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" कौन हो तुम ?"
" जन्म से मुस्लिम , मन से सच्चा हिन्दुस्तानी , तन से अधनंगा और पेट से भूखा हूँ ।"
"लेकिन आप यह सब क्यों पूछ रही हैं ?आप कौन हैं ?"
" हा! हा! हा ! हा ! हा !" ज़ोर का अट्टहास किया और बोली-" मुझे दंगों की दुनिया की बेताज मलिका "साम्प्रदायिकता" कहते हैं । " उसने बस इतना ही कहा और एकदम पिस्टल निकालकर दो-तीन गोलियाँ उसकी कनपटी में दाग दी और फरार हो गई ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by Mohammed Arif on October 18, 2017 at 9:46pm
बहुत-बहुत हार्दिक आभार आदरणीया कल्पना भट्ट जी ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 18, 2017 at 9:38pm

वाह और आह इस लघुकथा के लिए जनाब मोहम्मद आरिफ साहब | बधाई स्वीकारें |

Comment by Mohammed Arif on October 18, 2017 at 6:04pm
आदरणीय लक्ष्मण रामानुज लडीवाला जी आपकी उत्साहजनक टिप्पणी से लेखन सार्थक हो गयाक्ष। बहुत-बहुत आभार ।
Comment by Mohammed Arif on October 18, 2017 at 6:02pm
आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब आदाब,आपकी उत्साहजनक टिप्पणी और नज़रे इनायत का बहुत-बहुत शुक्रिया । यह सब आपकी दुआओं का नतीजा है ।
Comment by Samar kabeer on October 18, 2017 at 5:53pm
जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,कमाल की लघुकथा लिखी है आपने,वाह वाह बहुत ख़ूब, इस शानदार प्रस्तुति पर दिल से ढेरों बधाई स्वीकार करें ।
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 18, 2017 at 5:29pm

अति सुंदर और सामयिक लघु कथा | वाह !

Comment by Mohammed Arif on October 18, 2017 at 5:15pm
बहुत-बहुत आभार आदरणीय विनय कुमार जी । लेखन सार्थक हो गया ।
Comment by Mohammed Arif on October 18, 2017 at 5:13pm
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब, मेरी लघुकथा पर लगातार आपकी टिप्पणी और फीचर ब्लॉग में चयन होने पर ही पका बहुत-बहुत आभार । यह सब आपकी दुआओं का ही नतीजा है ।
Comment by विनय कुमार on October 18, 2017 at 11:30am

वाह और आह दोनों इस लघुकथा के लिए, बहुत बहुत बधाई इस गहरी चोट करती रचना के लिए आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ साहब

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 18, 2017 at 10:58am
आपकी यह लघुकथा मंच पर फीचर किये जाने पर तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहब।

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