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ग़ज़ल :- उजाला काटने को दौड़ता है |

बह्र :-फ़ऊलुन फ़ाईलातुन फ़ाईलातुन

दिवाना पन नहीं तो और क्या है
उजाला काटने को दौड़ता है

यही छोटा सा घर दुनिया है मेरी
इसी का नाम जन्नत रख दिया है

मैं भूका हूँ मुझे रोटी खिला दो
कोई साइल गली में चीख़ता है

मैं सच्चाई के पैरों पर खड़ा हूँ
मुक़ाबिल झूट के सर पर खड़ा है

सभंल कर ए दिल-ए-नादाँ सभंल कर
तू किन ऊंचाईयों को छू रहा है

वहीं से रोशनी फूटी है यारो
जहाँ मेरा सितारा डूबता है

"समर" दिल आपने तोड़ा है जबसे
अजब हमदर्दियों का सिलसिला है

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on April 1, 2015 at 10:03am
जनाब "जान" गोरखपुरी साहिब,आदाब,हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रिया |
Comment by Samar kabeer on March 31, 2015 at 10:05pm
जनाब श्याम मथपाल जी,आदाब,हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे दिल से शुक्रिया |
Comment by Shyam Mathpal on March 31, 2015 at 7:53pm

आदरणीय समर कबीर जी , 

बहुत खूब , हार्दिक बधाई .

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 31, 2015 at 4:49pm

वाह वाह!! हर शेर जबरदस्त! आपका गजल कहने का एक अलग ही तरीका है जो सीधे दिल में उतरता है!बहुत कुछ सीख़ रहे है आपसे आदरणीय समर जी!अभिनन्दन!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 31, 2015 at 9:17am

आदरणीय समर साहब ग़ज़ल को लेकर आपका समर्पण हम जैसे छात्रों के लिये प्रेरणा का कारण हुआ करता है। इस बमिसाल ग़ज़ल के लिये दाद हाज़िर है

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 31, 2015 at 6:23am

आ0 भाई समर कबीर जी बहुत सुंदर ग़ज़ल हुई है . हार्दिक बधाई .

Comment by Dr. Vijai Shanker on March 31, 2015 at 4:03am
"समर" दिल आपने तोड़ा है जबसे
अजब हमदर्दियों का सिलसिला है
क्या बात है, आदरणीय समर कबीर साहिब , नमस्कार , बहुत खूब , पूरी ग़ज़ल बहुत उम्दा है , बहुत बहुत बधाई, सादर ,
Comment by Hari Prakash Dubey on March 30, 2015 at 7:26pm

आदरणीय समर कबीर जी ,आपकी तो हर रचना एक पाठशाला है 

यही छोटा सा घर दुनिया है मेरी
इसी का नाम जन्नत रख दिया है.....आनंद आ गया 

वहीं से रोशनी फूटी है यारो
जहाँ मेरा सितारा डूबता है......बहुत खूब , हार्दिक बधाई ! सादर 

Comment by Shyam Narain Verma on March 30, 2015 at 4:44pm
उम्दा गज़ल के लिए ढेरों मुबारकबाद ....

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 30, 2015 at 3:29pm

आदरणीय समर कबीर जी बहुत ही उम्दा और बेहतरीन ग़ज़ल हुई है. मतला से मक्ता तक कमाल ही कमाल. हर शेर एक से बढ़कर एक. आपकी ग़ज़लों से हमेशा सीखने को मिलता है. बेहतरीन ग़ज़ल से रु-ब-रू कराने के लिए हार्दिक आभार 

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