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Manoj kumar Ahsaas
  • 36, Male
  • saharanpur uttar pradesh
  • India
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post ग़ज़ल मनोज अहसास
"आ. भाई मनोज जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Feb 19
Samar kabeer commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post ग़ज़ल मनोज अहसास
"जनाब मनोज अहसास जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है, बधाई स्वीकार करें । आपने ग़ज़ल के अरकान ग़लत लिख दिए हैं,इसके अरकान हैं 2122 1122 1122 22"
Feb 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post ग़ज़ल मनोज अहसास
"आ. भाई मनोज जी, अच्छी गजल हुई है , हार्दिक बधाई । 'बेटी जब कालेज में पढ़ने' कर लीजिएगा ...सादर"
Feb 17
Manoj kumar Ahsaas commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post ग़ज़ल मनोज अहसास
"हार्दिक आभार प्रिय मित्र शाहिद जी सादर"
Feb 17
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post ग़ज़ल मनोज अहसास
"प्रिय मनोज भाई, आदाब। इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल की रचना पर आपको हार्दिक बधाई।     मेरे ज़ख़्मों पे बड़ी तेरी इनायत होगी    संग हाथों में कोई तू भी उठा ले अब तो आपका ये शेअर ख़ास तौर पे बहुत अच्छा लगा।"
Feb 16
Manoj kumar Ahsaas posted a blog post

ग़ज़ल मनोज अहसास

2122   2122   2122   22जनाब क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल 'अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको' जिसे जगजीत सिंह साहब ने गाया है उसी ग़ज़ल को गुनगुनाते हुए ये ग़ज़ल हुई है बहर थोड़ी परिवर्तित हुई है तमाम दोस्तों को सादर समर्पित स्वीकारेंकुछ हसीं फूलों से जीवन को सजा ले अब तो, खुद को गुमनामी के पतझड़ से बचा ले अब तो.मेरे जख्मों पे बड़ी तेरी इनायत होगी, संग हाथों में कोई तू भी उठा ले अब तो.अपनी गुल्लक को दिखा माँ को कहा बेटी ने, है बहुत पैसे तू पापा को बुला ले अब तो.अपने आपे में नहीं कब से मुझे क्या…See More
Feb 16
Manoj kumar Ahsaas commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post ग़ज़ल मनोज अहसास
"आदरणीय रवि भसीन शाहिद जी बहुत-बहुत शुक्रिया मेरे दिमाग में भी यह बात थी और कई लोगों ने भी सुझाव दिया आपका सुझाव उत्तम है मुझ को स्वीकार करता हूं"
Feb 14
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post ग़ज़ल मनोज अहसास
"आदरणीय मनोज भाई, आपको इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल पर हार्दिक बधाई। ख़ास तौर से मुझे आपका ये शेर बहुत अच्छा लगा:पापा की आंखों ने उसको जाने क्या क्या समझायाबेटी जब कालेज की खातिर घर से पहली बार गईएक सुझाव देना चाहूँगा कि "कालेज की ख़ातिर" की जगह…"
Feb 14
Manoj kumar Ahsaas commented on Samar kabeer's blog post एक ताज़ा ग़ज़ल
"एक बेमिसाल ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय आपको तो पता ही है मैं इस बहर पर भी आजकल काम कर रहा हूँ  मुझे इस ग़ज़ल से बड़ी प्रेरणा मिलेगी सादर"
Feb 14
Manoj kumar Ahsaas commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post अहसास की ग़ज़ल-मनोज अहसास
"हार्दिक आभार आदरणीय सादर"
Feb 12
Manoj kumar Ahsaas commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post ग़ज़ल मनोज अहसास
"बेहद ध्यान से गज़ल पढ़कर आपने इस्लाह की है बेहदशुक्रगुज़ार हूँ इन कमियों को दूर करने का प्रयास करूंगा हार्दिक आभार"
Feb 12
Samar kabeer commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post ग़ज़ल मनोज अहसास
"जनाब मनोज अहसास जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें । 'उस घर की सारी बातें अब दीवारों के पार गई' इस मिसरे में रदीफ़ बदल कर "गईं" हो रही है,ग़ौर करें । 'आज मगर तकदीर के आगे सब तदबीरें हार गई' इस मिसरे में…"
Feb 12
Samar kabeer commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post अहसास की ग़ज़ल-मनोज अहसास
"जनाब मनोज अहसास जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।"
Feb 12
Manoj kumar Ahsaas posted a blog post

ग़ज़ल मनोज अहसास

2×15बीच सफर में धीरज टूटा,हाथों से पतवार गई.मेरे मन की लाचारी से मेरी कोशिश हार गई.एक अधूरा ख्वाब जो मुद्दत से आंखों में जिंदा है,उसको लिखने की कोशिश में स्याही भी बेकार गई.पिछले साल में और कोई था अब के साल में और कोई,एक नए इजहार को चाहत फूलों के बाजार गई.बरसों पहले जिसको चाहा उसकी यादें साथ रहें,एक दुआ के आगे मेरी हर इक ख्वाहिश हार गई.पापा की आंखों ने उसको जाने क्या क्या समझाया,बेटी जब कालेज की खातिर घर से पहली बार गई.जिस घर की तामीर में हमने सारा जीवन खपा दिया, उस घर की सारी बातें अब दीवारों…See More
Feb 12
Manoj kumar Ahsaas posted a blog post

