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कभी चंदा, कभी सूरज,कभी तारे संभाले हैं
सुखनवर के नसीबो में मगर पांवों के छाले हैं

हमारी बेगुनाही का यकीं उनको हुआ ऐसे
वो जिनको चाहते हैं अब उन्हीं के होने वाले हैं

मेरी भूखी निगाहों में शराफत ढूंढने वाले
तेरी सोने की थाली में मेरे हक़ के निवाले हैं

हमारी झोपडी का कद बहुत ऊंचा नहीं लेकिन
तेरे महलों के सब किस्से हमारे देखे भाले हैं

भरी महफ़िल में आके पूछते हैं हाल मेरा वो
तकल्लुफ भी निराला है,इरादे भी निराले हैं

चलो अब इस जहाँ की सोच से नज़रे हटा लें हम
जहाँ तक देखते हैं ,हर किसी के हाथ काले हैं

डुबाकर मेरे ख़्वाबों का सफीना पार उतरो तुम
तेरे अहसास की सपने तो लहरों के हवाले हैं

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by मनोज अहसास on April 2, 2017 at 9:51pm
बहुत बहुत गुरप्रीत सिंह जी
सादर आभार
तकल्लुफ को मैंने फॉरमैलिटी या औपचारिकता के रूप में प्रयोग किया है

बाकि वरिष्ठ जन अधिक बता सकेगें
सादर
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 2, 2017 at 9:51pm

आ. मनोज भाई.. बहुत अहसास से आपने ग़ज़ल कही है जो कुछ मिसरों में साफ़ झलक रहा है ..
,
मतले से शुरू करेंगे ..
.
नसीब..एक होता है..नसीबों (एक का) सही नहीं है ..
अत; 
सुखनवर के मगर हिस्से में बस पांवों के छाले हैं... कर सकने पर विचार कीजिये 
.
तीसरे शेर में आपके अंदर का समाजवाद अपने शबाब पर दिखता है ... दुष्यंत और अदम गोंडवी की याद आती है ..
.
तकल्लुफ भी निराला है,इरादे भी निराले हैं.. ऐसे मिसरों से अबद समृद्ध होता है ..बधाई ..
गुरुजनों की बातों का संज्ञान लें और प्रगति करते जायें ..
बधाई ..
सादर 

Comment by मनोज अहसास on April 2, 2017 at 9:51pm
बहुत बहुत गुरप्रीत सिंह जी
सादर आभार
तकल्लुफ को मैंने फॉरमैलिटी या औपचारिकता के रूप में प्रयोग किया है

बाकि वरिष्ठ जन अधिक बता सकेगें
सादर
Comment by Gurpreet Singh jammu on April 2, 2017 at 7:38pm
आदरणीय मनोज जी..बहुत अच्छी गज़ल लगी आपकी..

कभी चंदा, कभी सूरज,कभी तारे संभाले हैं
सुखनवर के नसीबो में मगर पांवों के छाले हैं

हमारी झोपडी का कद बहुत ऊंचा नहीं लेकिन
तेरे महलों के सब किस्से हमारे देखे भाले हैं

बहुत ही अच्छे अशआर...
क्रुप्या तकल्लुफ का अर्थ बताएं
Comment by मनोज अहसास on April 2, 2017 at 4:47pm
आदरणीय नमन साहब
बहुत बहुत शुक्रिया
सादर
Comment by मनोज अहसास on April 2, 2017 at 4:45pm
बहुत बहुत आभार आदरणीय कबीर साहब
आपके सुझाव सर माथे
सादर
Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on April 2, 2017 at 4:39pm
आ0 मनोज अहसास जी बहुत सुंदर ग़ज़ल हुई है। शेर दर शेर दाद हाजिर है। बाकी आ0 समर साहिब की इस्लाह पर गौर फ़रमाइएगा।
मेरी भूखी निगाहों में शराफत ढूंढने वाले
तेरी सोने की थाली में मेरे हक़ के निवाले हैं
बहुत ही खूबसूरत शेर। बधाई हो।
Comment by Samar kabeer on April 2, 2017 at 4:01pm
जनाब मनोज कुमार'एहसास'साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
कुछ कहना चाहूंगा ।

'हमारी बेगुनाही का यकीं उनको हुआ ऐसे
वो जिनको चाहते हैं अब उन्हीं के होने वाले हैं'
उन्हें आपकी बेगुनाही का यक़ीन भी हो गया,और जिनको चाहते हैं उन्हीं के होने वाले भी हैं,क्या बात हुई ?मेरे ख़याल से शैर यूँ होना चाहिये :-
"हमारी बेगुनाही का यकीं उनको नहीं अब तक
वो जिसको चाहते हैं अब उसी के होने वाले हैं"

'तेरे महलों के सब क़िस्से हमारे देखे भाले हैं'
इस मिसरे में 'क़िस्से'शब्द के साथ 'देखे'शब्द अजीब लगता है,मिसरा यूँ होना चाहिये :-
तेरे महलों के सब हिस्से हमारे देखे भाले हैं'

'डुबाकर मेरे ख़्वाबों का सफ़ीना पार उतरो तुम
तेरे'एहसास' की सपने तो लहरों के हवाले हैं'
ऊला मिसरे में 'डुबाकर'शब्द ग़लत है,सही शब्द है "डुबोकर"दूसरी बात शुतरगुर्बा का दोष भी है, ऊला में 'तुम'सानी में तेरे शब्द,तीसरी बात सानी मिसरे में व्याकरण दोष भी है, 'तेरे एहसास की सपने' देखियेगा ।

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