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1222 - 1222 - 1222 - 1222

ग़ज़ल में ऐब रखता हूँ कि वो इस्लाह कर जाते

वगर्ना आजकल रुकते नहीं हैं बस गुज़र जाते 

न हो उनकी नज़र तो बाँध भी पाता नहीं मिसरा 

ग़ज़ल हो नज़्म हो अशआर मेरे सब बिखर जाते

 

बड़ी मुद्दत से मैं भी कब 'मुरस्सा' नज़्म कह पाया 

ग़ज़ल पर सरसरी नज़रों ही से वो भी गुज़र जाते

अरूज़ी हैं अदब-दाँ वो अगर बारीक-बीनी से 

न देते इल्म की दौलत तो कैसे हम निखर जाते

मिले हैं ओ. बी. ओ. पर वो हमारी ख़ुशनसीबी है 

'समर' सर के बिना हम बे-सुरे बे-वज़्न मर जाते 

ख़ुदा दे उम्र में बरकत रहें दोनों जहाँ रौशन

जहाँ 'हज़रत' की आमद हो वहीं गौहर बिखर जाते 

मेरे उस्ताद हैं 'आली 'समर' साहिब 'अमीर' उनकी 

इनायत की नज़र से ही सुख़न बिगड़े संँवर जाते

"मौलिक व अप्रकाशित" 

  

इस्लाह- त्रुटियों को दूर करना, शुद्धि मुरस्सा- रत्न जड़ित, सुसज्जित (काव्य)

अरूज़ी- इल्म-ए-अरूज़, पिंगल शास्त्र का ज्ञाता अदब-दाँ- अदीब, आलिम, भाषाविद

बारीक-बीनी- सूक्ष्मदर्शता, पैनी नज़र गौहर- मोती, रत्न, बुद्धिमत्ता

दोनों-जहाँ- दुनिया और आख़िरत 'आली- ऊँचे मर्तबे वाले, मान्यवर

इनायत की नज़र- महब्बत और महरबानी की नज़र 

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Comment by रामबली गुप्ता on November 16, 2024 at 6:46am

आदरणीय समर भाई साहब को समर्पित बहुत ही सुंदर ग़ज़ल लिखी है आपने भाई साहब।हार्दिक बधाई लीजिये।

Comment by Dayaram Methani on October 8, 2024 at 10:22pm

आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' जी, गुरु की महिमा पर बहुत ही सुंदर ग़ज़ल लिखी है आपने। समर सर वाकई ऐसे गुरु कहें या उस्ताद है जो लाखों मे एक है। इस ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on September 14, 2024 at 9:38am

आदाब, उस्ताद-ए-मुहतरम, आपका ये ख़िराज-ए-तहसीन क़ुबूल फ़रमा लेना मेरे लिए बाइस-ए-शरफ़ और मसर्रत है, आपकी दुआओं का तालिब और ममनून रहूँगा। 

Comment by Samar kabeer on September 12, 2024 at 11:36am

//मुहतरम समर कबीर साहिब के यौम-ए-पैदाइश के अवसर पर परिमार्जन करके रचना

को उस्ताद-ए-मुहतरम को नज़्र कर रहा हूँ//

बहुत-बहुत शुक्रिय: जनाब अमीरुद्दीन साहिब आपकी महब्बतों के लिए, सलामत रहें ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on September 9, 2024 at 8:42am

चूंकि मुहतरम समर कबीर साहिब और अन्य सम्मानित गुणीजनों ने ग़ज़ल में शिल्पबद्ध त्रुटियों की ओर मेरा ध्यान आकृष्ट कराया था अतः भरपूर प्रयास के बाद मुहतरम समर कबीर साहिब के यौम-ए-पैदाइश के अवसर पर परिमार्जन करके रचना को उस्ताद-ए-मुहतरम को नज़्र कर रहा हूँ। 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 18, 2021 at 1:28pm

जनाब बृजेश कुमार ब्रज जी आदाब, आदरणीय निलेश जी की टिप्पणी ग़ज़ल पर आई थी, जिस पर मेरी प्रतिक्रिया भी आप देख सकते हैं लेकिन शायद किसी तकनीकी ख़राबी के कारण टिप्पणी हट गयी है। उनकी टिप्पणी का अंश मेरी प्रतिक्रिया में //दिक्कत यह है कि हिन्दी वाले और उर्दू वाले कभी कभी हठधर्मी हो जाते हैं..// में आप देख सकते हैं। सादर। 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 17, 2021 at 5:01pm

पूछने का लाभ भरपूर मिला...शुक्रिया आदरणीय समर कबीर जी,सौरभ पांडेय जी..और अमीरुद्दीन जी...नीलेश जी की टिप्पड़ी और मिल जाती तो अच्छा रहता...उन्होंने क्या प्रकाश डाला है।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 15, 2021 at 4:26pm

//जनाब निलेश जी की टिप्पणी मुझे नज़र नहीं आ रही है, कुछ देर पहले तक तो थी?//

जी मुहतरम मैं भी निलेश जी की टिप्पणी ग़ाइब पा कर हैरान हूँ। इसके बारे में मुझे जानकारी नहीं है।  सादर। 

Comment by Samar kabeer on October 15, 2021 at 3:47pm

जनाब अमुरुद्दीन साहिब, जनाब निलेश जी की टिप्पणी मुझे नज़र नहीं आ रही है, कुछ देर पहले तक तो थी?

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 15, 2021 at 3:34pm

मुहतरम निलेश 'नूर' जी, ग़ज़ल पर आपकी आमद सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई का तह-ए-दिल से शुक्रिया।

//दिक्कत यह है कि हिन्दी वाले और उर्दू वाले कभी कभी हठधर्मी हो जाते हैं..// 

जनाब हम न तो विशुद्ध हिन्दी वाले हैं और न ही ख़ालिस उर्दू वाले हैं, बल्कि दोनों ही भाषाओं को पूरे सम्मान, प्रेम और ख़ुशी के साथ मानने वाले हैं, और दोनों ही भाषाओं को उनकी मूल विधाओं के अनुसार इस्तेमाल के अधिकतम प्रयास के पक्षधर हैं। मिसाल के तौर पर आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी के रचित दोहे और छंद रचनाएं और मुहतरम समर कबीर साहिब की तख़लीक़-शुदा ग़ज़लें और नज़्म....

लेकिन इस का अर्थ यह क़तई नहीं है कि दोहे और छंदों में उर्दू के अल्फ़ाज़ और ग़ज़ल वगै़रह में हिंदी के शब्द न हों, ये आसान भी नहीं है। लेकिन ज़रूरी ये है कि जिस भाषा की भी मूल विधा का साहित्य या काव्य रचा जाए उसमें उस भाषा के शब्दों में वर्तनी-दोष न हों भले ही रचना में प्रयुक्त अन्य भाषा के शब्द विशुध्द न हों। सादर। 

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