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तकरार- (कुंडलिया) ....

रहने भी दो अब सनम, आपस की तकरार ।
बीत न जाए व्यर्थ  में, यौवन  के  दिन  चार ।
यौवन के दिन  चार,  न लौटे  कभी  जवानी ।
चार  दिनों   के  बाद , जवानी  बने  कहानी ।
कह  'सरना'  कविराय,  पड़ेंगे  ताने   सहने ।
फिर   सपनों के   साथ, लगेंगी   यादें   रहने ।

सुशील सरना / 25-10-21

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Sushil Sarna on November 13, 2021 at 8:59pm
आदरणीय श्याम नारायण जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय
Comment by Sushil Sarna on November 13, 2021 at 8:58pm
आदरणीय समर कबीर जी आदाब, सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है सर
Comment by Sushil Sarna on November 13, 2021 at 8:58pm
आदरणीय शेख उस्मानी साहब आदाब सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है सर
Comment by Sushil Sarna on November 13, 2021 at 8:56pm
आदरणीय अमीरुद्दीन साहिब, आदाब - सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी
Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on November 5, 2021 at 8:41pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, दिलचस्प अभिव्यक्ति व्यक्त करती रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें।  सादर। 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 30, 2021 at 7:10pm
आदाब। बढ़िया रोचक व प्रचलित अनुभव अभिव्यक्ति। हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना जी।
Comment by Samar kabeer on October 30, 2021 at 6:50am

जनाब सुशील सरना जी आदाब ,कुण्डलिया छंद का अच्छा प्रयास है' बधाई स्वीकार करें I 

Comment by Sushil Sarna on October 28, 2021 at 8:32pm
आदरणीय जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार
Comment by Shyam Narain Verma on October 27, 2021 at 2:09pm
नमस्ते जी, बहुत ही सुंदर भाव, हार्दिक बधाई l सादर

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