For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

 

आज लगते ही तू लगता है चीखने
"आ ज़ाऽऽऽ दीऽऽऽऽऽऽऽऽ...."
घोंचू कहीं का.
मुट्ठियाँ भींच
भावावेष के अतिरेक में
चीखना कोई तुझसे सीखे .. मतिमूढ़ !

 

पता है ?........
तेरी इस चीखमचिल्ली को
आज अपने-अपने हिसाब से सभी
अपना-अपना रंग दिया करते हैं.. .
हरी आज़ादी.. .सफ़ेद आज़ादी.. . केसरिया आज़ादी...
लाल आज़ादीऽऽऽ..
नीली आज़ादी भी.

 

कुछ के पास कैंची है
कइयों के पास तीलियाँ हैं.. .
ये सभी उन्हीं के वंशज हैं
जिन्होंने तब लाशों का खुद
या तो व्यापार किया था, या
इस तिज़ारत की दलाली की थी
तबभी सिर गिनते थे, आज भी सिर गिनते हैं..

 
और तू.. .
इन शातिर ठगों की ज़मात को
आबादी कहता है
आबादी जिससे कोई देश बनता है
निर्बुद्धि .... !

जानता भी है कुछ ? इस घिनौने व्यापार में
तेरी निर्बीज भावनाओं की मुद्रा चलती है.. ?

********

--सौरभ

Views: 1192

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 24, 2016 at 2:12pm

हार्दिक धन्यवाद आदरणीय लक्ष्मण प्रसादजी.. 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 24, 2016 at 12:02pm

बहुत  सार्थक कविता जो विद्वजनों में जोश उत्पन्न करे  या फिर खीझ | कारण राजीनीति में अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रश्चिन्ह !

अब यही कह सकते है - 

नेता चलते चाल ये, या कलियुग के देन.

विद्वजनों में कश्मकश, चले सदा दिन रेन | --  इस चिंतन परक रचना  के  लिए बहुत बहुत बधाई आदरणीय 




सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 23, 2016 at 2:27pm

अनुमोदन केलिए हार्दिक धन्यवाद आदरणीय सुशील सरनाजी.. 

Comment by Sushil Sarna on February 23, 2016 at 1:54pm

कुछ के पास कैंची है
कइयों के पास तीलियाँ हैं.. .
ये सभी उन्हीं के वंशज हैं
जिन्होंने तब लाशों का खुद
या तो व्यापार किया था, या
इस तिज़ारत की दलाली की थी
तबभी सिर गिनते थे, आज भी सिर गिनते हैं..

नतमस्तक हूँ आपके इन भावों में छुपे आक्रामक भावों के अद्भुत सम्प्रेषण पर ... रक्त में ऊषणता भरने वाली इस संवेदनशील प्रस्तुति के लिए हृदय से बधाई स्वीकार करें आदरणीय सौरभ सर।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 23, 2016 at 1:40pm

हार्दिक धन्यवाद, इस संप्रेषण को अनुमोदित करने केलिए, आदरणीया कान्ता जी.

एक अरसे बाद कोई इन पंक्तियों से गुजरता दिखा है ! आपके कारण हम भी तनिक नौस्टेल्जिक हो गये.

आपके ही साथ भाई अभिनव अरुण एवं आदरणीय अजय शर्मा जी केप्रति भी धन्यवाद. 

Comment by kanta roy on February 23, 2016 at 11:54am
निर्बुद्धि भी क्या करें बेचारा ! बेहद आक्रामक तेवर यहाँ देखने को मिले आपकी इस कविता में । एक अलग सा सम्प्रेषण है यह । अच्छा लगा । बधाई स्वीकार करें ।
Comment by ajay sharma on October 28, 2013 at 11:13pm

और तू.. .
इन शातिर ठगों की ज़मात को
आबादी कहता है
आबादी जिससे कोई देश बनता है 
निर्बुद्धि .... !

जानता भी है कुछ ? इस घिनौने व्यापार में
तेरी निर्बीज भावनाओं की मुद्रा चलती है.. ?

********teri  nirbeej .........""""...nisandeh .....bahut hi umda rachna huyi hai  guruji  ....rachna behad istariya aur utkrista kahi  ja sakti hai yadi ...binbo aur pratiko ke kya kane  

Comment by Abhinav Arun on August 18, 2013 at 5:17am

अब अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे

 तोड़ने होंगे मठ और गढ़ सब 

क्योंकि अरुण कमल विसंगतियों के आवरण में धुंधला हो रहा है ...मुक्तिबोध याद हो आये आदरणीय आपकी इस बोलती - झंक्झोरती  कविता को पढ़ते हुए ..बहुत सशक्त प्रहारक समीचीन .. सादर प्रणाम अनुज का और इस और ऐसी आजादी की हार्दिक शुभकामनायें भी !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 17, 2013 at 10:48pm

हार्दिक धन्यवाद भाई बृजेश जी.  आपको यह कविता अपने गठन और अपने प्रभाव से संतुष्ट कर पायी.

शुभ-शुभ

Comment by बृजेश नीरज on August 17, 2013 at 7:21pm

कितनी बखूबी सच को कह दिया आपने आदरणीय! वाह! बहुत सुन्दर! आपको हार्दिक बधाई!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"प्रारम्भ (दोहे) अंत भला तो सब भला, कहते  सब ये बात। क्या आवश्यक है नहीं, इक अच्छी…"
yesterday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"आदरणीय  जयहिंद रायपुरी जी अच्छा हायकू लिखा है आपने. किन्तु हायकू छोटी रचना है तो एक से अधिक…"
yesterday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"हाइकु प्रारंभ है तो अंत भी हुआ होगा मध्य में क्या था मौलिक एवं अप्रकाशित "
Saturday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185
"स्वागतम"
Friday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-185

आदरणीय साहित्य प्रेमियो,जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Apr 8
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद ' जी सादर अभिवादन प्रथम तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ देरी से आने की…"
Apr 7
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा दशम. . . . . उम्र

दोहा दशम् . . . . उम्रठहरी- ठहरी उम्र अब, करती एक सवाल ।कहाँ गई जब जिंदगी, रहती थी खुशहाल ।।यादों…See More
Apr 6
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
Apr 3
आशीष यादव added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
Thumbnail

चल मन अब गोकुल के धाम

चल मन अब गोकुल के धाम अद्भुत मनहर बाल रूप में मिल जाएंगे श्याम कि चल मन अब……………………….कटि करधनी शीश…See More
Apr 3
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अशोक भाईजी धन्यवाद ... मेरा प्रयास  सफल हुआ।"
Mar 31
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह वाह वाह !!! बहुत दिनों बाद ऐसी लाजवाब प्रतिक्रिया पढने में आई है। कांउटर अटैक ॥ हजारों धन्यवाद…"
Mar 31
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी सादर, सरकारी शालाओं की गलत परम्परा की ओर ध्यान आकृष्ट कराती…"
Mar 31

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service