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सदस्य टीम प्रबंधन
मतिमूढ़.. .

 

आज लगते ही तू लगता है चीखने

"आ ज़ाऽऽऽ दीऽऽऽऽऽऽऽऽ...."

घोंचू कहीं का.

मुट्ठियाँ भींच

भावावेष के अतिरेक में

चीखना कोई तुझसे सीखे .. मतिमूढ़ !

 …

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Added by Saurabh Pandey on August 15, 2012 at 11:30am — 43 Comments

रंग बिरंगा देश

रंग बिरंगा देश है मेरा 

रंग बिरंगी शान है 

सारी दुनिया कहती है , सुनलो … 

भारत देश महान है !



रंग बिरंगे लोग यहाँ पर 

रंग बिरंगी संस्कृति 

विश्व नक़्शे पर है बनी 
सबसे सुन्दर सी आकृति 


लोग यहाँ रहते हैं मिलकर 

सबका साथ निभाते हैं 

ईद , होली हो या बैसाखी 

मिलकर जश्न मनाते हैं 



रंग बिरंगे मौसम…
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Added by Ranveer Pratap Singh on August 15, 2012 at 11:30am — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
परम मित्र दिनेश रविकर के जन्म-दिन पर ......

" बधाई – कुण्डलिया "



ओ.बी.ओ.  के फलक पर ,  देखा  है संदेश

मना रहे हैं जन्म-दिन ,  गुप्ता चंद्र दिनेश

गुप्ता  चंद्र  दिनेश  ,  कहे जाते हैं रविकर…

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Added by अरुण कुमार निगम on August 15, 2012 at 10:19am — 4 Comments

उपकार को नमन

आता है हर साल मेरे राह में गुजर

शहिदों की यादें लिए त्यौहार को नमन

वो तो चले गये जो सदा रहेंगें अमर

उनके खूँ के गर्मी के उपकार को नमन

सम्हालना था जिन्हें इस देश की डगर

जाने कहाँ खो गये उनका भी हो नमन

लूटने…

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Added by UMASHANKER MISHRA on August 15, 2012 at 1:20am — 6 Comments

वतन पर नाज़

है मुझे अपने वतन पर बड़ा ही नाज़ 

 जहाँ हर कदम पर है एक नया साज़ 
कहीं खुशियाँ तो कहीं गम की आवाज़ 
कहीं उल्लास तो कहीं उदास 
कहीं मिठास तो कहीं खटास
कहीं कल की चिंता तो कहीं गीत गुनगुनाता आज 
कहीं उगता हुआ…
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Added by Rohit Dubey "योद्धा " on August 14, 2012 at 11:57pm — 1 Comment

आवाज़ दो हम एक है

''

ओ बी ओ के सभी सदस्यों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 

दिशा जागो तुमने आज कालेज जाना है न ''जागृति  ने अपनी प्यारी बेटी को सुबह सुबह जगाते हुए कहा |दिशा ने नींद में ही  आँखे मलते हुए कहा ,''हाँ माँ आज स्वतंत्रता दिवस है , हमे अपने कालेज के ध्वजारोहण समारोह में जाना है और इस राष्टीय पर्व को मनाने के लिए हमने बहुत बढ़िया कार्यक्रम  भी तैयार किया हुआ है ,''जल्दी से दिशा  ने अपना बिस्तर छोड़ा और कालेज जाने की तैयारी में जुट गई| दिशा को कालेज भेज कर जागृति…

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Added by Rekha Joshi on August 14, 2012 at 11:00pm — 2 Comments

कवि तेरे भी

कवि तेरे भी



कवि तेरे भी मन में

कोई तो विरहिणी

रहती है

श्‍वेत शीत पड़ी

किरण देह सी…

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Added by राजेश 'मृदु' on August 14, 2012 at 10:30pm — 6 Comments

सिमटते दायरे

सिमटते दायरे

मजहब और कौम के दायरे में

हम सिमट गए;

इन्सान की इंसानियत से

हम भटक गए.

जो गलियां-ओ-कूँचे रौशन थे

गुल्जरों से;

वो  इन्सान की दरिंदगी  से

वीरान हो गए.

जो कहते थे;

बहिश्त जमीं पे लायेंगे,

वो गैरों के टुकड़ों…

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Added by Veena Sethi on August 14, 2012 at 5:30pm — 3 Comments

"परमवीर चक्र"

"परमवीर चक्र"



लहूलुहान

मांस के लोथड़ों को

देखने वालों की

रूह कांप उठी

पत्नी माँ बाप

बच्चे पत्थर हो गए

उन पत्थरों को

पिघलाने…
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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on August 14, 2012 at 3:25pm — 4 Comments

भारत की पहचान यही धन धान यही अभिमान तिरंगा

==========मत्तगयन्द सवैया ============



भारत देश विशाल पुनीत यहाँ सबकी इक आन तिरंगा |

प्राण निछावर वीर करे इसकी खातिर यह शान तिरंगा |

केसरिया प्रिय श्वेत हरा अरु चक्र अशोक निशान तिरंगा |

भारत की पहचान…
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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on August 14, 2012 at 2:52pm — 1 Comment

