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ग़ज़ल - भोगा हुआ यथार्थ..

.

जिसकी  रही  कभी नहीं आदत उड़ान की

अल्फ़ाज़ खूबियाँ कहें खुद उस ज़ुबान की

*

भोगा हुआ यथार्थ जो सुनाइये,  सुनें

सपनों भरी ज़ुबानियाँ  दिल की न जान की..

*

जिसके खयाल हरघड़ी परचम बने उड़ें

वो खा रहा समाज में इज़्ज़त-ईमान की ..

*

जिनके कहे हज़ारहा बाहर निकल पड़े

ऐसी जवान ताव से चाहत कमान की..

*

जबसे सुना कि शोर है अब इन्क़िलाब का

ये सोच खुश हुआ बढ़ी  कीमत दुकान की.

*

हर नाश से उबारता, भयमुक्त जो…

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Added by Saurabh Pandey on September 1, 2011 at 9:30am — 15 Comments

चीख सिलवटों की

निस्शब्द स्वरों के कानफोड़ू शोर

चिलचिलाते मौन की बेधती टीस

लगातार भींचती जाती दंत-पंक्तियों में घिर्री कसावट

माज़ी का गाहेबगाहे हल्लाबोल करते रहना..... ....

जब एकदम से सामान्य हो कर रह जाय.. 

तो फिर...

कागज़ के कँवारेपन को दाग़ न लगे भी तो कैसे?

आखिर जरिया भर है न बेचारा ..

/एक माध्यम भर../

कुछ अव्यक्त के निसार हो जाने भर का

महज़ एक जरिया ... ...और....

किसी जरिये की औकात आखिर होती ही क्या है ?

उसके…

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Added by Saurabh Pandey on June 24, 2011 at 8:09pm — 11 Comments

स्मृतियों के दरीचे से

स्मृतियों के अनगढ़ कमरे से

अचानक बाहर फुदक आयी हैं कुछ नम रोशनियाँ... /आज फिर.. ..

एक बार फिर

मासूम सी कोशिश की है इनने..

कि, मनाँगन में

कशिशभरी आवारा धूप बन लहर-लहर नाचेंगी..

 

तुम मेरे साथ हो न हो.... ..

इन रोशनियों के साथ जरूर होना.. ..

...............कोशिश तो करना.. ..

मुझे पता है .. गया समय उल्टे पाँव नहीं चलता..

किन्तु इन भोली-निर्दोष रोशनियों को अब कौन समझाये..

और देखो.. ..

तुम भी मत समझाना..…

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Added by Saurabh Pandey on June 24, 2011 at 7:30pm — 12 Comments

आओ साथी बात करें हम

आओ साथी बात करें हम

अहसासों की रंगोली से रिश्तों में जज़्बात भरें हम..

 

रिश्तों की क्यों हो परिभाषा

रिश्तों के उन्वान बने क्यों

हम मतवाला जीवनवाले

सम्बन्धों के नाम चुने क्यों

तुम हो, मैं हूँ, मिलजुल हम हैं, इतने से बारात करें हम..

आओ साथी बात करें हम.........

 

शोर भरी ख्वाहिश की बस्ती--

--की चीखों से क्या घबराना

कहाँ बदलती दुनिया कोई

उठना, गिरना, फिर जुट जाना

स्वर-संगम से अपने श्रम के, मन…

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Added by Saurabh Pandey on June 22, 2011 at 6:30pm — 18 Comments

हम ठगे जाते रहे हैं..

हम लुटे हैं

हम ठगे हैं.. और ये होता रहा है पुरातन-काल से..

हम ठगाते ही रहे हैं..

उन हाथों ठगे जिन्हें

प्रकृति-मनुज का क्रमान्तर बताना था

काल-मनवन्तर रचना और बनाना था

वर्ग-व्यवहार निभाना था..

हम ठगे गये उन आत्म-अन्वेषियों/खोजियों के हाथों

छोड़ गये जो पीछे बिलखता समुदाय, पूरा समाज

परन्तु यह वर्त्त न पा सका एक मुसलसल रिवाज़

फिर, हम फिर ठगे गये उनसे

जिन्होंने अपनी रीढ़हीन मूँछों और अपनी अश्लील ज़िद के आगे

पूरे राष्ट्र को रौंदवा दिया.. और धरवा… Continue

Added by Saurabh Pandey on June 6, 2011 at 1:20am — 6 Comments

जिजीविषा

नीरव-गुमसी चट्टानों पर

कटी-पिटी उभरी रेखाएँ

उन्मत्त काल का

हिंस्र वज्र-नख

जगह-जगह से नोंच गया है..।



अभिलाषा है कुछ विक्षिप्त

स्वप्न बच गए जूठे-जूठे

मसले थकुचे नुचे-चुथे से

स्वप्न बच गए जूठे-जूठे



धूसर उपलों की धूप तापती

विवश बिसुरती ध्वनि अकेली

अशक्त नव-जन्मी बाला-सी पसरी..

