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December 2024 Blog Posts (21)

सूरज सजीले साल का

सूरज सजीले साल का

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ठंड से ठिठुरती सुनसान गलियां 

ओसाए हुए से सुन्न पड़े खेत 

घुटती जमती लाचार सी जिंदगी

धुंध के आगोश में गुम होता जीव - जगत 

ठिठुरती ठिठुरन को दूर करने 

आ गया सजकर सूरज 

नए नवेले सजीले साल का ।

शीत सी शीतल होती मानवता 

नूतन निर्माण करने 

निचले - कुचले 

पद - दलित का कल्याण करने 

साधु सन्यासी का त्राण करने 

विप्लव का…

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Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on December 31, 2024 at 7:57pm — No Comments

नूतन वर्ष

नूतन वर्ष

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दुल्हन सी सजी-धजी 

गुजर रहे साल की अंतिम शाम ।

लोग मग्न हैं 

जाने वाले वर्ष की विदाई में 

कुछ नवागंतुक के स्वागत में।

कोई मंत्र उच्चारण - हवन करने में …

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Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on December 31, 2024 at 7:35pm — 3 Comments

नये साल में-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

212 /212/ 212 /212 

*

बच पवन  से  सँभलना  नये  साल में

हमको दीपक सा जलना नये साल में।१।

*

मेट  अन्याय  और  कालिमा  चाहिए

न्याय  विश्वास  फलना  नये  साल में।२।

*

छोड़ना  है  हमें  देश  हित में सहज

नफरतों  से   उबलना  नये  साल में।३।

*

सिर्फ रिश्तों की खातिर भुला द्वेष को

मन से मन तक टहलना नये साल में।४।

*

होगा उन्नत बहुत देश अपना तभी

सब जिएँ छोड़ छलना नये साल में।५।

*

कर रहा…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 31, 2024 at 8:56am — No Comments

राम पाना कठिन शेष जीवन में पर -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२

*

जो चले कर्म में सिलसिला राम का

लौट आये सनम काफ़िला राम का।१।

*

एक विनती  करें भोले  शंकर से हम

देश ही क्या जगत हो जिला राम का।२।

*

धन्य जीवन  हमारा  भी होता बहुत

देख लेते अगर मुख खिला राम का।३।

*

जो भी वंचित  सदा  दुख  रहे भोगते

हैं सुखी साथ जिनको मिला राम का।४।

*

दोष मढ़ते  बहुत  वो  अधम राम पर

भेद पाये  नहीं  जो  किला  राम का।५।

*

राम पाना कठिन शेष जीवन में पर…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 29, 2024 at 2:00pm — No Comments

जिन्दगी भर बे-पता रहना -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२

*

जिन्दगी  भर  बे-पता  रहना

हर जुबा पर हाँ लिखा रहना।१।

*

हर तरफ मौसम विषम होंगे

बस कुटज सा तू जगा रहना।२।

*

सन्त बिच्छू की कथा कहती

जात  में  अपनी  बना रहना।३।

*

झूठ चाहे चल रहा जग भर

सत्य मन  तू  बोलता रहना।४।

*

माँ पिता के छिन गये साये

सीख उससे बे-ख़ुदा रहना।५।

*

धीरता  कुछ   सीख  धरती से

हर समय क्या जलजला रहना।६।

*

क्या है करना  बेबफा जग…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 28, 2024 at 2:00pm — No Comments

दोहा पंचक. . . रोटी

दोहा पंचक. . . रोटी

सूझ-बूझ ईमान सब, कहने की है बात ।

क्षुधित उदर के सामने , फीके सब जज्बात ।।

मुफलिस को हरदम लगे, लम्बी भूखी रात ।

रोटी हो जो सामने, लगता मधुर प्रभात ।।

जब तक तन में साँस है, चले क्षुधा से जंग ।

बिन रोटी फीके लगें, जीवन के सब रंग ।।

मान-प्रतिष्ठा से बड़ी, उदर क्षुधा की बात ।

रोटी के मोहताज हैं, जीवन के हालात ।।

स्वप्न देखता रात -दिन, रोटी के ही दीन ।

इसी जुगत में दीन यह , हरदम रहता लीन…

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Added by Sushil Sarna on December 25, 2024 at 2:37pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . . .

दोहा पंचक. . .

