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वक़्त ऐसी किताब माँगेगा (ग़ज़ल 'राज')

२१२२ १२१२  २२

जिन्दगी से जबाब माँगेगा

लम्हा लम्हा हिसाब माँगेगा

 

जिसमे लिक्खा हुआ गणित तेरा

वक़्त ऐसी किताब माँगेगा

 

देख तेरा खुला हुआ वो सबू

खाली प्याला शराब माँगेगा

 

रंग बदले भले कई मौसम

फूल अपना शबाब माँगेगा

 

कैद जिसके लिए किया जुगनू

कल वही माहताब माँगेगा

 

पाक नीयत से देखना उसको 

चाँद वरना निकाब माँगेगा

 

कैद तेरी किताब में अबतक

अपनी खुशबू गुलाब माँगेगा

----मौलिक  एवं अप्रकाशित 

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 16, 2017 at 7:30pm
आ. राजेश दी,सादर अभिवादन । बेहतरीन गजल हुई है , हार्दिक बधाई ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 16, 2017 at 6:06pm
आदरणीय राजेश जी हमेशा की तरह बढ़िया इस ग़ज़ल पर ढेर सारी बधाई सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 15, 2017 at 10:09pm
बहुतखूब ग़ज़ल हुई आदरणीया..अपनी खुशबु गुलाब मांगेगा..बेहतरीन
Comment by vandana on October 15, 2017 at 3:21pm

कैद जिसके लिए किया जुगनू

कल वही माहताब माँगेगा

वाह आदरणीया राजेश दी बहुत खूब 

Comment by Mohammed Arif on October 15, 2017 at 12:17pm
आदरणीय राजेश कुमारी जी आदाब, बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल । हर शे'र उम्दा । मज़ा आ गया । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें ।
Comment by Ajay Tiwari on October 15, 2017 at 9:17am

आदरणीया राजेश कुमारी जी,
खूबसूरत ग़ज़ल हुई है. शुभकामनाएं.
सादर

Comment by Kalipad Prasad Mandal on October 14, 2017 at 8:48pm

आ राजेश कुमारी जी  बहुत ही अच्छी ग़ज़ल हुई है , हार्दिक बधाई 

Comment by दिनेश कुमार on October 13, 2017 at 7:23pm
आपने दोपहर में चियर्स कहा था... अधिक लिख गया होऊँ तो उसी चियर्स का असर मान कर क्षमा कर दीजियेगा // वाह निलेश सर। क्या कहने।

अच्छी ग़ज़ल के लिए दिली दाद आ. राजेश जी।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 13, 2017 at 7:05pm

आ. राजेश दीदी 
हमेशा की तरह अच्छी ग़ज़ल हुई है ..
मतले में एक सुझाव है ...देखिएगा 
.

जिन्दगी से हिसाब  माँगेगा

लम्हा लम्हा जवाब  माँगेगा
.
देख तेरा खुला हुआ वो सबू... कौनसा सबू??
देख कर आप के नशीले  नयन 
ख़ाली.....
.
रंग बदले भले कई मौसम.... या 
रंग मौसम भले 
कई बदले  ... विचार कीजियेगा 
.
चाँद वरना निकाब माँगेगा
निक़ाब.. की जगह हिजाब अधिक ठीक लगता शायद 
.
आपने दोपहर में चियर्स कहा था... अधिक लिख गया होऊँ तो उसी चियर्स का असर मान कर क्षमा कर दीजियेगा 
सादर 

Comment by SALIM RAZA REWA on October 13, 2017 at 6:27pm
आदरणीया बहन राजेश कुमारी जी।
ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें.

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