उठा सके बस भार श्वाँस का निश्चय का जी तोड़ परिश्रम..



कि,

मुँदी

उठी

झपकी

ठिठकी

रुक-ठहर

परख

तकती... .. तबतक… Continue

Added by Saurabh Pandey on October 28, 2010 at 6:00am — 3 Comments

मुखौटे

मुखौटे

हर तरफ मुखौटे..

इसके-उसके हर चहरे पर

चेहरों के अनुरूप

चेहरों से सटे

व्यक्तित्व से अँटे

ज़िन्दा.. ताज़ा.. छल के माकूल..।



मुखौटे जो अब नहीं दीखाते -

तीखे-लम्बे दाँत, या -

उलझे-बिखरे बाल, चौरस-भोथर होंठ

नहीं दीखती लोलुप जिह्वा

निरंतर षडयंत्र बुनता मन

उलझा लेने को वैचारिक जाल..

..... शैवाल.. शैवाल.. शैवाल..



तत्पर छल, ठगी तक निर्भय

आभासी रिश्तों का क्रय-विक्रय

होनी तक में अनबुझ व्यतिक्रम

अनहोनी का… Continue

Added by Saurabh Pandey on September 27, 2010 at 1:00pm — 2 Comments

क्या बोलूँ..

क्या बोलूँ अब क्या लगता है..

चाहत में घन-पुरवाई है
किन्तु, पहुँच ना सुनवाई है
मेघ घिरे फिर भी ना बरसे तो मौसम ये लगता है.. क्या बोलूँ अब क्या लगता है?!

आस भरा 'थप-थप' चलता था
’ताता-थइया’ उठ गिरता था
आज पिघलती सड़कों पर निरुपाय खड़ा है, लगता है.. क्या बोलूँ अब क्या लगता है?!

ओढ़ गंध बन-ठन जाने का
शोर बहुत है खिल जाने का
लद गई उन्मन डाली भी यों कि अँदेसा लगता है.. क्या बोलूँ अब क्या लगता है?

Added by Saurabh Pandey on August 18, 2010 at 6:00pm — 5 Comments

अंदाज़ नया

चल रही हो संग हरदम विडंबना बन सहचरी तो क्यों न देखें ज़िन्दग़ी को एक नया आयाम दे कर ।

स्वप्न बन कर रह गई हो नव उषा की लालिमा जो क्यों न अपने रक्त ही से देख लें अंजाम दे कर ॥



देख कर हँसता रहा है द्वेष औ’ गुमान से

इस जमाने की कहें क्या बाँधता व्यवधान से

बढ़ते कदम का हर फिसलना हो अगर संज्ञान से

दृष्टि हँसती तोड़ती-सी कह उठेगी देख कर फिर - थे सधे कितने कदम वो बढ़ते रहे मुकाम दे कर ॥



खेत की हरियालियों में बारुदों के बीज क्यों

शांति खातिर हैं जगह जो बौखलाती… Continue

Added by Saurabh Pandey on August 15, 2010 at 9:03pm — 2 Comments

पावस-गीत

.

नव-पावस के भीगे हम-तुम...

कुछ अनचीन्हे कुछ परिचित-से मृदुभावों में जीएँ हम-तुम।



इस भावोदय की वेला में चलो अलस की साँझ भुला दें

चाह रहे जो कहना अबतक आज जगत को चलो सुना दें

इच्छाएँ कह अपनी सारी जड़-चेतन झन्ना दें हम-तुम ॥ नव-पावस के भीगे हम-तुम...



अर्थ बने क्यों रुकने के अब, अलि तन्द्रिल हो क्यों उपवन में

गंध बँधे कब तक कलियों में, पवन रुके कब तक आँगन में

नीरस-चर्या सभी बदल कर नव-उल्लास गहें मिल हम-तुम ॥ नव-पावस के भीगे… Continue

Added by Saurabh Pandey on July 27, 2010 at 2:02pm — 6 Comments

परिचय

.

कोई किसी से परिचय नहीं कराता

समय के साथ-साथ स्वयं परिचित होता जाता है हर अजनबी

नहीं रहती कोई इकाई बंद अपने आप में फिर

कहीं कुछ बनने लगता है

कहीं कुछ जनमने लगता है चुपचाप



ऐसा नहीं

अँधेरे में भागता हर अभागा पलायनवादी ही हो

चकचकाती इस उजली धूप से

बच पाने की इच्छा भी हो सकती है

वर्ना देखो उसकी आँखें

लाल डोरे की जालियाँ कितनी उलझती गई हैं, और

उलझाती गई हैं उसकी जाने कितनी वेगवती संभावनाएँ



यदि तुम्हारा अभिजात्य

इस… Continue

Added by Saurabh Pandey on July 27, 2010 at 2:00pm — 7 Comments

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