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Rajesh kumari's Blog – May 2012 Archive (9)

द्वन्द

जैसे ही मैंने दरवाजा खोला …

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Added by rajesh kumari on May 30, 2012 at 9:30am — 22 Comments

तिश्नगी में

चश्मे  तो हमने राह में पाये हैं बेशुमार

तेरी ही तिश्नगी में  आये हैं बार- बार

  

 प्यार से बिठाया  और खुशियाँ लूट ली 

 धोखे यूँ जिंदगी में खाये हैं कई हजार

  

 सीमाएं मेरे दर्द की   वो नाप के गए 

 अश्क जब काँधे पे बहाये हैं ज़ार-ज़ार

 

 बता गमजदा दिल अब  कैसे ढकें बदन 

 खुशियों के पैरहन कर लाये हैं तार-तार

 

 वादियों में  बुलबुलें अब चहकती नहीं  

  जब दर्द…

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Added by rajesh kumari on May 25, 2012 at 3:00pm — 26 Comments

हाइकु (सिर मुंडाते ही,हास्य )

हाइकु (सिर मुंडाते ही,हास्य  )

(1) 
सिर मुंडाया 
दुकान से निकले 
ओले बरसे 
(२)…
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Added by rajesh kumari on May 21, 2012 at 1:00pm — 27 Comments

जिंदगी रूठ के मुझसे कहीं खोई होगी

जिंदगी रूठ के मुझसे कहीं खोई होगी 

तकिये में मुंह छिपाकर रोई होगी 

जल गई थी जो अरमानों की फसल 

यंकी नहीं कि फिर से बोई होगी 

बढ़ गई होंगी जब दिल की बेताबियाँ 

टूटी मेरी तस्वीर फिर संजोई होगी

मैं जानता हूँ हाल इस वक़्त भी उसका  

शबनम ओढ़ के पलकों पे सोई होगी  

                 ***** 

Added by rajesh kumari on May 19, 2012 at 6:21pm — 25 Comments

चल वहीँ पे नीड़ बनायें हम

              चल वहीँ पे नीड़ बनायें हम 

जहां सुन्दर परियां रहती हों …

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Added by rajesh kumari on May 16, 2012 at 10:30am — 38 Comments

कुछ क्षणिकाएं ( ख़याल )

(1)

कई दिनों से 

सफ़ेद चादर के फंदे ने 

गला घोंट रखा था 

आज धूप से गले  मिलकर 

खुल के रोये चिनार

(2)

हाथी दांत की चूड़ियाँ

बाजार में देखी तो ख़याल आया 

कि कहीं कल इंसान 

की अस्थियों के लाकेट

तो नहीं आ जायेंगे बाजार में

(3) 

तेरी इस ग़ज़ल के कुछ शब्दों से 

लहू रिस रहा है 

लगता है कहीं से बहुत बड़ी 

चोट खाकर आये हैं 

तभी तो दर्द से बरखे 

यूँ फडफडा रहे…

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Added by rajesh kumari on May 14, 2012 at 10:49am — 23 Comments

हाँ मैं कमजोर हूँ माँ हूँ ना!!!

कितना जोश और ख़ुशी 

थी तुम्हारी आवाज में 

जब तुमने मुझे फोन पर बताया 

की माँ तुम्हारे दामाद ने 

आज पांच आतंकवादियों 

को मार गिराया 

तुम लगातार ख़ुशी से बता 

रही थी और मेरा मन 

कंहीं दूर किसी धुंधलके 

की तरफ खिंचता जा रहा था 

तुम्हारी आवाज दूर होती जा रही थी 

कुछ क्षण बाद वापस आती हूँ तो सोचती हूँ 

की तुम कितनी बहादुर हो 

बिलकुल अपने 

जांबाज पति की तरह 

मुझे गर्व है तुमपर 

मेरी…

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Added by rajesh kumari on May 12, 2012 at 12:47pm — 5 Comments

माँ तुम्हें कहाँ से लाऊं ???

वो छोटी सी पगडण्डी 
जिसकी नुकीली झाड़ियाँ 
अपने हाथों से काटकर 
बनाई थी तुमने मेरे चलने के लिए, 
आज वो कंक्रीट की सड़क बन गई है 
जो पौधा अपने आँगन 
में लगाया था तुमने, 
वो सघन दरख़्त बन गया है 
नई- नई कोंपले 
भी निकल आई हैं उसपर 
जो नन्हा दिया जलाया 
था तुमने मुझे रौशनी देने के लिए 
वो अब आफताब बन गया है 
तुम्हारे उस कच्ची माटी के…
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Added by rajesh kumari on May 10, 2012 at 1:45pm — 17 Comments

रंगों का राजा

खोल दिए पट श्यामल अभ्रपारों ने 

मुक्त का दिए वारि बंधन 

नहा गए उन्नत शिखर 

धुल गई बदन की मलिनता …

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Added by rajesh kumari on May 4, 2012 at 10:30am — 20 Comments

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