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ग़ज़ल - कल पराया जो लगा था, आज प्यारा हो गया ( गिरिराज भंडारी )

2122     2122     2122     212

अश्क़ ऊपर जब उठा, उठ कर  सितारा हो  गया

जा मिला जब अश्क़ सागर से, वो खारा हो गया

 

चन्द  मुस्कानें  तुम्हारी शक़्ल में  जो पा लिये

आज दिन भर के  लिये अपना ग़ुजारा  हो गया

 

चाहतें जब  इक हुईं , तो  दुश्मनी  भूले  सभी   

कल पराया जो लगा था, आज  प्यारा  हो गया

 

ढूँढ  कर  तनहाइयाँ  हम  यादों  में मश्गूल थे

रू ब रू आये  तो  यादों  का  खसारा हो  गया

 …

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Added by गिरिराज भंडारी on December 24, 2014 at 6:00pm — 40 Comments

ग़ज़ल : डर लगता है

अपनी ही परछाई से डर लगता है

मुझको इस तन्हाई से डर लगता है

 

साथ देखकर भाईयों का जग डरता

भाई को अब भाई से डर लगता है

 

मनमोहक है भोलापन उसका इतना

दुनिया की चतुराई से डर लगता है

 

मौन रहूं या झूठ कहूं उलझन में हूं

लोगों को सच्चाई से डर लगता है

 

सारा जीवन सहराओं में भटका हूं

मुझको अब अमराई से डर लगता है

 

कानों में इक सिसकी सीसा घोल गई

मुझको अब शहनाई से डर लगता है

 

ग़म…

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Added by khursheed khairadi on December 24, 2014 at 3:30pm — 10 Comments

गज़ल ज़िन्दगी जाती सरकती..... सीमा हरि शर्मा

जिंदगी जाती सरकती

ज़िन्दगी जाती सरकती।
लाख पकड़ो कब ठहरती।

जो भी पल समझा मुकम्मल।
फिर नई इक दौड़ चलती।

सूर्य समझा जो सहर का।
शाम थी लाली फिसलती।

थक चुका है जिस्म चलते।
चाह से क्या जां निकलती।

धुन्द जब है कुछ पलों की।
रश्मि आखिर क्यों अटकती।

झूमती दिखती जो डाली।
आँधियों से है सिहरती।

रात से लड़ता है दीपक।
आस सुबहा की मचलती।
सीमा हरि शर्मा 24.12.2014
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by seemahari sharma on December 24, 2014 at 12:43pm — 18 Comments

मर्द (कहानी )

“ मास्टर जी ,अपने दोस्त से पूछिए अगर मेरे लिए कोई जगह हो तो थोड़ी सिफारिश कर दे |” जब विजय मुझसे ये बात कहता है तो मेरे मन में उसके लिए नैसर्गिक साहनभूति फूटती है |मैं पहले से उसकी नौकरी को लेकर फिक्रमंद हूँ और पहले ही कई दोस्तों से उसके बारे में बात कर चुका हूँ |

कुछ लोग होते हैं जो चुम्बक की तरह अपनी तरफ खींचते हैं |विजय में मुझे वही चुम्बकत्व महसूस होता है | गोरा वर्ण ,5”6’ का कद सुघड़ अंडाकार चेहरा ,घुंघराले काले बालों के बीच में कहीं-कहीं सफ़ेद हो गए बाल ,आत्मीयता और उचित मिठास से…

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Added by somesh kumar on December 24, 2014 at 11:30am — 4 Comments

ग़ज़ल - गुज़ारिश थी, कि तुम ठोकर न खाना अब

ग़ज़ल श्री गिरिराज भंडारी जी की नज्र ...





गुज़ारिश थी, कि तुम ठोकर न खाना अब

चलो दिल ने, कहा इतना तो माना अब



न काम आया है उनका मुस्कुराना अब

यकीनन चाल तो थी कातिलाना .... अब ?