बाण न आये लौट कर, लौटें कभी न प्राण ।

काल गर्भ में है छुपा, साँसों का निर्वाण ।।

नफरत पीड़ा दायिनी, बैर भाव का मूल ।

जीना चाहो चैन से, नष्ट करो यह शूल ।।

आभासी संसार में, दौलत बड़ी महान ।

हर कीमत पर बेचता , बन्दा अब  ईमान ।।

अन्तर्घट के तीर पर, सुख - दुख करते वास ।

सूक्ष्म सत्य है देह में, वाह्य जगत  आभास ।।

जीवन मे  होता नहीं, जीव कभी संतुष्ट ।

सब कुछ पा कर भी सदा, रहे ईश से रुष्ट ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on December 23, 2024 at 2:42pm — 2 Comments

एक बूँद

एक बूँद
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सिहर गया तन - बदन
झूम उठा रोम - रोम
नयनों के कोने से मस्ती की झलक
कदमों की शिथिलता
होती हुई गतिमान
मन में उठती लहरें जैसे
बातें कर रहा हो हवा से अश्व
सबकुछ लगता बदला - बदला सा
जब तन से तन्मय हुई
एक बूँद प्रेम की छुअन ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

सुरेश कुमार 'कल्याण'

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on December 23, 2024 at 11:19am — 1 Comment

कमियाँ बुरी लगती हैं

मुझे बता दो कोई

मेरी कविता की कोई कमियाँ 

मेरी ही नहीं 

चाहने वालों के संग

न चाहने वालों की भी

मात्र कविता ही नहीं 

जिंदगी भी 

सुधारना चाहता हूँ मैं

प्रशंसा सुनना चाहता है मन

कमियाँ बुरी लगती हैं।

मौलिक एवं अप्रकाशित 

सुरेश कुमार 'कल्याण' 

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on December 23, 2024 at 9:59am — No Comments

दोहा पंचक. . . . .व्यवहार

दोहा पंचक. . . व्यवहार

हमदर्दी तो आजकल, भूल गया इंसान ।

शून्य भाव के खोल में, सिमटा है नादान ।।

मुँह बोली संवेदना, मुँह बोला व्यवहार  ।

मुँह बोले संसार में, मुँह बोला है प्यार ।।

भूले से तकरार में, करो न  ऐसी बात ।

जीवन भर देती रहे, वही बात आघात ।।

अन्तस में कुछ और है, बाहर है कुछ और ।

उलझन में यह जिंदगी, कहाँ सत्य का ठौर ।।

दो मुख का यह आदमी, क्या इसका विश्वास ।

इसके अंतर में सदा, छल करता है वास ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on December 21, 2024 at 3:36pm — No Comments

दोहा पंचक. . . दिन चार

दोहा पंचक. . . . दिन चार

निर्भय होकर कीजिए, करना है जो काम ।

ध्यान रहे उद्वेग में, भूल न जाऐं राम ।।

कितना अच्छा हो अगर, मिटे हृदय से बैर ।

माँगें अपने इष्ट से, सकल जगत् की खैर ।।

सच्चे का संसार में, होता नहीं  अनिष्ट ।

रहता उसके साथ में, उसका  अपना  इष्ट ।।

पर धन विष की बेल है, रहना इससे दूर ।

इसकी चाहत के सदा, घाव बनें  नासूर ।

चादर के अनुरूप ही, अपने पाँव पसार ।

वरना फिर संघर्ष में, बीतेंगे दिन चार ।।

सुशील सरना…

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Added by Sushil Sarna on December 20, 2024 at 3:49pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . . .शीत शृंगार

दोहा पंचक. . . शीत शृंगार



नैनों की मनुहार को, नैन करें स्वीकार ।

प्रणय निवेदन शीत में, कौन करे इंकार ।।

मीत करे जब प्रीति की, आँखों से वो बात ।

जिसमें बीते डूबकर,  आलिंगन में रात ।।

अभिसारों में व्याप्त है, मदन भाव का ज्वार ।

इस्पर्शों के दौर में, बिखरा हरसिंगार ।।

बढ़े शीत में प्रीति की, अलबेली सी प्यास ।

साँसें करती मौन में, फिर साँसों से रास ।।

अंग-अंग में शीत से, सुलगे प्रेम अलाव ।

प्रेम क्षुधा के वेग में, बढ़ते गए कसाव…

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Added by Sushil Sarna on December 18, 2024 at 8:19pm — 2 Comments

प्रेम की मैं परिभाषा क्या दूँ... दिनेश कुमार ( गीत )

प्रेम की मैं परिभाषा क्या दूँ... दिनेश कुमार

( सुधार और इस्लाह की गुज़ारिश के साथ, सुधिजनों के समक्ष, गीत विधा पर पहली कोशिश... )

प्रेम की मैं परिभाषा क्या दूँ...

मौन अधर हैं दिल में कम्पन

महक रहा हर सू बस चन्दन

पतझड़ का मौसम भी सावन

फूल खिले हैं गुलशन गुलशन

मन के भाव सुकोमल पंछी

इनको एक घरौंदा क्या दूँ

प्रेम की मैं परिभाषा क्या दूँ....

