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तरही ग़ज़ल नम्बर 2,कुछ नये क़वाफ़ी के साथ ।

फाइलातून फ़ाइलातुन फाइलुन

दुश्मन-ए-जाँ लरज़ह  बर अंदाम है

जब तलक ज़िन्दा हमारा नाम है

सोचने की क़ुव्वतें मफ़लूज हैं

मुल्क में सबको हुआ सरसाम है

चूस लेती है बदन का ये लहू

शाइरी भी कितनी ख़ूँँ  आशाम है

उसको छूने से भी मुझको डर लगे

इस क़दर नाज़ुक वो गुल अंदाम है

ये तो दीवानों की बस्ती है "समर"

तुम यहां क्यों आ गए क्या काम है

---------

लरज़ह बर अंदाम--कांपना

मफ़लूज--अपाहिज,जिसे फ़ालिज मार गया हो ।

सरसाम--एक बीमारी जिसमें सर में वरम(सूजन)आ जाती है ।

खूँ आशाम--ख़ून चूसने वाली ।

गुल अंदाम---फूल सा बदन

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on January 1, 2018 at 2:34pm

जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on January 1, 2018 at 2:32pm

जनाब अजय तिवारी जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on January 1, 2018 at 2:31pm

जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on January 1, 2018 at 2:30pm

जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by TEJ VEER SINGH on December 31, 2017 at 6:29pm

हार्दिक बधाई आदरणीय समर क़बीर साहब जी।आदाब ।बेहतरीन गज़ल।

ये तो दीवानों की बस्ती है "समर"

तुम यहां क्यों आ गए क्या काम है

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 29, 2017 at 7:19pm

ग़ज़ब कमाल बेमिशाल ..................दिली मुबारकबाद आदरणीय| मंच पर स्नेह यूँ ही बनाये रखिये 

Comment by Afroz 'sahr' on December 29, 2017 at 3:17pm

आदरणीय समर कबीर साहिब इस बेहतरीन कलाम के लिए ढेरों मुबारकबाद कुबूल करें ,

Comment by Naveen Mani Tripathi on December 28, 2017 at 10:54pm

चूस लेती है बदन से ये लहू 

  • वाह सर तारीफ के लिए शब्द नहीं बचे । लाजबाब ग़ज़ल । सादर नमन ।
Comment by Sushil Sarna on December 28, 2017 at 7:22pm

उसको छूने से भी मुझको डर लगे

इस क़दर नाज़ुक वो गुल अंदाम है

गज़ब ... क्या अहसास हैं आदरणीय समर कबीर साहिब ... आपका कोई सानी नहीं। दिल से हर शेर के लिए मुबारकबाद कबूल फरमाएं से।

Comment by Kalipad Prasad Mandal on December 28, 2017 at 5:17pm

आदरणीय समर कबीर साहिब आदाब , आपने तो दुश्मनों का क्ष रे निकाल दिया |सच है उनके सिर ही अपाहिज हो गए थे | इस बेमिसाल ग़ज़ल के लिए शेर दर शेर मुबारकबाद कुबूल करें |आदाब 

दुश्मन-ए-जाँ लरज़ह  बर अंदाम है

जब तलक ज़िन्दा हमारा नाम है

सोचने की क़ुव्वतें मफ़लूज हैं

मुल्क में सबको हुआ सरसाम है

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