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मुझको बता रहें हैं मेरी हद वो आजक

मुझको बता रहें हैं मेरी हद वो आजकल।

लगता है भूल बैठे हैं मक़्सद वो आजकल॥

उनका मुझे परखने का अंदाज़ देखिये,

लीटर से नापते हैं मेरा क़द वो आजकल॥

हल्के हवा के झोंके भी जो सह नहीं सके,

कहते फिरे हैं अपने को अंगद वो आजकल॥

रिश्तों की बात करते नहीं हैं किसी से अब

घायल हुए हैं अपनों से शायद वो आजकल॥

कल तक पकड़ के चलते थे जो उँगलियाँ मेरी

कहने लगे हैं अपने को अमजद वो आजकल॥

ख़ुद अपनी मंज़िलों की जिन्हें कुछ ख़बर नहीं,

पहुंचा रहे हैं औरों को…

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Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on October 15, 2012 at 12:30am — 10 Comments

मानव मणि: नर से नारायण - स्वामी विवेकानंद -संजीव 'सलिल'

मानव मणि:

नर से नारायण - स्वामी विवेकानंद

संजीव 'सलिल'


*



'उत्तिष्ठ, जागृत, प्राप्य वरान्निबोधत।'  



'उठो, जागो और अपना लक्ष्य प्राप्त करो।' 



'निर्बलता के व्यामोह को दूर करो, वास्तव में कोई दुर्बल नहीं है। आत्मा अनंत, सर्वशक्ति संपन्न और सर्वज्ञ  है। उठो! अपने वास्तविक रूप को जानो…

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Added by sanjiv verma 'salil' on October 14, 2012 at 4:51pm — 4 Comments

मतगयंद (मालती)सवैया. (भगण x 7 अंत में दो गुरु) एक प्रयास

सूरज ताप बढ़ाकर जो मरुभूमि धरा पर दृश्य दिखाता,

मानव अक्सर जीवन में यह रीत मिसाल बना भरमाता,

भाग रहा वह तेज भयंकर झूठ कहे फिर भी अपनाता,

हाथ न आय तहाँ वह रोकर व्याकुल नीर बहा पछताता/

Added by Ashok Kumar Raktale on October 14, 2012 at 1:00pm — 11 Comments

नागफनी

मेरे पास नहीं

बूढ़े बरगद सी बाहें

फैलाकर

जिन्हें अनवरत 

बांट सकूं 

छांह

धरती को चीरती 

विकराल  जड़ें -

गहराइयों  की

लेती जो थाह  

पास नहीं मेरे

पीपल का जादुई

संगीत

वो  हरी- भरी

काया ,

वह पत्तों का

मर्मर  गीत 

कोई न

पूजे मुझको 

पीपल, बरगद

के मानिंद

कंटकों से

पट गयी है 

देह ऐसे-

निकट आते

हैं नहीं

खग वृन्द

मरुथली संसार में

रेत के विस्तार में…

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Added by Vinita Shukla on October 14, 2012 at 12:30pm — 14 Comments

शायरी मिल गयी

तुम मिले तो मुझे हर ख़ुशी मिल गयी 
यूँ लगा के मुझे जिंदगी मिल गयी 
कांच सा टूटकर दिल बिखर जायेगा 
अब इसे गर तेरी बेरुखी मिल गयी 
तेरी चाहत ने दिल को बनाया हे दिल 
क्या हुआ गर मुझे बेकली मिल गयी 
इस तरह दिल को रोशन किया आपने 
यूँ लगा रात को चांदनी मिल गयी 
सुन के आवाज़ तेरी मुझे यूँ लगा 
मेरे नगमो को अब रागनी मिल गयी 
तुझको देख तो दिल से ये आई सदा 
मुझको हसरत मेरी शायरी…
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Added by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on October 14, 2012 at 11:54am — 5 Comments

हिन्दी और मच्छर (हास्य) // शुभ्रांशु

बदलते मौसम की शाम का आनन्द लेने हमसभी पार्क में बैठे थे. हम सभी का मतलब लालाभाई, मैं और एक नये सदस्य भास्करन. तभी भास्करन का मोबाइल किंकियाया. अब उस तरह की आवाज को और क्या शब्द दिया जा सकता है. मोबाइल पर तमिल में काफ़ी देर तक बात चलती रही. यों पल्ले तो कुछ भी नहीं पड़ रहा था लेकिन हमसभी उनके चेहरे के मात्र हावभाव से ही सही, उनकी बातों को पकड़ने की कोशिश करते रहे. कुछ देर के बाद जब उनकी बात खत्म हो गयी तो मैंने अपनी झल्लाहट को स्वर देते हुये ठोंक दिया,
"यार तमिल सुनने में क्या…
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Added by Shubhranshu Pandey on October 13, 2012 at 9:30pm — 14 Comments

