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Manoj kumar Ahsaas
  • 36, Male
  • saharanpur uttar pradesh
  • India
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Manoj kumar Ahsaas commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post ग़ज़ल (2×16): मनोज अहसास
"हार्दिक आभार आदरणीय कबीर साहब आपकी बात पर विचार कर रहा हूँ सादर आभार"
1 hour ago
Samar kabeer commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post ग़ज़ल (2×16): मनोज अहसास
"जनाब मनोज कुमार अहसास जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'तेरे खतों की मधुर कहानी सोच से पीछे छूट गई है पैथोलॉजी की रिपोर्ट का हाथों में एक अफसाना है' इस शैर के ऊला में 'ख़त' शब्द का बहुवचन "ख़तूत"…"
1 hour ago
Manoj kumar Ahsaas posted a blog post

ग़ज़ल मनोज अहसास इस्लाह के लिए

221   2121   1221   212मुझको तेरे रहम से मयस्सर तो क्या नहीं जिस और खिड़कियां है उधर की हवा नहींहमको तो तेरी खोज में बस ये पता चला तेरा पता बस इतना है तू लापता नहींउसने तमाम गीत लिखे औरों के लिए फिर भी वो मेरे दिल के लिए बेवफा नहींयूं तो तमाम लोग तरक्की पसंद है मैं इश्क से अलग कभी कुछ लिख सका नहींवह इसलिए ही जीत के बेहद करीब है क्या-क्या कुचल गया है कभी सोचता नहींसबका गुनाहगार हूं ये मानता हूं पर मेरा नसीब मेरी कलम ने लिखा नहींअच्छे के साथ अच्छा नहीं होता है सलूक मैं चाहता हूं कह दूं जहां…See More
8 hours ago
Manoj kumar Ahsaas posted a blog post

ग़ज़ल (2×16): मनोज अहसास

पीछे मायूसी का साया आगे खतरा अनजाना है हर लम्हा ये सोच रहा हूँ खुद को कैसे समझाना हैतेरी यादों का सूरज भी काम नहीं आता अब मेरे मुझको इस मुश्किल मौसम में खुद से दूर चले जाना हैहम दिल की बातें लिखते हैं दिल न दुखाने की सीमा तक ऊंची सोच की इस महफिल से हमको जल्द ही उठ जाना हैतेरे खतों की मधुर कहानी सोच से पीछे छूट गई है पैथोलॉजी की रिपोर्ट का हाथों में एक अफसाना हैमां की हथेली चूम के निकला फौजी बेटा अपने घर से उसको यह आभास हुआ है मुश्किल लौट के अब आना हैमुझमें लाख कमी है लेकिन इतना भी मायूस ना…See More
Aug 19
Manoj kumar Ahsaas commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए मनोज अहसास
"हार्दिक आभार आदरणीय प्रदीप देवी शरण भट्ट जी"
Aug 17
Manoj kumar Ahsaas commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए मनोज अहसास
"बहुमूल्य इस्लाह के लिए हार्दिक आभार आदरणीय समर कबीर साहब आपके सुझाव का में पालन करूंगा"
Aug 17
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए मनोज अहसास
"वाह बहुत खूब"
Aug 16
Samar kabeer commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए मनोज अहसास
"जनाब मनोज अहसास जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'बिक जाने की लाचारी का,एक तजुर्बा ये भी है' इस मिसरे में 'तजुर्बा' शब्द ग़लत है,सहीह शब्द है, "तज्रिबा"212 है । 'चौथ का चांद देखने वाले,पर लगता है…"
Aug 16
Manoj kumar Ahsaas posted a blog post

एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए मनोज अहसास

2×15कोई अपना साथ न आए, हर कोशिश नाकाम लगे मेरे पास चले आना जब, जीवन ढलती शाम लगेइसको पिछले जन्मों का फल,कहते हैं दुनिया वालेपेड़ बबूल के बोये फिर भी,उसके हाथों आम लगेबिक जाने की लाचारी का,एक तजुर्बा ये भी हैजितनी ज्यादा खुद्दारी थी,उतने ही कम दाम लगेचौथ का चांद देखने वाले,पर लगता है झूठा दोष हमने तो पूनम को देखा फिर भी सौ इल्जाम लगेटूटा मन है ,रोगी तन है, रिश्तों में बेगानापन यारो कुछ तरकीब निकालो,जिससे मुझे आराम लगेएक बहुत व्याकुल सा बच्चा,कहता था विद्यालय में कॉपी लेकर तब आऊंगा पापा का जब काम…See More
Aug 7
Manoj kumar Ahsaas commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post एक ग़ज़ल इस्लाह के लिये
"हार्दिक आभार dandpani जी सादर"
Jul 30
dandpani nahak commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post एक ग़ज़ल इस्लाह के लिये
"आदरणीय मनोज कुमार अहसास जी आदाब , बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें!"
Jul 29
Manoj kumar Ahsaas commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post एक ग़ज़ल इस्लाह के लिये
"बहुत आभार आदरणीय समर कबीर साहब मैं आपके सुझाव पर तुरंत ध्यान देता हूं सादर आभार"
Jul 28
Samar kabeer commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post एक ग़ज़ल इस्लाह के लिये
"जनाब मनोज अहसास जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'कैसा रिश्ता कैसे मंजिल,कुछ भी कहा नहीं जाता' इस मिसरे में 'मंज़िल' शब्द स्त्रीलिंग है,देखियेगा । 'सोच हमारी जिजीविषा का एक महल थी अब जिसमें' इस मिसरे…"
Jul 28
Manoj kumar Ahsaas posted a blog post

एक ग़ज़ल इस्लाह के लिये

उजड़ गई क्यों प्यार की महफिल,कुछ भी कहा नहीं जाता मैं सच्चा था या था बुजदिल,कुछ भी कहा नहीं जातादिल का टूटना जिसे कहा था वह दुनिया का खेल था इक अब आकर जो टूटा है दिल,कुछ भी कहा नहीं जातासीधा रस्ता मान रहे थे जिसको हम वो उलझन थी खुद अपने सपनों के कातिल,कुछ भी कहा नहीं जाताइक दिन मर जाना है सबको दिल में बैठ गई ये बात कैसा रिश्ता कैसे मंजिल,कुछ भी कहा नहीं जातानैतिकता अपराध बन गई अधिकारों की धरती पर मर्यादा के टूटे साहिल,कुछ भी कहा नहीं जाताभूख से लड़ने में जो निर्धन का सहयोग नहीं करती ऐसी शिक्षा…See More
Jul 25
Manoj kumar Ahsaas posted blog posts
May 10
Manoj kumar Ahsaas commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post एक ग़ज़ल मनोज अहसास
"आदरणीय दिगंबर जी और आदरणीय लक्ष्मण जी ग़ज़ल पर उपस्थिति के लिए हार्दिक आभार"
Apr 30

Profile Information

Gender
Male
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saharanpur uttarpradesh
Native Place
India
Profession
Teaching
About me
Gazal sikhna chhahta hu

Manoj kumar Ahsaas's Blog

ग़ज़ल मनोज अहसास इस्लाह के लिए

221   2121   1221   212

मुझको तेरे रहम से मयस्सर तो क्या नहीं

जिस और खिड़कियां है उधर की हवा नहीं

हमको तो तेरी खोज में बस ये पता चला

तेरा पता बस इतना है तू लापता नहीं

उसने तमाम गीत लिखे औरों के लिए

फिर भी वो मेरे दिल के लिए बेवफा नहीं

यूं तो तमाम लोग तरक्की पसंद है

मैं इश्क से अलग कभी कुछ लिख सका नहीं

वह इसलिए ही जीत के बेहद करीब है

क्या-क्या कुचल गया है कभी सोचता नहीं

सबका…

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Posted on August 24, 2019 at 11:30pm