ये दिल तो उन पे अब फिसला के तब फिसला

ये तय जानो, नहीं इसका ठिकाना अब



जो दानिशवर थे सब नादान ठहरे हैं

ये किसका दर है, तुमको क्या बताना अब

ये मौसम खूबसूरत था ये माना पर

वो आये तो हुआ है शायराना अब …



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Added by वीनस केसरी on December 24, 2014 at 5:00am — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
किसी खामोश बैठी शायरी से : ग़ज़ल (मिथिलेश वामनकर)

1222-1222-122

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अदावत क्या करे कोई किसी से

परेशां हर कोई जब ज़िन्दगी से



अकीदत आपकी सूरज से लेकिन

हमारी   बेरुखी  है  रौशनी  से



पसीना लफ्ज़ बनकर बह रहा है

किसी  खामोश  बैठी शायरी से



अता जिसको कभी शोहरत नहीं है

कहाँ  मिलते  है ऐसे  आदमी से



सदा सूरज के आगे क्यों सिमटती

किसी  ने  प्रश्न  पूछा चांदनी से



हुकूमत जुल्म किस पर कर रही है

सभी  खामोश  अपनी  बेबसी  से…

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Added by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2014 at 1:00am — 36 Comments

मेरी हाथ की वो किताब हो..........

जिसे उम्र भर मैं सुना किया ,

जिसे चुपके-चुपके पढा किया ,

मैं समझ सका न जिसे कभी ,

मेरी हाथ की वो किताब हो ।।



एक बाल था मिरी पलक का ,

जो छुपा रहा मिरी आँख में ,

मुझे जिसकी फिक्र न थी कभी ,

मेरी जिन्दगी का वो ख्वाब हो ।।



जो ठहर गयी मेरी फिक्र थी ,

जो सॅवर गया तेरा ख्याल था ,

जो उतर गयी मेरे दिल के आँगन में ,

वो ठण्डी छॉव हो ।।



तेरे इन्तजार का सिलसिला ,

कभी टूूटता तो मैं जानता ,

मुझे मिला…

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Added by ajay sharma on December 23, 2014 at 10:30pm — 9 Comments

एक धरा है एक गगन है

एक धरा है एक गगन है

किंतु विभाजित अपना मन है

 

मीत किसी का ख़ाक बनेगा

उसकी ख़ुद से ही अनबन है

 

याद तुम्हारी महकाये मन

इस सहरा में इक गुलशन है

 

स्वर्ग तिहारे चरणों की रज

मातृधरा तुझको वंदन है

 

चौक बड़ा सा एक चबूतर

यादों में कच्चा आँगन है

 

नहीं बहलता खुशियों से मन

ग़म से अपना अपनापन है

 

आँसू बाती आँखें दीपक

दुख की लौ में सुख रोशन है

 

घाव दिये…

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Added by khursheed khairadi on December 23, 2014 at 12:30pm — 22 Comments

तहकीक़े हयात

आज फुर्सत मे जो बैठा तो ध्यान आया है
हमने क्या खो दिया है और क्या बनाया है

वार हर बार तो होते ही रहे पीछे से
जब किसी दोस्त ने हमको गले लगाया है

कोई आवाज नही राख कोई शोला भी
ज़िन्दगी तूने हमे खूब क्या जलाया है

कोई तो एब हमारा ही रहा होगा ही
हमने हरबार जो रूठों को फिर मनाया है

मौत भी खाक 'ऋषी' रोकेगी मेरा रस्ता
मुझको मॉं बाप के आशीष ने बनाया है

अनुराग सिंह "ऋषी"

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Anurag Singh "rishi" on December 23, 2014 at 10:06am — 10 Comments


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कोई कारवां भी दिखा नही / ग़ज़ल (मिथिलेश वामनकर)

11212 x 4  ( बह्र-ए-क़ामिल में पहला प्रयास) 