शब्द कचोटते रहते है --

पिता की मृत्यु के चार वर्ष बाद बड़े लड़के निर्मल की शादी के समय छोटा भाई सबल 13 वर्ष का था । नयी बहु आये दिन साँस से झगडती रहती थी | निर्मल अन्दर से परेशान | भाई भाभी के बेरुखे व्यव्हार से और गलत संगत के कारण सबल देर रात तक आने लगा |एक दिन निर्मल ने अपने जीजा को कहने लगा "जीजाजी मेरी पत्नी को न मै समझा सकता हूँ, और न ही उसको डांटकर अशांति फैलाना चाहता हूँ" | परेशान हो माँ ने अलग रसोई करने का निर्णय स्वीकार कर लिया |



माँ को अल्प पारिवारिक पेंशन से अपना और छोटे लड़के सबल का निर्वाह…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 13, 2012 at 3:30pm — 7 Comments

समस्त ओ बी ओ परिवार की ओर से स्वात घाटी की निर्भीक बेटी मलाला के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ हेतु मंगलकामनाएं ....



 

 

 

 

 

 

 

 

स्वात घाटी की निर्भीक बेटी मलाला को समर्पित 

सुन्दरी सवैया

अधिकार मिले सब शिक्षित हों बिखरे चहुँ ओर हि ज्ञान उजाला.

लड़ती जब जायज़ घायल क्यों सुकुमारि दुलारि पियारि 'मलाला'.

सब…

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Added by Er. Ambarish Srivastava on October 13, 2012 at 3:00pm — 20 Comments

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने- ३९ (जैसे कोई अतीत दबे पाँव आपके पीछे पीछे ही हमसवार है)

ऐतिहासिक इमारतों में कितना आकर्षण समाया है. इक पूरी ज़िंदगी और ज़माने का कोई थ्री डी अल्बम हों ये जैसे. ख्यालों की लम्बी दौड़ लगानेवालों के लिए गोया ये फंतासी, रूमानियत, त्रासदी, और न जाने किन किन रंगों के तसव्वुरात की कब्रगाह या कोई मज़ार हैं ये इमारतें.

 

ज़िंदगी जीते हुए जितनी हसीन नहीं लगती उससे कहीं अधिक माजी के धुंधले आईने में नज़र आती है. जैसे गर्द से आलूदा किसी शीशे में कोई हसीन सा चेहरा पीछे से झांकता नज़र आ जाए और हम खयालों में मह्व (खोए), हौले से अपनी उंगुलियाँ आगे…

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Added by राज़ नवादवी on October 13, 2012 at 11:19am — 10 Comments

दो सवय्ये

(1)

(तालिबानी फरमान न मानने वाली छात्रा बिटिया मलाला को समर्पित) 

सुंदरी सवैया

उगती जब नागफनी दिल में, मरुभूमि बबूल समूल सँभाला ।

बरसों बरसात नहीं पहुँची, धरती जलती अति दाहक ज्वाला ।

उठती जब गर्म हवा तल से, दस मंजिल हो भरमात कराला ।

पढ़ती तलिबान प्रशासन में, डरती लड़की नहीं ढीठ मराला ।।

(2)…

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Added by रविकर on October 13, 2012 at 8:30am — 12 Comments

एक नवगीत : शब्द चित्रों की सफलता के लिए

खूबसूरत दृश्य

हम गढ़ते रहे,

शब्द चित्रों की

सफलता के लिए |





शहर धीरे धीरे

बन बैठा महीन

दिख रहा है हर कोई

कितना जहीन

गाँव दण्डित है

सहजता के लिए || १ ||



घर की दीवारों

में हाहाकार है

लक्ष्मी का रूप

अस्वीकार है

कौन सोचे

नव प्रसूता के लिए || २ ||



जब से हम सब

खुद पे अर्पण हो गये

बस तभी शीशा से

दर्पण हो गये

या सुपारी हैं

सरौता के लिए || ३ ||…



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Added by वीनस केसरी on October 13, 2012 at 1:00am — 6 Comments

जो बाँतें चेनो ओ अमन की करते हैं

जो बाँतें चेनो ओ अमन की करते हैं 
खुद तैयारी कफन की करते हैं 
------------------------------------------
फूल का कारोबार है उनका 
जो बुराई चमन की करते  हैं 
--------------------------------------------
लोग कहते हैं सिरफिरा उनको 
जो बाँतें  ज्यादा वतन की करते हैं 
--------------------------------------------
उनकी यादें भी न रहती महफूज़  
जो हिफाज़त वतन की करते…
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Added by ajay sharma on October 12, 2012 at 5:30pm — 1 Comment

सांस के क़दमों से पूछियें .......

