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मिलन की बात है असंभव

तुम कंचन हो,

मै कालिख हूँ!

तुम पारस, मै

कंकड़ इक हूँ!

 

तुम सरिता हो,

मै कूप रहा!

तुम रूपा, इत

ना रूप रहा!

जो मानव नहीं है उसको, देव की पांत है असंभव!

है तुलना न अपनी कोई, मिलन की बात है असंभव!

 तुम ज्वाला हो,

मै…

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Added by पीयूष द्विवेदी भारत on September 11, 2012 at 2:30pm — 58 Comments

दोपहर शाम शब् सहर जन्नत

दोपहर शाम शब् सहर जन्नत

हर घडी आ रही नज़र जन्नत



वक्ते फुरकत लगा जहन्नम सा

खंडहर हो गया है घर जन्नत



भूलना आपको हुआ मुश्किल

याद कर कर के हर पहर जन्नत



जिन्दगी किस तरह जियें तुझको…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 11, 2012 at 2:08pm — 4 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- २६

तेरे बगैर मज़ाभी क्या आये जीने का

शराब न हो तो क्या हो आबगीने का

 

तेरी ज़ुल्फ़से दोचार नफ्स मांग लेतेहैं

तेरेही इश्कने काम बढ़ाया है सीने का   

 

तू नमाज़ी है तो पाबन्द है औकातका

मैं खराबाती हूँ कोई वक्त नहीं पीनेका

 

नतुम न दरियएइश्क पार करनेको है

नाखुदा है खुदा काम क्या सफीने का

        

राज़ ज़रा संभल के खर्च करो मआश

अभीतो पूरा महीना पड़ा है महीने का    

 

© राज़…

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Added by राज़ नवादवी on September 11, 2012 at 7:45am — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दोहे – कालजयी साहित्य

मान और सम्मान की,नहीं कलम को भूख

महक  मिटे  ना पुष्प  की , चाहे जाये सूख |

 

खानपान  जीवित  रखे , अधर रचाये पान

जहाँ  डूब कान्हा मिले , ढूँढो वह रस खान |…

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Added by अरुण कुमार निगम on September 11, 2012 at 12:00am — 14 Comments

कवि-सम्मेलन का आयोजन (हास्य) // शुभ्रांशु

आज सुबह-सुबह बड़कऊ का बेटा कविता ’पुष्प की अभिलाषा’ पर रट्टा मार रहा था  --"चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ.. ." मैथिली शरण गुप्त जी ने बाल कविता लिखी है. शब्दों का चयन, सन्निहित भाव सबकुछ कालजयी है. आँखो को मूँदे कविता को आत्मसात करता हुआ मन ही मन राष्ट्रकवि को नमन किया. अभी मन के दरवाजे पर कुछ और शुद्ध विचार दस्तक देते कि घर के दरवाजे पर दस्तक हुई. सारे शुद्ध विचार एक बारगी हवा हो गये.. "कौन कमबख़्त सुबह-सुबह फ़ोकट की चाय पीने आ गया, यार ?"  झुंझलाता-झल्लाता…

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Added by Shubhranshu Pandey on September 10, 2012 at 9:00pm — 11 Comments

सपनों का भारत

ये तो नही है
सपनों का भारत
देश ये मेरा

जला असम
कश्मीर में आग
सुलगे देश

आतंकवाद
का भारत देश में
है बोलबाला

भटक रहा
दर दर ईमान
फलता पाप

हुए पराये
हम भारत वासी
देश अपना

कोलगेट पे
मच रहा बवाल
है मुहं काला

ये तो नही है
सपनों का भारत
देश ये मेरा

Added by Rekha Joshi on September 10, 2012 at 8:00pm — 20 Comments

जागरूक बेटी (लघुकथा)

रामकरन अपनी पत्नी मुनिया से बोले-"श्यामा की अम्मा हमार करेजा तौ मुंहके आवत बाय।श्यामा 14 साल की हुइ गई ओकर सादी करेक हा।"

