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अछूतों सा - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२


अछूतों से भी मत करना कभी व्यवहार अछूतों सा
समय तुम को न इस से दे कहीं दुत्कार अछूतों सा।१।
**
कहोगे भार जब उनको तुम्हें कोसेगा अन्तस नित
कहोगे तब स्वयम् को ही यहाँ पर भार अछूतों सा।२।
**
करोना  वैसा  ही  लाया  करें  व्यवहार  जैसा  हम
उसी का भोगता अब फल लगे सन्सार अछूतों सा।३।
**
पता पाओगे  पीड़ा  का  उन्हें  जो  नित्य  डसती है
कहीं पाओगे जग में जब कभी सत्कार अछूतों सा।४।
**
सभी के वास्ते क्या क्या मलिन वो काम करते नित
नहीं उस पर भी करते क्यों कहो आभार अछूतों सा।५।
**
बुरा देखा न उनका  पर  करे कोई तो कहते क्यों
रखे  है  देखिए  कैसा  बुरा  आचार  अछूतों  सा।६।
**

( रचना : ३१ जुलाई २०२० )
मौलिक-अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
*( गुमनाम पिथौरागढ़ी जी की भूमि पर  कुछ बदलाव के साथ )

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 9, 2020 at 4:04am

आ. भाई  बृजेश जी सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और सुझाव के लिए आभार ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 8, 2020 at 3:01pm

आदरणीय धामी जी बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है परंतु मतले का उला खटक रहा है...

"वगरना वक़्त दे देगा तुम्हे दुत्कार अछूतों सा" कैसा रहेगा? या आप ही कुछ और विचारें..सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 6, 2020 at 4:39pm

आ. भाई रवि भसीन जी, सादर अभिवादन । आपको गजल अच्छी लगी यह मेरे लिए हर्ष का विषय है । इस स्नेह के लिए आभार।

आशा है भविष्य में भी स्नेह व मार्गदर्शन की क्रिपा बनाए रखेंगे ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 6, 2020 at 4:35pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on August 6, 2020 at 1:54pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' भाई, बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई है, इस पर दाद और मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाएँ।

Comment by TEJ VEER SINGH on August 6, 2020 at 11:16am

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी। बेहतरीन गज़ल।

अछूतों से भी मत करना कभी व्यवहार अछूतों सा
समय तुम को न इस से दे कहीं दुत्कार अछूतों सा।१।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 6, 2020 at 7:22am

आ. भाई आशीष जी, उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by आशीष यादव on August 5, 2020 at 1:37pm

बहुत बढ़िया गजल बनी है। मुबारकबाद स्वीकार हो।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 5, 2020 at 11:56am

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by सालिक गणवीर on August 5, 2020 at 11:41am

भाई लक्षण धामी 'मुसाफिर'
सादर अभिवादन
 अलिफ वस्ल का शानदार इस्तेमाल कर आपने बढ़िया ग़ज़ल कही है.बधाइयाँँ.

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