ग़ज़ल (2×16): मनोज अहसास

पीछे मायूसी का साया आगे खतरा अनजाना है

हर लम्हा ये सोच रहा हूँ खुद को कैसे समझाना है

तेरी यादों का सूरज भी काम नहीं आता अब मेरे

मुझको इस मुश्किल मौसम में खुद से दूर चले जाना है

हम दिल की बातें लिखते हैं दिल न दुखाने की सीमा तक

ऊंची सोच की इस महफिल से हमको जल्द ही उठ जाना है

तेरे खतों की मधुर कहानी सोच से पीछे छूट गई है

पैथोलॉजी की रिपोर्ट का हाथों में एक अफसाना है

मां की हथेली चूम के निकला फौजी बेटा अपने घर…

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Posted on August 18, 2019 at 10:30pm — 2 Comments

एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए मनोज अहसास

2×15

कोई अपना साथ न आए, हर कोशिश नाकाम लगे

मेरे पास चले आना जब, जीवन ढलती शाम लगे

इसको पिछले जन्मों का फल,कहते हैं दुनिया वाले

पेड़ बबूल के बोये फिर भी,उसके हाथों आम लगे

बिक जाने की लाचारी का,एक तजुर्बा ये भी है

जितनी ज्यादा खुद्दारी थी,उतने ही कम दाम लगे

चौथ का चांद देखने वाले,पर लगता है झूठा दोष

हमने तो पूनम को देखा फिर भी सौ इल्जाम लगे

टूटा मन है ,रोगी तन है, रिश्तों में बेगानापन

यारो कुछ…

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Posted on August 7, 2019 at 9:13pm — 4 Comments

एक ग़ज़ल इस्लाह के लिये

उजड़ गई क्यों प्यार की महफिल,कुछ भी कहा नहीं जाता

मैं सच्चा था या था बुजदिल,कुछ भी कहा नहीं जाता

दिल का टूटना जिसे कहा था वह दुनिया का खेल था इक

अब आकर जो टूटा है दिल,कुछ भी कहा नहीं जाता

सीधा रस्ता मान रहे थे जिसको हम वो उलझन थी

खुद अपने सपनों के कातिल,कुछ भी कहा नहीं जाता

इक दिन मर जाना है सबको दिल में बैठ गई ये बात

कैसा रिश्ता कैसे मंजिल,कुछ भी कहा नहीं जाता

नैतिकता अपराध बन गई अधिकारों की धरती…

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Posted on July 25, 2019 at 10:26pm — 4 Comments

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At 9:21pm on October 23, 2015, BAIJNATH SHARMA'MINTU' said…

शुक्रिया मनोज जी |

At 3:57pm on July 28, 2015, Rahul Dangi said…
बहुत बहुत स्वागत आदरणीय मनोज भाई जी
At 3:13pm on July 3, 2015, Rajat rohilla said…
धन्यवाद मनोज जी
At 11:40pm on July 1, 2015, Sandeep Kumar said…

आपका हार्दिक आभार :)

At 3:51pm on June 29, 2015, pratibha pande said…

 आभार 

At 11:10am on June 18, 2015, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

आ० मनोज जी

सर्वश्रेष्ठ लेखन कभी भी आसान नहीं होता . आपको इस सम्मान के लिये मेरी और  से बधाई . सादर .

At 10:37pm on June 17, 2015,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय मनोज कुमार एहसास जी.
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी रचना "मेरी बेटी" को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है, तथा आप की छाया चित्र को ओ बी ओ मुख्य पृष्ठ पर स्थान दिया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |
आपको प्रसस्ति पत्र शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |
शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक 
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 10:02am on May 28, 2015, जितेन्द्र पस्टारिया said…

आपकी मित्रता का ह्रदय से स्वागत है आदरणीय मनोज जी
सादर!

At 11:15am on April 30, 2015, SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR said…

जिंदगी की कशमकश  व्यक्त करती अच्छी गजल। प्रयास अच्छा है

जय  श्री राधे
भ्रमर ५

At 9:03pm on April 14, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…
आपका ओबीओ परिवार में हार्दिक स्वागत है !
 
 
 

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