"हां हो हमहुक इहै चिंता खाये जात बाय।चिट्ठी पाती भरेक पढ़िये चुकी है,अउर इ जमाना बहुत खराब बाय,पता नाहीं कहां ऊंचे नीचे पैर परि जाय,समाज में नाक कटि जाय।............तौ कहूं,कवनो लरिका देख्यो सुनयो नाई?"-मुनिया ने प्रश्न वाचक दृष्टि से देखते हुए कहा।

"रमई के लरिका मुनेसर हैं बम्मई कमात हैं औ उमरियो ढेर नाई 24-25 साल होई।"-रामकरन ने कहा।

श्यामा पास ही आंगन में… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on September 10, 2012 at 7:18pm — 29 Comments

कितना रोता है

दर्द अगर न मिलता तो 
क्या जानते कैसा होता है
हमको सताकर वोह भी 
शायद कितना रोता है 
********
हादसों नें मुझको कहीं का न छोड़ा
फिर भी हमने दोस्तो  जीना नहीं छोड़ा
हर हाल में जीते रहे हम हँस हँस के यारो
घूँट दर्द-ओ-ग़म  का  पीना नहीं छोड़ा    
दीपक कुल्लुवी  

Added by Deepak Sharma Kuluvi on September 10, 2012 at 4:42pm — 4 Comments

हो गया है मेरा शहर जन्नत

शाम जन्नत हुई सहर जन्नत

आप आये हुआ ये घर जन्नत



जो पड़े हैं कदम तुम्हारे यूँ     

हो गया है मेरा शहर जन्नत



राह मुश्किल भरी रही लेकिन 

आपके साथ था सफ़र जन्नत



ख्वाब क्या और क्या हकीकत में…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 10, 2012 at 3:00pm — 16 Comments

घर की मुर्गी



घर की मुर्गी

 

 

हिन्दोस्तान में हिंदी की

बेकद्री इतनी होती…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on September 10, 2012 at 2:24pm — 3 Comments

"मौलिक संतान"

"मौलिक संतान"



कोख

माँ की कोख

प्यारी न्यारी

जीव का प्रारंभ

उसकी जन्नत

माँ की कोख

सबसे खूबसूरत

कोई शै नहीं

इस सारे जहाँ…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 10, 2012 at 1:25pm — 2 Comments

मेरे सपनो का भारत

मेरे सपनो का भारत ऐसा तो नहीं था

इतना कमजोर , इतना खोखला

ऐसा देश तो मैंने कभी चाहा ही नही था

बाहर से जितना साफ अंदर से उतना ही गन्दा

मेरे सपनो का भारत ....................



सोचा था मैंने तो कि ये चमन खूब महकेगा

अपने परिंदों के चहकने से खूब चहकेगा

मगर ये क्या --- इसे तो इसके ही फूलो ने कांटे चुभोये

लहू देशभक्तों का बो कर भी गद्दार उगाये

मेरे सपनो का भारत ये तो नहीं था

मेरे सपनो का भारत ऐसा ......................

.

मैंने चाहा…

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Added by Sonam Saini on September 10, 2012 at 9:30am — 10 Comments

यादगारे अकबर इलाहाबादी : शायरों और कवियों ने याद किया तंज़ ओ मजाह की नींव अकबर इलाहाबादी को

आज ९ सितम्बर २०१२, रविवार को इलाहाबाद के वर्धा विश्वविधालय क्षेत्रीय सभागार में एक काव्य गोष्ठी सह मुशायरा का आयोजन किया गया जिसमें अकबर इलाहाबादी को उनकी पुन्य तिथि पर श्रद्धा सुमन अर्पित किया गया | कार्यक्रम की शुरुआत अकबर इलाहाबादी साहब के चित्र पर माल्यार्पण से हुयी | तत्पश्चात इलाहाबाद के तंज़ ओ मजाह के सशक्त हस्ताक्षर फरमूद इलाहाबादी साहब ने तंज़ ओ मजाह के महान शायर अकबर इलाहाबादी साहब को याद करते हुए अकबर साहब की ग़ज़ल के चंद अशआर पढ़े तथा उसके पश्चात सभी कवियों…

