंगे

Added by VIBHUTI KUMAR on August 17, 2011 at 12:58pm — No Comments

अब नही जागे तो कब......?

भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाने के लिए अन्ना हज़ारे आगे आए सरकार का रुख़ हम सबने देखा. अब वो समय आ गया हे की देश मे क्रांति हो और देश नया रूप नया रंग ले एक नई सुबह हो.…

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Added by monika on August 17, 2011 at 1:37am — 1 Comment

भारत माँ को नमन

भारत माँ को नमन अपनी जमीन सबसे प्यारी है ; अपना गगन सबसे प्यारा है ;

बहती सुगन्धित मोहक पवन ;

इसके नज़ारे चुराते हैं मन ;

सबसे है प्यारा अपना वतन ;

करते हैं भारत माँ को नमन

वन्देमातरम !वन्देमातरम !

करते हैं भारत माँ ! को नमन .

उत्तर में इसके हिमालय खड़ा ;

दक्षिण में सागर सा पहरी अड़ा ;

पूरब में इसके खाड़ी बड़ी ;

पश्चिम का अर्णव करे चौकसी ;

कैसे सफल हो कोई दुश्मन !

करते हैं भारत माँ को नमन !

वन्देमातरम !वन्देमातरम !

करते…

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Added by shikha kaushik on August 16, 2011 at 7:52pm — No Comments

शौक (झलकी) भाग-3 एवं अंतिम

शौक (झलकी) भाग-3 एवं अंतिम
.
रंजना-     हाँ , पता नहीं कक्षा ८ से ही क्या हो गया इसे. ये बस कहता है कि हम गायक बनेंगे.
               गाँव में एक श्यामू जी का बेटा है ,वो कितना अच्छा है पढने में और एस साल उसका एडमिशन आई.आई. टी में हुआ है.           मैं भी चाहती हूँ कि...
विनोद जी-   समझ गया. आओ…
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Added by Atendra Kumar Singh "Ravi" on August 16, 2011 at 11:00am — 3 Comments

मानसरोवर - 6

 

राष्ट्र के कर्णधार उठो , मानवता के पहरेदार उठो .

तुमको वतन पुकार रहा , तेरे पौरुष को ललकार रहा.

भारत माँ का उद्धार करो.

भ्रष्टाचार - संहार करो .

नृप ! बैठ तख़्त क्या सोच रहा ? अवमूल्यन में क्या खोज रहा ?

सत्ता की कुछ मर्यादा है , जनतंत्र से कुछ तेरा वादा है.

दृग मूंद लिए सब सपना है.

आँखे खोलो सब अपना है.

यह जग माया का है बाज़ार , जहाँ रिश्तों के कितने प्रकार .

कोई मातु - पिता कोई भाई है , कोई बेटी और जमाई है.

कोई…

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Added by satish mapatpuri on August 16, 2011 at 12:18am — 2 Comments

पन्द्रह अगस्त

माना त्यौहार भारत के, सब मस्त हैं |

सबसे प्यारा लगे, पन्द्रह अगस्त है ||

इस पर्व की, अनोखी ही पहचान है |

हर तरफ गूँजता, राष्ट्रीय गान है |

भारतीय करते अपने पे, अभिमान हैं ||

इसकी शोभा बढायें, जो सिद्धहस्त हैं || सबसे प्यारा लगे, पन्द्रह अगस्त है ||

इक ख़ुशी की लहर,बन के आता है यह |

सबके मस्तिष्क पर, छा ही जाता है यह ||

हमको पाके सजग, मुस्कुराता है यह |

इसकी रक्षा को तत्पर, सब सशक्त हैं || सबसे प्यारा लगे, पन्द्रह अगस्त है ||

इसकी खातिर हुए,… Continue

Added by Shashi Mehra on August 15, 2011 at 12:10pm — 4 Comments

कविता : अबकी बार आजादी कुछ इसतरह मनाये हम.

