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बन्धनहीन जीवन :. . . .

बन्धनहीन जीवन :......

क्यों हम 
अपने दु :ख को
विभक्त नहीं कर सकते ?

क्यों हम
कामनाओं की झील में
स्वयं को लीन कर
जीवित रहना चाहते हैं ?

क्यों
यथार्थ के शूल
हमारे पाँव को नहीं सुहाते ?

शायद
हम स्वप्न लोक के यथार्थ से
अनभिज्ञ रहना चाहते हैं ।

एक आदत सी हो गई है
मुदित नयन में
जीने की ।

अन्धकार की चकाचौंध को
अपनी सोच की हाला में
मिला कर पीने की ।

व्याकुलताओं को
खोखली हंसी के लिबास में छुपाकर
उन्मुक्त उन्माद में जीने की ।

शायद
यही है शैली
आज के
बन्धनहीन जीवन को
जीने की ।

सुशील सरना / 10-11-21

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Sushil Sarna on November 28, 2021 at 9:44pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 28, 2021 at 2:43pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुन्दर रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Sushil Sarna on November 18, 2021 at 8:56pm
आदरणीय बृजेश जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 15, 2021 at 6:36pm

बढ़िया कविता रची है आदरणीय...बधाई

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