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ग़ज़ल (इबादतों में अक़ीदत की सर-कशी न मिला)

1212 - 1122 - 1212 - 112

इबादतों में अक़ीदत की सर-कशी न मिला  

महब्बतों में मेरे यार दुश्मनी न मिला

हवाओं में न कहीं अब ये ज़ह्र घुल जाए 

फ़ज़ा को साफ़ ही रहने दे शोरिशी न मिला 

कहीं नहीं है कोई ग़ैर दूर-दूर तलक

मगर क़रीब भी मुझको मेरा कोई न मिला 

सिहर उठा हूँ किया याद वक़्त वो जब जब

चिता को आग लगाने को आदमी न मिला 

मिले हैं यूँ तो हज़ारों हसीं ज़माने में

जिसे तलाशता रहता हूँ बस वही न मिला 

रहा था साथ मेरे उम्र भर जो साया बन

बिछड़ के फिर वो मुझे उम्र भर कभी न मिला 

कहाँ गये जो मुझे अपने ही से दिखते थे

'अमीर' कब से ज़माने में आदमी न मिला 

"मौलिक व अप्रकाशित"

अक़ीदत की सर-कशी - स्वेच्छारी आस्था,

शोरिशी - उपद्रव होने की अवस्था। 

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 10, 2022 at 1:48pm

मुहतरम समर कबीर साहिब आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद और ज़र्रा नवाज़ी का शुक्रिया। 'वो वक़्त याद किया... पर आपसे पूर्णतया सहमत हूँ, फ़ोन पर हुई चर्चा में आपके अनुमोदन से "सिहर उठा हूँ किया याद वक़्त वो जब जब" कर रहा हूँ। दुआओं का तालिब। 

Comment by Samar kabeer on May 9, 2022 at 8:08pm

जनाब अमीरूद्दीन 'अमीर' जी आदाब, तरही मिसरे पर ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें I 

'वो वक़्त याद किया ख़ुद सिहर उठा मैं जब'-- मुझे इस मिसरे का वाक्य विन्यास ठीक नहीं लगा, उचित लगे तो यों कर सकते हैं :-

'वो वक़्त याद किया जब सिहर उठा था मैं "

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 9, 2022 at 1:02pm

आदरणीय दयाराम मेठाणी जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई का तह-ए-दिल से शुक्रिया।

Comment by Dayaram Methani on May 9, 2022 at 12:49pm

आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' जी, बहुत अच्छी एवं संदेश परक गज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें। गज़ल का मुखड़ा ही बहुत सुंदर संदेश दे रहा है —
इबादतों में अक़ीदत की सर-कशी न मिला
महब्बतों में मेरे यार दुश्मनी न मिला

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 6, 2022 at 9:01pm

आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और उत्साहवर्धन हेतु आभार। सादर।

Comment by Sushil Sarna on May 6, 2022 at 8:30pm
वाहहहहहह आदरणीय अमीरुद्दीन साहिब, बहुत ही खूबसूरत गजल बनी है । दिल से मुबारक कबूल फरमाएं ।
Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 6, 2022 at 2:10pm

मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद और ज़र्रा नवाज़ी का शुक्रिया। जी, ज़ह्र को भूलवश 12 पर लिया गया है ध्यान दिलाने के लिए शुक्रिया, मिसरे को कृपया यूँ पढ़ा जाए -

"हवाओं में न कहीं अब ये ज़ह्र घुल जाए"  सादर। 

Comment by Rachna Bhatia on May 6, 2022 at 11:46am

आदरणीय अमीरुद्दीन "अमीर" जी अच्छी ग़ज़ल हुई बधाई स्वीकार करें। आदरणीय ज़ह्र का वज़्न क्या लिया है।

सादर।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 6, 2022 at 8:25am

आदरणीय लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद और ज़र्रा नवाज़ी का शुक्रिया। सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 5, 2022 at 1:38pm

आ. भाई अमीरूद्दीन जी, सादर अभिवादन। अच्छी गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

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