अबकी बार आजादी कुछ इसतरह मनाये हम.

रोते-बिलखते लोगों को फिर एक बार हंसाये हम.

जो अब तक सही आजादी  पाने  से महरूम है.

जो अपने घर में आज भी बेबस लाचार मजलूम है.

स्वतंत्र देश में जकड़े है जो गुलामी की जंजीरों से.

खेलते है देश के नेता जिनके मासूम तकदीरों से.

जो तन्हा भूखे-नंगे सोते है आसमान के नीचे.

उनके बंजर चेहरों को आओ मिलकर सींचे.

उनके रहने खातिर एक आशिया बनाये हम. 

अबकी बार आजादी कुछ इसतरह मनाये हम.

उखाड़ फेके…

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Added by Noorain Ansari on August 15, 2011 at 9:30am — 5 Comments

आज हिमालय ने हमको ललकारा है

प्यार-एकता की खुश्बू से महके चमन हमारा I



सारी दुनिया में सबसे आगे हो वतन हमारा I

कुर्बानी देकर पायी है आजादी की दौलत I

जाति-धर्म के झगड़े छोड़ो-छोड़ो बैर और नफ़रत I

 

देश के टुकड़े करने को, दुश्मन ने जाल पसारा है I

नींद से जागो, आज हिमालय ने हमको ललकारा है…

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Added by satish mapatpuri on August 15, 2011 at 2:00am — 6 Comments

गर मसले भी जायें खुशबू बन जाते हैं

हम गुल गुलज़ारों के,
यूँ प्यार जताते हैं,
गर मसले भी जायें,
ख़ुशबू बन जाते हैं।

सूरज की वो गरमी,
बारिश की वो झिड़की,
ये ज़ालिम सर्द हवा,
क़ातिल बनकर चलती,
मौसम के तीरों को,
सीने पर खाते हैं।
गर मसले भी जायें,
ख़ुशबू बन जाते हैं।

शाख़ों से छूट गये,
अरमाँ भी टूट गये,
अब खाली आँखों से,
सपने भी रूठ गये,
हम जान गवाँकर भी,
सहरा बन जाते हैं।

गर मसले भी जायें,
ख़ुशबू बन जाते हैं।

Added by इमरान खान on August 14, 2011 at 10:14pm — 1 Comment

ग़ज़ल :- बाढ़ का हद से गुजरना अच्छा

 ग़ज़ल :- बाढ़ का हद से गुजरना अच्छा
 
बाढ़ का हद से गुजरना अच्छा ,
गाँव का फिर से संवरना अच्छा |
 
इस जगह माँ की याद आती है ,
इस जगह थोडा ठहरना अच्छा…
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Added by Abhinav Arun on August 14, 2011 at 3:33pm — 11 Comments

ग़ज़ल :- ये खबर इस शहर पे तारी हुई

 ग़ज़ल :- ये  खबर इस शहर पे तारी हुई 
 
यह खबर इस शहर पे तारी हुई ,
मछलियों  की जाल से यारी हुई |
 
फूल था मधुरस लुटा हल्का हुआ ,…
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Added by Abhinav Arun on August 14, 2011 at 3:30pm — 14 Comments

कविता = कहाँ आज़ाद हैं हम

कविता = कहाँ आज़ाद हैं हम

कहाँ आज़ाद हैं हम

हजारों हर तरफ ग़म

भ्रष्टाचार के टीले - पहाड़

और जनता की नित हार

अवनति…

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Added by Abhinav Arun on August 14, 2011 at 1:39pm — 16 Comments

स्वतंत्रता दिवस पर विशेष गीत: सारा का सारा हिंदी है -----संजीव 'सलिल'

 

स्वतंत्रता दिवस पर विशेष गीत:



सारा का सारा हिंदी है…

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Added by sanjiv verma 'salil' on August 13, 2011 at 8:30am — 3 Comments

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