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नव-पावस के भीगे हम-तुम...
कुछ अनचीन्हे कुछ परिचित-से मृदुभावों में जीएँ हम-तुम।

इस भावोदय की वेला में चलो अलस की साँझ भुला दें
चाह रहे जो कहना अबतक आज जगत को चलो सुना दें
इच्छाएँ कह अपनी सारी जड़-चेतन झन्ना दें हम-तुम ॥ नव-पावस के भीगे हम-तुम...

अर्थ बने क्यों रुकने के अब, अलि तन्द्रिल हो क्यों उपवन में
गंध बँधे कब तक कलियों में, पवन रुके कब तक आँगन में
नीरस-चर्या सभी बदल कर नव-उल्लास गहें मिल हम-तुम ॥ नव-पावस के भीगे हम-तुम...

सम्बोधन ही क्यों बन्धन हो, हो नव-परिचय की आतुरता
सुन स्वर की आवृति मन अल्हड़, हुलस ’सगुन-सेनुर’ है गाता
कुहके रह-रह फुदके सिहरन, अब हैं सृजन-चितेरे हम-तुम ॥ नव-पावस के भीगे हम-तुम...

चलो बना कर मन को तितली प्रहर कली का फूल खिला दें
नव-ऊर्जा की चीख-चुहल से सोई बुलबुल आज जगा दें
तज बन्धन सब रूढ़ि-कथाएँ कुछ उत्पात करें मिल हम-तुम॥ नव-पावस के भीगे हम-तुम...

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 2, 2010 at 5:32pm
भाइयों आप सभी को धन्यवाद..
सहयोग बनाए रखिएगा
Comment by Rash Bihari Ravi on August 2, 2010 at 4:39pm
चलो बना कर मन को तितली प्रहर कली का फूल खिला दें
नव-ऊर्जा की चीख-चुहल से सोई बुलबुल आज जगा दें
main kya bolu bahut kuch hain
Comment by Kuldeep Kumar on August 2, 2010 at 10:47am
bahut sunder Sir ji ............

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 29, 2010 at 12:20am
अभिनन्दन राणाप्रताप..
एक समय ऐसा आता है जो ’सृजन-चितेरा’ होने का भान करा देता है.. और वो समय.. वो क्षण .. . सारी उम्र के लिए मन के किसी कोने में सदा के लिए चस्पाँ हो जाता है.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on July 28, 2010 at 10:19pm
सुन्दर, प्रवाहमय नवगीत....नव गीत इसलिए की काफी सारे नए बिम्बों का प्रयोग हुआ है जैसे

अलस की साँझ, जड़ चेतन झन्ना देना, हुलस ’सगुन-सेनुर’ है गाता, नव-ऊर्जा की चीख-चुहल, फुदके सिहरन

गीत में लोक शब्दों का भी आला प्रयोग अपनापन लेकर आया है. कुल मिलाकर मन को प्रफुल्लित करने वाला नवगीत. सौरभ सर आपका बहुत बहुत आभारी हूँ इस सार्थक रचना को पढवाने के लिए.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 27, 2010 at 9:19pm
सम्बोधन ही क्यों बन्धन हो, हो नव-परिचय की आतुरता
सुन स्वर की आवृति मन अल्हड़, हुलस ’सगुन-सेनुर’ है गाता
कुहके रह-रह फुदके सिहरन, अब हैं सृजन-चितेरे हम-तुम ,

बहुत खूब सौरभ भईया, खुबसूरत शब्दों के समावेश से यह रचना अति सुंदर बन पड़ी है, इस बेहतरीन अभिव्यक्ति हेतु साधुवाद,

कृपया ध्यान दे...

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