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२२१ २१२१ १२२१ २१२

रिश्ते वफ़ा सब से निभाकर तो  देखिए 
सारे जहाँ को अपना बनाकर तो देखिए
 
इसका मिलेगे अज़्र खुदा  से  बहुत  बड़ा 
भूखे  को एक रोटी  खिलाकर तो देखिए 
 
खिल जाएगा खुशी से वो चेह्रा गुलाब सा
रोते  हुए  को  आ प हंसा  कर तो देखिए 
 
दुश्मन भी एक रोज़ मिलेगा वफ़ा के साथ 
परचम अमाँ का हर सू उड़ाकर  तो देखिए 
 
हर  राहगीर  दिल से  दुआ  देगा आपको 
इस तीरगी में  शमअ जलाकर तो देखिए 
 
खुश्बू से महक जाएगा घर  बार आपका
उजड़े हुए चमन  को  बसाकर तो देखिए 
 
इक चौंदवी का चाँद नज़र आएगा "रज़ा"
जुल्फे रूखे  हँसी  से  हटाकर  तो  देखिए 

सलीम रज़ा रीवा-09424336644

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by SALIM RAZA REWA on December 28, 2013 at 7:55am

आदरणीय सौरभ पांडेय जी आपकी दुआएँ ही काफ़ी है ........शुक्रिया 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 25, 2013 at 8:22pm

आपकी ग़ज़ल पर आज आ पाया हूँ. ग़ज़लों की कहन को तनिक और नयापन दें. और कसने की कोशिश करें, भाईजी.

बहरहाल, बधाई .. .

Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 20, 2013 at 9:03am

बहुत सुंदर ग़ज़ल कही है ..हार्दिक बधाई 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 20, 2013 at 7:49am

खिल जाएगा खुशी से वो चेह्रा गुलाब सा रोते  हुए  को  आ प हंसा  कर तो देखिए

बहुत सुन्दर

Comment by SALIM RAZA REWA on December 19, 2013 at 9:51pm

 आदरणीय  गिरिराज भंडारी   जी.,,,बहन  annapurna bajpai  जी.,,,,आदरणीय AVINASH S BAGDE जी.,,

आप सभी को   दिली  शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 19, 2013 at 7:22pm

आदरणीय सलीम भाई , बहुत खूब सूरत ग़ज़ल कही है , वाह वा ॥ आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

Comment by annapurna bajpai on December 19, 2013 at 2:08pm

आ० सलीम रज़ा जी सुंदर गज़ल हेतु बधाई स्वीकारें । हर एक अशर खूबसूरत बन पड़ा है । 

Comment by AVINASH S BAGDE on December 19, 2013 at 10:46am

सारे जहाँ को अपना बनाकर तो देखिए....बहुत सुन्दर!सलीम रजा साहेब

Comment by SALIM RAZA REWA on December 18, 2013 at 9:02pm

 आदरणी डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी..

आदरणीSanjay Mishra 'Habib' ...जी

आदरणी Meena Pathak जी 

 आदरणीShyam Narain Verma जी

 आप सभी को नाचीज़ का  दिली  शुक्रिया..

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 18, 2013 at 7:23pm

सलीम रजा साहेब

आपकी ग़ज़ल में एक मासूमियत सी मुझे लगी i वही इस्की USP है i बेहतरीन प्रयास i

कृपया ध्यान दे...

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