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Tasdiq Ahmed Khan
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Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-83
"मुहतरम जनाब नादिर साहिब, ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया"
yesterday
Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-83
"मुहतरम जनाब मुनीश तन्हा साहिब,ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया"
yesterday
Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-83
"मुहतरम जनाब मोहन बेगोवाल साहिब,ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया"
yesterday
Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-83
"जनाब महेंद्र कुमार साहिब,ग़ज़ल में आप की शिरकत और हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया"
yesterday
Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-83
"मुहतरम जनाब शकूर साहिब,ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया"
Saturday
Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-83
"मुहतरम जनाब सतविंदर कुमार साहिब, ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया"
Saturday
Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-83
"मुहतरम जनाब बासुदेव साहिब,ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का तहे दिल से शुक्रिय"
Saturday
Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-83
"जनाब रिज़वान साहिब,ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफजाई का तहे दिल से शुक्रिया"
Saturday
Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-83
"जनाब अजय साहिब, सुन्दर ग़ज़ल हुई है,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें"
Saturday
Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-83
"जनाब नायाब साहिब,अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें"
Saturday
Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-83
"मुहतरम जनाब गुलशन साहिब ,अच्छी ग़ज़ल हुई है ,शेर दर शेर दाद और मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें"
Saturday
Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-83
"जनाब महेंद्र कुमार साहिब, सुन्दर ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें"
Saturday
Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-83
"मुहतरम जनाब गजेंद्र साहिब,सुन्दर ग़ज़ल हुई है,शेर दर शेर दाद और मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें -----शेर6 के उला मिसरे की बह्र देख लीजियेगा ---"हमारी नींद गई साथ मां की लोरी के ""
Saturday
Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-83
"मुहतरम जनाब गिरिराज साहिब,हिंदी में परिवार और उर्दू में परीवार होताहै उस हिसाब से मिसरा बह्र में है मगर मक़्ते का उला मिसरे की बह्र मेरी भी समझ में नहीं आयी यह तो समर साहिब ही बता सकते हैं --/"
Saturday
Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-83
"मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब आदाब, बहुत ही उम्दा ग़ज़ल हुई है ,शेर दर शेर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें --- आखरी शेर के उला मिसरे की तकतीअ समझ में नहीं आयी"
Saturday
Tasdiq Ahmed Khan replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-83
"मुहतरम जनाब रवि साहिब ,बहुत ही अच्छी ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद और मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ"
Friday

Profile Information

Gender
Male
City State
Ajmer
Native Place
qannauj
Profession
Govt. servant
About me
i have interest in writing urdu/hindi gazal &geet etc.

Tasdiq Ahmed Khan's Blog

ग़ज़ल--शम अ रोशन करो मुहब्बत की

ग़ज़ल

-----

(फ़ाइलातुन -मफ़ाइलुंन -फेलुंन)



आँधियाँ चल रही हैं नफ़रत की।

शमअ रोशन करो मुहब्बत की।



जिसको तदबीर पर यक़ीन नहीं

बात करता है वह ही किस्मत की।



दुश्मने जान हो गए उमरा

में ने मुफ़लिस की जब हिमायत की।



रहबरी के लिए चुना जिसको

साथ उसने मेरे सियासत की।



होश में आ जा बागबाने चमन

हो गई इब्तदा बग़ावत की।



उनके जलवों से वह नहीं वाकिफ़

बात करते हैं जो कियामत की।



वक़्त तस्दीक़ इम्तहान का… Continue

Posted on May 19, 2017 at 9:18pm — 17 Comments

ग़ज़ल----(कब वो मेरे दिल से निकला था)

ग़ज़ल

---------

(फअल-फऊलन-फेलुन-फेलुन )

सिर्फ़ वो महफ़िल से निकला था |

कब वो मेरे दिल से निकला था |

दिलबर के दीदार का मंज़र

चश्म से मुश्किल से निकला था |

रास्ता मेरी मंज़िल का भी

उनकी ही मंज़िल से निकला था |

जिसने बचाया बद नज़रों से

वो जादू तिल से निकला था |

हरफे निदा जो बना अदावत

ज़ह्ने मुक़ाबिल से निकला था |

आ ही गया वो फिर मक़्तल में

बच के जो क़ातिल से निकला था…

Continue

Posted on May 13, 2017 at 12:44pm — 16 Comments

ग़ज़ल(यहीं डूब जाने को जी चाहता है )

ग़ज़ल

--------

(फऊलन-फऊलन -फऊलन -फऊलन )

लगी को बुझाने को जी चाहता है |

तुम्हें कब से पाने को जी चाहता है |

यक़ीनन बड़ी मुज़त् रिब है शबे ग़म

मगर मुस्कराने को जी चाहता है |

समुंदर से गहरी हैं आँखें तुम्हारी

यहीं डूब जाने को जी चाहता है |

तेरे नाम में भी बहुत है हलावत

इसे लब पे लाने को जी चाहता है |

तेरे अहदे माज़ी से वाक़िफ़ हैं फिर भी

नयी चोट खाने को जी चाहता है |

मुसलसल…

Continue

Posted on May 4, 2017 at 9:59pm — 17 Comments

हो गया वह बे मुरव्वत देखते ही देखते

ग़ज़ल

फ़ाइलातुन-फ़ाइलातुन-फ़ाइलातुन-फाइलुन



मिल गई उल्फ़त की जन्नत देखते ही देखते।

हो गई उन से मुहब्बत देखते ही देखते।



आ गया है कौन आख़िर हुस्न के बाज़ार में

हो गई बरपा कियामत देखते ही देखते ।



हो गया शायद वफाओं का सितमगर पर असर

ख़त्म करदी उसने नफ़रत देखते ही देखते।



कारवां वालों को हासिल ही न था जिसको यक़ी

उसने पा ली है क़यादत देखते ही देखते।



ये है खारों की हिमायत का नतीजा बागबां

हो गई हर सू बग़ावत देखते ही… Continue

Posted on May 1, 2017 at 8:34pm — 18 Comments

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At 3:51pm on February 17, 2016, Sushil Sarna said…

आदरणीय तस्दीक अहमद खान जी,माह के सक्रिय सदस्य के रूप में ओ बी ओ द्वारा चयनित होने पर आपको हार्दिक बधाई। 

At 11:43pm on February 16, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय

तस्दीक अहमद खान जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 9:11pm on October 22, 2015, Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' said…
आपका इस बज्म में तहेदिल से इस्तक़बाल है......|
At 6:28pm on October 20, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…
ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में आपका हार्दिक स्वागत है।
 
 
 

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