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Added by वीनस केसरी on September 10, 2012 at 2:00am — 1 Comment

चाँद

पेड़ों के झुरमुट में
छुप छुप भरमाता है
मेघों के अंचल में
अटक अटक जाता है
यायावर सा फिरता
 मतवाला चाँद
उषा- रश्मियों से घिर
 धुंधलाता जाता है
 अरुणाभा में, नभ की
डूबता- उतराता है
चलाचली की बेला 
कहता सूरज को विदा 
पवन से पराग की
पीकर हाला चाँद


Added by Vinita Shukla on September 9, 2012 at 9:43pm — 3 Comments

जल सत्याग्रह

--------२२७

ख़राब ग्रह!!

ये जल सत्याग्रह…

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Added by AVINASH S BAGDE on September 9, 2012 at 5:27pm — No Comments

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने- ३७ (मेरी बेटियों की जोड़ी को लिखा एक पत्र )

राज़ नवादवी: मेरी बेटियों की जोड़ी को एक पत्र

-------------------------------------------------- -----------

 

मेरी प्यारी बेटियों साशा और नाना,

 

मुझे आप दोनों की दुनियावी तकलीफों और दर्द के बारे में जानकार बहुत दुःख है. मुझे ऐसा लगता है कि घर से मेरा मुसलसल (लगातार) दूर रहना भी इनकी एक वजह है, मगर शायद फिलहाल मेरी ज़िंदगी कुछ ऐसी है कि इसमें जुदाई और फुर्कत (विरह) का साथ अभी और बाकी है.

 

मेरी दरख्वास्त है कि कभी अपना हौसला मत खोना क्यूंकि…

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Added by राज़ नवादवी on September 9, 2012 at 2:03pm — No Comments

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने- ३७ (मेरी बेटियों की जोड़ी को लिखा एक पत्र )

राज़ नवादवी: मेरी बेटियों की जोड़ी को एक पत्र

-------------------------------------------------- -----------

 

मेरी प्यारी बेटियों साशा और नाना,

 

मुझे आप दोनों की दुनियावी तकलीफों और दर्द के बारे में जानकार बहुत दुःख है. मुझे ऐसा लगता है कि घर से मेरा मुसलसल (लगातार) दूर रहना भी इनकी एक वजह है, मगर शायद फिलहाल मेरी ज़िंदगी कुछ ऐसी है कि इसमें जुदाई और फुर्कत (विरह) का साथ अभी और बाकी है.

 

मेरी दरख्वास्त है कि कभी अपना हौसला मत खोना क्यूंकि…

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Added by राज़ नवादवी on September 9, 2012 at 2:03pm — 4 Comments

मेघ...संग ले चल मुझे भी

मेघ...संग ले चल मुझे भी

स्वच्छंदता के रथ पर बिठा के

उड़ा के दूर

उन्मुक्त, अनंत गगन में

अपनी प्रज्ञात ऊँचाइयों पर

सभी बंधनों से परे

निराकार, निर्विकार रूप में

व्यापक बना के अपने

नयनाभिराम नीलिमा से सुसज्जित

नीरवता की विपुल राशि

हिमावृत सदृश भवनों वाले

अप्रतिम बहुरंगी छटाओं से युक्त

मंत्रमुग्ध करते दृश्यों से शोभित

अथाह सौन्दर्य के मध्य विराजमान

अलभ्य संपदा से संपन्न

किसी स्वप्नलोक का भान कराते…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 9, 2012 at 9:27am — 4 Comments

ग़ज़ल - बचा है अब यही इक रास्ता क्या

दोस्तों, ग़ज़ल पेश ए खिदमत है गौर फरमाएं ..



बचा है अब यही इक रास्ता क्या

मुझे भी भेज दोगे करबला क्या



तराजू ले के कल आया था बन्दर

तुम्हारा मस्अला हल हो गया क्या…



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Added by वीनस केसरी on September 9, 2012 at 2:30am — 13 Comments

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