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न वो रात है, न वो बात है, कहीं ज़िन्दगी की सदा नहीं   

न उसे पता, न मुझे पता, ये सिफत किसी को अता नहीं

 

वो खुशी कभी तो मिली नहीं, मेरी किस्मतों में रही कहाँ

कोई दश्त जिसमे नदी न हो, हूँ शज़र कभी जो फला…

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Added by मिथिलेश वामनकर on December 23, 2014 at 1:30am — 48 Comments

प्रभाव-क्षेत्र

प्रभाव-क्षेत्र

अलग होना ही पर्याप्त नहीं है

मुखर होना भी जरूरी है

प्रखर होना और भी जरूरी है

इसी से बनती है पहचान

लोग यूँ ही नहीं सौपते अपनी कमान |

तीर सिर्फ विरोध के…

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Added by somesh kumar on December 22, 2014 at 11:00pm — 11 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी

२१२२  २१२२ २१२

तुमने पुरखों की हवेली बेच दी

शान दुःख सुख की सहेली बेच दी

भूख दौलत की मिटाने के लिए

मौत को दुल्हन नवेली बेच दी

जिस्म के बाजार ऊंचे दाम थे

गाँव की राधा चमेली बेच दी

बस्ता बचपन और कागज़ छीनकर

तुमने बच्चों  की हथेली बेच दी

गाँव में दिखने लगा बाज़ार पन

प्यार सी वो गुड की भेली बेच दी

मौलिक व अप्रकाशित

गुमनाम पिथौरागढ़ी

Added by gumnaam pithoragarhi on December 22, 2014 at 5:57pm — 19 Comments

नववर्ष दोहे

विभु से मांगो मित्र तुम, अब ऐसा वरदान

नये  वर्ष में शांत हो, मानव का शैतान

 

हो न धरा अब लाल फिर, महके मनस प्रसून

किसी अबोध अजान का, नाहक बहे न खून

 

सबके जीवन में खुशी, छा जाए भरपूर

अच्छे  दिन ज्यादा नहीं, भारत से अब दूर

 

कवि गाओ वह गीत अब, जिससे सदा विकास

तन में हो उत्साह प्रिय, मन में हो उल्लास

 

आपस में सद्भाव हो, सभी बने मन-मीत

ओज भरे स्वर में कवे, महकाओ कुछ गीत 

 

ऐसा जिससे नग…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 22, 2014 at 3:00pm — 44 Comments

नवगीत : ये है नया नजरिया.

फटी भींट में चौखट ठोकी,

खोली नयी किवरिया.

चश्मा जूना फ्रेम नया है,

ये है नया नजरिया.

 

गंगा में स्नान सबेरे,

दान पूण्य कर देंगे.

रात क्लब में डिस्को धुन पर,

अधनंगे थिरकेंगे.

देशी पी अंग्रेजी बोलीं,

मैडम बनीं गुजरिया.

 

अपने नीड़ों से गायब हैं,

फड़की सोन चिरैया.

ताल विदेशी में नाचेंगी,

रजनी और रुकैया.

घूंघट गया ओढनी गायब,

उड़ती जाए चुनरिया.

 

चूल्हा चक्की कौन करे…

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Added by harivallabh sharma on December 22, 2014 at 1:55pm — 24 Comments

हुकूमत

हुकूमत हाथ में आते, नशा तो छा ही जाता है,

अगर भाषा नहीं बदली, तो कैसे याद रक्खोगे.

किये थे वादे हमने जो, मुझे भी याद है वो सब,

मनाया जश्न जो कुछ दिन, उसे तो याद रक्खोगे.

मुझे दिल्ली नहीं दिखती, समूचा देश दिखता है,   

बिके हैं लोग…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on December 22, 2014 at 1:30pm — 17 Comments


मुख्य प्रबंधक
हास्य घनाक्षरी : ईलाज (गणेश जी बागी)

छंद : घनाक्षरी 

झट छायी चिंता-रेखा,

नीला-नीला पाँव देखा,

पहुँचे करीम चच्चा, शफ़ाख़ाना आस में.