अहसास की ग़ज़ल-मनोज अहसास

221   2121   1221   212आएगा जब तलक नहीं मौसम गुलाब का, बदला रहेगा मूड मेरे आफताब का।मज़बूरियों में जल गई इक उम्र की वफ़ा, उसने दिखाया मुझको सलीका नकाब का।मैं ऐसी शाइरी की तमन्ना में कैद हूँ , इक शेर में जो कह दे फसाना किताब का।वो बेहिसाब बातों से भर देंगे सबका पेट, जिनको समझ रहा है तू पक्का हिसाब का।तासीर क्या है होठों से छूकर पता करो, इक जाम ही बहुत है सुखन या शराब का।बरसों पुरानी बातों पे अब खाक डाल दे, मज़मून खुद ही सोच ले उनके जवाब का।सागर सी ये हयात है कतरे सा तेरा इश्क, दिल को मिटा भी…See More
Feb 10
Manoj kumar Ahsaas commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post अहसास की ग़ज़ल-मनोज अहसास
"हार्दिक आभार आदरणीय बेहद शुक्रिया सादर"
Feb 8

Profile Information

Gender
Male
City State
saharanpur uttarpradesh
Native Place
India
Profession
Teaching
About me
Gazal sikhna chhahta hu

Manoj kumar Ahsaas's Blog

ग़ज़ल मनोज अहसास

2122   2122   2122   22

जनाब क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल 'अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको' जिसे जगजीत सिंह साहब ने गाया है उसी ग़ज़ल को गुनगुनाते हुए ये ग़ज़ल हुई है बहर थोड़ी परिवर्तित हुई है

तमाम दोस्तों को सादर समर्पित

स्वीकारें

कुछ हसीं फूलों से जीवन को सजा ले अब तो,

खुद को गुमनामी के पतझड़ से बचा ले अब तो.

मेरे जख्मों पे बड़ी तेरी इनायत होगी,

संग हाथों में कोई तू भी उठा ले अब तो.

अपनी गुल्लक को दिखा माँ को…

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Posted on February 16, 2020 at 10:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल मनोज अहसास

2×15

बीच सफर में धीरज टूटा,हाथों से पतवार गई.

मेरे मन की लाचारी से मेरी कोशिश हार गई.

एक अधूरा ख्वाब जो मुद्दत से आंखों में जिंदा है,

उसको लिखने की कोशिश में स्याही भी बेकार गई.

पिछले साल में और कोई था अब के साल में और कोई,

एक नए इजहार को चाहत फूलों के बाजार गई.

बरसों पहले जिसको चाहा उसकी यादें साथ रहें,

एक दुआ के आगे मेरी हर इक ख्वाहिश हार गई.

पापा की आंखों ने उसको जाने क्या क्या समझाया,

बेटी जब…

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Posted on February 12, 2020 at 1:10pm — 5 Comments

अहसास की ग़ज़ल-मनोज अहसास

221   2121   1221   212

आएगा जब तलक नहीं मौसम गुलाब का,

बदला रहेगा मूड मेरे आफताब का।

मज़बूरियों में जल गई इक उम्र की वफ़ा,

उसने दिखाया मुझको सलीका नकाब का।

मैं ऐसी शाइरी की तमन्ना में कैद हूँ ,

इक शेर में जो कह दे फसाना किताब का।

वो बेहिसाब बातों से भर देंगे सबका पेट,

जिनको समझ रहा है तू पक्का हिसाब का।

तासीर क्या है होठों से छूकर पता करो,

इक जाम ही बहुत है सुखन या शराब…

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Posted on February 9, 2020 at 11:30pm — 2 Comments

अहसास की ग़ज़ल-मनोज अहसास

2122   2122     2122     212

जब सफलता मिल गई खुद का किया लिक्खा गया,

अपनी हारों को खुदा का फैसला लिक्खा गया।

आपके शफ्फाक दामन को बचाने के लिए,

कत्ल मुझ बदबख्त का इक हादसा लिक्खा गया।

दर ब दर होते रहे वो सारे खत खुशियों भरे ,

जिन पर तेरा नाम और मेरा पता लिक्खा गया।

चार भाई साथ रहकर कितने खुश थे हम कभी,

टूटकर बिखरे तो फिर दिल भी जुदा लिक्खा गया।

अब हमारी जिंदगी में एक उलझन ये भी है,

उसके दिल में…

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Posted on February 1, 2020 at 12:07am — 2 Comments

Comment Wall (10 comments)

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At 9:21pm on October 23, 2015, BAIJNATH SHARMA'MINTU' said…

शुक्रिया मनोज जी |

At 3:57pm on July 28, 2015, Rahul Dangi Panchal said…
बहुत बहुत स्वागत आदरणीय मनोज भाई जी
At 3:13pm on July 3, 2015, Rajat rohilla said…
धन्यवाद मनोज जी
At 11:40pm on July 1, 2015, Sandeep Kumar said…

आपका हार्दिक आभार :)

At 3:51pm on June 29, 2015, pratibha pande said…

 आभार 

At 11:10am on June 18, 2015, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

आ० मनोज जी

सर्वश्रेष्ठ लेखन कभी भी आसान नहीं होता . आपको इस सम्मान के लिये मेरी और  से बधाई . सादर .

At 10:37pm on June 17, 2015,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय मनोज कुमार एहसास जी.
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी रचना "मेरी बेटी" को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है, तथा आप की छाया चित्र को ओ बी ओ मुख्य पृष्ठ पर स्थान दिया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |
आपको प्रसस्ति पत्र शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |
शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक 
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 10:02am on May 28, 2015, जितेन्द्र पस्टारिया said…

आपकी मित्रता का ह्रदय से स्वागत है आदरणीय मनोज जी
सादर!

At 11:15am on April 30, 2015, SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR said…

जिंदगी की कशमकश  व्यक्त करती अच्छी गजल। प्रयास अच्छा है

जय  श्री राधे
भ्रमर ५

At 9:03pm on April 14, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…
आपका ओबीओ परिवार में हार्दिक स्वागत है !
 
 
 

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