मोहन की हर सांस में राधा

जहाँ राम हैं वहीं है…

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Added by दिनेश कुमार on December 18, 2024 at 8:00pm — No Comments

दोहा पंचक - राम नाम

तनमन कुन्दन कर रही, राम नाम की आँच।

बिना राम  के  नाम  के,  कुन्दन-हीरा  काँच।१।

*

तपते दुख की  धूप  में, जब जीवन के पाँव।

तन-मन तब शीतल करे, राम नाम की छाँव।२।

*

राम नाम की नित सुधा, पीते हैं जो लोग।

सन्तापित  होते  नहीं, चाहे दुख का योग।३।

*

चाहे दाता  राम  पर, मिलता  सब कर कर्म।

जो समझा इस बात को, करता नहीं अधर्म।४।

*

राम नाम का मर्म जो, समझ हुआ निष्काम।

उसको लगती भोर सी, ढलती जीवन शाम।५।

*

मौलिक/अप्रकाशित

लक्ष्मण…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 15, 2024 at 10:57pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . . .यथार्थ

दोहा पंचक. . . . यथार्थ

मन मंथन करता रहा, पाया नहीं  जवाब ।

दाता तूने सृष्टि की, कैसी लिखी किताब।।

आदि - अन्त की जगत पर, सुख - दुख करते रास ।

मिटने तक मिटती नहीं, भौतिक सुख की प्यास ।।

जीवन जल का बुलबुला, पल भर में मिट जाय ।

इससे बचने का नहीं, मिलता कभी उपाय ।।

साँसों के अस्तित्व का, सुलझा नहीं सवाल ।

दस्तक दे आता नहीं, क्रूर नियति का काल ।।

साम दाम दण्ड भेद सब, कितने करो प्रपंच ।

निश्चित तुमको छोड़ना, होगा जग का मंच…

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Added by Sushil Sarna on December 10, 2024 at 1:39pm — 4 Comments

मार्गशीर्ष (दोहा अष्टक)

कहते गीता श्लोक में, स्वयं कृष्ण भगवान।

मार्गशीर्ष हूँ मास मैं, सबसे उत्तम जान।1।

ब्रह्मसरोवर तीर पर, सजता संगम सार।

बरसे गीता ज्ञान की, मार्गशीर्ष में धार।2।

पावन अगहन मास में, करके यमुना स्नान।

अन्न वस्त्र के दान से, खुश होते भगवान।3।

चुपके - चुपके सर्द ले, मार्गशीर्ष की ओट।

स्वर्णकार ज्यों मारता, धीमी - धीमी चोट।4।

साइबेरियन सर्द में, खग करते परवास।

भारत भू पर शरण लें, मार्गशीर्ष में…

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Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on December 9, 2024 at 8:30pm — 1 Comment

कुंडलिया. . . .

कुंडलिया. . . . 

बच्चे अन्तर्जाल पर , भटक  रहे  हैं  आज ।
दुर्व्यसन   में   भूलते, जीवन  की  परवाज ।
जीवन की परवाज , लक्ष्य यह भूले अपना ।
बिना कर्म यह अर्थ , प्राप्ति का देखें सपना ।
जीवन   से  अंजान, उम्र  से  हैं  यह  कच्चे ।
आज  नशे   में   चूर , भटकते  देखे   बच्चे ।

सुशील सरना / 8-12-24

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on December 8, 2024 at 8:00pm — 2 Comments

ममता का मर्म

माँ के आँचल में छुप जाते

हम सुनकर डाँट कभी जिनकी।

नव उमंग भर जाती मन में

चुपके से उनकी वह थपकी ।

 

उस पल जाना ‘प्रेम पिता का’

कितनी…

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Added by Dharmendra Kumar Yadav on December 7, 2024 at 1:55pm — 1 Comment

लघुकविता

वह दरदरी दरी का रंगीन झोला 

डाकिए की तरह कंधे पर लटका कर 

हाथ में लकड़ी की तख्ती लेकर 

विद्यालय जाना 

पुरानी काली कूई पर

तख्ती पोंछकर मुल्तानी मिट्टी मलना 

धूप में सुखाकर सुलेख लिखना 

और वाहवाही लूटना 

मेरे सुखद अनुभव जिनसे 

अगली पीढ़ियाँ अनभिज्ञ रहेंगी। 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on December 4, 2024 at 2:00pm — 3 Comments

दोहा पंचक. . . . कागज

दोहा पंचक. . . कागज

कागज के तो फूल सब, होते हैं निर्गंध ।

तितली को भाते नहीं, गंधहीन यह बंध ।।

कितनी बेबस लग रही, कागज की यह नाव ।

कैसे हो तूफान में,साहिल पर ठहराव ।।

कागज की कश्ती चली, लेकर कुछ अरमान ।

रेजा - रेजा कर गया , स्वप्न सभी तूफान ।।

कैसी भी हो डूबती, कागज वाली नाव ।

हृदय विदारक दृश्य से, नैनों से हो स्राव ।

कागज पर लिख डालिए, चाहे जितने भाव ।

कागज कभी न भीगता, कितने ही हों घाव ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on December 3, 2024 at 8:57pm — 4 Comments

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