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तनमन कुन्दन कर रही, राम नाम की आँच।
बिना राम  के  नाम  के,  कुन्दन-हीरा  काँच।१।
*
तपते दुख की  धूप  में, जब जीवन के पाँव।
तन-मन तब शीतल करे, राम नाम की छाँव।२।
*
राम नाम की नित सुधा, पीते हैं जो लोग।
सन्तापित  होते  नहीं, चाहे दुख का योग।३।
*
चाहे दाता  राम  पर, मिलता  सब कर कर्म।
जो समझा इस बात को, करता नहीं अधर्म।४।
*
राम नाम का मर्म जो, समझ हुआ निष्काम।
उसको लगती भोर सी, ढलती जीवन शाम।५।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 31, 2024 at 11:04am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by Sushil Sarna on December 25, 2024 at 2:35pm

वाह  आदरणीय लक्ष्मण धामी जी बहुत ही सुन्दर और सार्थक दोहों का सृजन हुआ है ।हार्दिक बधाई सर 

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