-------------------------------------------

कितनी ख़ास ओ आम ज़िन्दगी 

पेट  की  ग़ुलाम  ज़िन्दगी
--------------------------------------------
मिल गयी तो  सुबह हो  गयी 
खो गयी तो शाम ज़िन्दगी 
--------------------------------------------
हर गरीब अमीर के लिए 
बन गयी इक काम ज़िन्दगी
-------------------------------------------
सांस…
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Added by ajay sharma on October 12, 2012 at 5:21pm — 3 Comments

जमें रहना है

तालाब में मगरमच्छ

शिकार की तलाश में हैं

गिरगिट अपना रंग बदले

दबे पाँव जमे हैं

मकड़ियाँ जाल बुनने में

व्यस्त हैं ।

इन सबके बीच

फूलों को  फर्क नहीं पड़ता…

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Added by नादिर ख़ान on October 12, 2012 at 4:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल"बह्र ए खफीफ"

======ग़ज़ल=======

बह्र ए खफीफ

वजन- २ १ २ २ , १ २ १ २ , २ २



यूँ बिछड़ने की ये अदा कैसी 

इक मुलाक़ात की दुआ कैसी



जख्म दिल के हमारे भरने को

चश्म छलका रहे दवा कैसी



रात…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on October 12, 2012 at 3:38pm — 9 Comments

नेता है तो देश है..!

नेता है तो देश  है..!

 

(courtesy Google…

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Added by MARKAND DAVE. on October 12, 2012 at 9:00am — 6 Comments

कुरंग (बैरवे) पर एक प्रयास.

देख पिया को सम्मुख,मन हर्षाय,

देखे मुख को गौरी,नयन घुमाय/

 

पागल प्रेम दिवानी,पिया रिझाय,

सुधबुध खोकर अपनी,झूमति जाय/

 

हाथ धरे कभी शीश,चुमती जाय,

बनी मतवाली रीझ,घुमती जाय/

 

मुस्काय दिल पर हाय,घाव लगाय,

व्याकुल मनवा थिरके,चैन न पाय/

 

प्रेम पगे दिल आयी,मिलन कि चाह,

प्रेम बिना सूझे नहि, दूजी राह/

Added by Ashok Kumar Raktale on October 11, 2012 at 11:14pm — 17 Comments

ग़ज़ल

(बहरे रमल मुसम्मन मख्बून मुसक्कन

फाइलातुन फइलातुन फइलातुन  फेलुन.

२१२२     ११२२     ११२२    २२)

 

जब भी हो जाये मुलाक़ात बिफर जाते हैं

हुस्नवाले भी अजी हद से गुजर जाते हैं

 

देख हरियाली चले लोग उधर जाते हैं

जो उगाता हूँ उसे रौंद के चर जाते हैं

 

प्यार  है जिनसे मिला उनसे शिकायत ये ही

हुस्नवाले है ये दिल ले के मुकर जाते हैं

 

माल लूटें वो जबरदस्त जमा करने को

रिश्तेदारों के…

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Added by Er. Ambarish Srivastava on October 11, 2012 at 11:00pm — 22 Comments

हाइकु

दस हाइकु 
***********
जहर धीमा 
परोसते चेनल 
चरम सीमा 
-------------
चपलता है 
तन-मन स्वस्थ है 
सफलता है 
--------------
चेहरा भाव 
मन की परिस्थिती 
हंसते घाव 
--------------
जंगली फूल 
लान  की हरियाली 
क्यूँ प्रतिकूल ?
--------------
बहती नदी 
कटते यूँ किनारे 
यही है…
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Added by AVINASH S BAGDE on October 11, 2012 at 8:36pm — 17 Comments

मुक्तिका; बेवफा से ... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका;

बेवफा से ...

संजीव 'सलिल'

*

बेवफा से दिल लगा के, बावफा गाफिल हुआ। 

अधर की लाली रहा था, गाल का अब तिल हुआ।।



तोड़ता था बेरहम अब, टूटकर चुपचाप है।

हाय रे! आशिक 'सलिल', माशूक का क्यों दिल हुआ?



कद्रदां दुनिया थी जब तक नाश्ते की प्लेट था।

फेर लीं नजरों ने नजरें, टिप न दी, जब बिल हुआ।।



हँसे खिलखिल यही सपना साथ मिल देखा मगर-

ख्वाब था दिलकश,  हुई ताबीर तो किलकिल हुआ।।



'सलिल' ने माना था भँवरों को  कँवल का मीत पर-

संगदिल…

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Added by sanjiv verma 'salil' on October 11, 2012 at 7:59pm — 8 Comments

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