देखते हकीम बोला,

पाँव में ज़हर फैला,

दोनों पाँव काट डाले, ज़िन्दग़ी की आस में.

बात हुई ज़ल्द साफ़,

कट गये पर पाँव,

डरता हकीम आया, चच्चा जी के पास में.

सुनो जी करीम भाई,

बात ये समझ आई,

लुंगी रंग छोड़ रही, बोला एक साँस में.…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 22, 2014 at 12:00pm — 33 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कुछ नक्शा बदला है \ माहिया, क़िस्त-तीन (मिथिलेश वामनकर)

मेरा मन दरपन है।

देखी छब तेरी,

आँखों में सावन है।

 

वो पागल लडकी है।

ऐसी बिछडन में.

वो कितना हँसती है।

 

क्यूँ उलटा चलते हो।

वक़्त सरीखे तुम,

हाथों से फिसलते हो।

 

जब शाम पिघलती है।

ऐसे आलम में,

क्यूं रात मचलती है।

 

सूरज को मत देखों ।

उसका क्या होगा,

चाहे पत्थर फेंकों ।

 

सूरज ने पाला है।

हँसता रातों में,

ये चाँद निराला…

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Added by मिथिलेश वामनकर on December 22, 2014 at 9:03am — 25 Comments

परिवर्तन

बदल रहा समाज बदल रहा कल आज

बीच चौराहे आ जाती अक्सर घर को लाज

सामान्य से हो रहे विवाहेत्तर सम्बन्ध

धुंधले से पड़ गये, दिल के सब अनुबंध

हर किसी को चाहिए जरुरत से ज्यादा "मोर"

भौतिकता जागी है सारे बंधन तोड़

जितना मिले उतना जगे, ज्यादा पाने की आस

कम हो गयी सहनशीलता बढ़ गयी है प्यास

हर किसी को चाहिए अस्तित्व की खोज

कमजोर हो रहे है रिश्ते, दरक रहे है रोज

आया नया ज़माना है कुछ खोकर कुछ पाना…

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Added by sarita panthi on December 21, 2014 at 8:02pm — 13 Comments

इश्क की हद से, गुज़र कर देखा...

इश्क की हद से गुज़र कर देखा,

जीते जी हमने तो मर कर देखा।

राह में तेरा वो बिछड़ जाना,

कितना तनहा सा वो सफ़र देखा।

छोड़कर तुझको जब हुए रुखसत,

हमने कई बार पलटकर देखा।

काश तू फिर कहीं पे मिल जाए,

हर गली हमने ढूँढकर देखा।

ख्वाब में भी कभी तो तू आये,

हमने नींदों में जागकर देखा।

होके तनहा सदा न देता हो,

आहटों पे भी गौर कर देखा।

ऊषा पाण्डेय.

अप्रकाशित व…

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Added by Usha Pandey on December 21, 2014 at 8:00pm — 9 Comments

ये शज़र आज भी......

अपने  वज़ूद  की  ख़बर   इस तरह  हम  देते हैं

मुट्ठी  में  रेत उठाकर  हम  हवा  में उड़ा देते हैं



क्या हुआ जो  इस  उम्र में  हम बे-समर हो गए

ये शज़र आज भी  गुज़री  बहारों  की हवा देते हैं



अब हंसी भी  लबों पे  पैबंद  सी  नज़र  आती हैं

जाने लोग आँखों में कैसे नमी को  छुपा  लेते हैं



रुख से चिलमन उठते ही नज़रें भी बहकने लगी

हम भी बेजुबानों की तरह पैमाने को उठा लेते हैं



जागते  रहे  तमाम  शब्  हम  उसके इंतज़ार में

बार बार  चरागों…

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Added by Sushil Sarna on December 21, 2014 at 7:00pm — 16 Comments

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