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ग़ज़ल (महब्बतों से बने रिश्ते यूँ बिखरने लगे)

1212 - 1122 - 1212 - 112/22

महब्बतों से बने रिश्ते यूँ बिखरने लगे 

मुझी से कट के मेरे मेह्रबाँ गुज़रने लगे

*

मशाल इल्म की फिर से बुझा गया कोई 

फ़सादी सारे जिहालत में रक़्स करने लगे

अवाम जिनको समझती रही भले किरदार 

मुखौटे उन के भी चेहरों से अब उतरने लगे

ख़ुलूस और महब्बत के पैरोकार भी अब

धरम के नाम पे आपस में वार करने लगे 

*

सिला ये हमको मिला उन से दिल लगाने का

जुनून-ए-इश्क़ में हर हद से हम गुज़रने लगे 

*

जो रख सके न मेरे ज़ख़्म पे कभी मरहम  

सितारे तोड़ के लाने की बात करने लगे

*

दिवार जब से गिरी इस ग़रीब-ख़ाने की 

मुहल्ले वाले मेरे घर से ही गुज़रने लगे 

*

ख़ुमार अभी तो जवानी का है बहुत बाक़ी 

कहा ये किस ने कि हम उम्र से उतरने लगे

हमें तो सुध भी नहीं थी 'अमीर' दुनिया की 

तुम्हीं को देख के हम जीने और मरने लगे 

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on August 19, 2023 at 6:23pm

आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई का तह-ए-दिल से शुक्रिया जनाब।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on August 19, 2023 at 6:19pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद, ज़र्रा नवाज़ी और महब्बत के लिए ममनून हूँ। 

मंच पर सक्रियता कम होने की वज्ह कुछ ज़ाती मसरूफ़ियात रही हैं, कोशिश करूँगा कि आइंदा मंच पर भी सक्रिय रहूँ। 

Comment by Sushil Sarna on August 18, 2023 at 2:38pm
वाहहहहहह बेहतरीन 👌 प्रस्तुति सर हार्दिक बधाई सर
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 18, 2023 at 8:43am

आ. भाई अमीरूद्दीन जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

आजकल मंच पर कम सक्रिय हैं। निवेदन है कि सक्रियता बनाए रखें। जिस से हम जैसों का उत्साह बना रहे। सादर...

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