कब तक

कब तक
करोड़ों ऑलंपिक तेय्यारी में लगे
करोड़ों वांटनें में लग जाएँगे
हम एक सो इकीस करोड़ मूर्ख
यूँ ही खुश हो जाएँगे
इस गरीब देश के लिए
यह नाज़ बहुत महंगा है
कब तक छह तगमों के लिए
हम इतना जश्न…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on August 14, 2012 at 2:39pm — 3 Comments

भारत माँ की लाज बचाने

हे भारत के लोगों जागों 

खेतिहर मजदूर,किसानो जागो
फिरसे  मोर्चा संभालो रे 
आंतकवादी घुसआये देश में, 
बाहर उन्हें निकालो रे  |
कलम के धनी लेखकों जागों …
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 14, 2012 at 2:30pm — 3 Comments

बचपन !

बचपन !

आज मन मेरा फिर मुस्कुराया है 

बचपन का दिन आज याद मुझे आया है 

यादों ने फिर एक गीत सुनाया है 

बचपन का दिन आज याद मुझे आया है…

 

स्कूल से घर आकर बसते का पटकना

तपती हुई धुप में बस यूँ ही भटकना

आइने के सामने मस्ती में मटकाना

पापा के कंधे पर जबरन…

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Added by Ranveer Pratap Singh on August 14, 2012 at 1:12pm — No Comments

इंतहा

इंतहा


किसी वैश्या को देख
मुझे नफरत नहीं होती
देख उसकी बेबसी
मेरी आँख है रोती
लुटे अरमान उसके
दिल से में महसूस करता हूँ
दर्द की ऐ-दोस्तों
कोई इंतहा नहीं होती
कभी देखा…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on August 14, 2012 at 12:41pm — 2 Comments

बेटियां मरती नहीं (छंदमुक्‍त)

ऑनर किलिंग पर एक रचना

 

बेटियां मरती नहीं

मेरे बालों में

वही फूलोंवाली क्लिप

अभी भी लगी है

और फैली है

मेरे चेहरे पर

तुम्‍हारी…

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Added by राजेश 'मृदु' on August 13, 2012 at 9:50pm — 7 Comments

भ्रष्टाचार की जड़ें (कहानी)

रामानुज के छोटे भाई शिवशंकर अन्तरिक्ष संचार विभाग में कार्यरत थे |विभाग के उपमहा प्रबंधक धोकलराम पंवार ने शिवशंकर को आकाशपुर की स्टेशनरी फर्मो से निविदाए एवं साथ में बंद लिफाफे एकत्रित कर प्रस्तुत करने का कार्य करने का निर्देश दिया | डी.जी.एम् धोकलराम पंवार को उसने बताया कि उसकी सेवा निवृति होने में अब 15 माह का समय ही शेष बचा है, अतः यह कार्य किसी अन्यसे सम्पादित करावे | डी.जी.एम्. पंवार ने कहा कि सेवा निवृति से पूर्व,मै चाहता हूँ कि आप भी लाभ ले लो,फिर आपकी इमानदार छवि के चलते किसी को कोई…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 13, 2012 at 4:00pm — 9 Comments

"शहरीकरण"

"शहरीकरण"



संस्कृति

चीखती कराहती

बिलखती



अपने चिरंजीवी

होने के अभिशाप को लिए

नग्न पड़ी है

आधुनिकता के गुदगुदे बिस्तर पे

उसकी इज्ज़त तार तार करने वाले…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on August 13, 2012 at 2:03pm — 8 Comments

किसके मन में नहीं वेदना

किसके मन में नहीं वेदना
विकल प्राण की धरणी है
कौन प्रतापी धूसर पग से
पार हुआ वैतरणी है ?
किसके मन में ......

कौन विधु परिपूर्ण कला से
गगन खिला अभिराम लला से
कल्‍पवृक्ष यहां किसे मिला है
कौन अमर निर्झरणी है ?
किसके मन में.....

किसके पगतल भंवर नहीं हैं
गुहा-गर्त कुछ गह्वर नहीं हैं
दशो दिशा किसकी पूरब है ?
कौन वृत्‍त विकर्णी है ?

Added by राजेश 'मृदु' on August 13, 2012 at 2:00pm — 6 Comments

एक घनाक्षरी :

घनाक्षरी :

शीश हिमगिरि बना, पांव धोए सिंधु घना,

माँ ने सदा वीर जना, देश को प्रणाम है |

ब्रम्हचर्य जहाँ कसे, आर्यावर्त कहें इसे,

चार धाम जहाँ बसे, देश को प्रणाम है |

वाणी में है रस भरा, शस्य श्यामला जो धरा,…

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Added by Er. Ambarish Srivastava on August 13, 2012 at 2:00am — 15 Comments

उसके आने की डगर अब देखता रहता हूँ मैं

उसके आने की डगर अब देखता रहता हूँ मैं।

लेके टूटे  ख़ाब शब भर जागता रहता हूँ मैं॥

 

रोज़ बनकर चाँद आँगन में मेरे आता है वो,

रोज़ उसकी…

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Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on August 13, 2012 at 1:00am — 8 Comments

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