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कोई किसी से परिचय नहीं कराता
समय के साथ-साथ स्वयं परिचित होता जाता है हर अजनबी
नहीं रहती कोई इकाई बंद अपने आप में फिर
कहीं कुछ बनने लगता है
कहीं कुछ जनमने लगता है चुपचाप

ऐसा नहीं
अँधेरे में भागता हर अभागा पलायनवादी ही हो
चकचकाती इस उजली धूप से
बच पाने की इच्छा भी हो सकती है
वर्ना देखो उसकी आँखें
लाल डोरे की जालियाँ कितनी उलझती गई हैं, और
उलझाती गई हैं उसकी जाने कितनी वेगवती संभावनाएँ

यदि तुम्हारा अभिजात्य
इस परस्पर परिचय को महज़ एक जरिया समझता है
बेसाख़्ता आगे से आगे निकल जाने का महज़ एक सोपान
तो अफ़सोस..

यार,
शीशों मढ़ी इस रंगीन तस्वीर के साथ तब
कहीं कुछ और भी दरकता है / टूटता है बहुत गहरे
जिसे नहीं सुनते कोई कान
सुनती हैं तो बस पनियायी आँखें
और जवाब फिर नहीं देते कुछ शब्द
देती हैं तो उजबुजायी आँहें
जिनकी तासीर मज़ाक नहीं होती कभी
मज़ाक नहीं होती.

--सौरभ

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 29, 2010 at 12:15am
अभिनन्दन राणाप्रताप.
परिचय के कुछ आयाम और उन आयामों के कुअ अपने किस्से.. जो होता है वो होता ही हो ऐसा नहीं.. ... .रज्ज्वाँभुजञ्गमिव.. जैसे ही .. .. प्रतिभासितं वै.. और, एक बार चित्त के विचार जागरुक हो गए तो फिर और कोई भ्रम नहीं रह जाता. ..

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on July 28, 2010 at 10:31pm
सौरभ सर एकदम दिल निकाल कर रख दिया है आपने सबके सामने.............. जीवन में बरबस ही बने अनजाने रिश्ते...किसी बनावटी अपनेपन के मोहताज़ नहीं होते.....और एक बात आपने बिल्कुल सत्य कही है.......दूसरे के कंधे पर चढ़कर दीवार लांघना सबसे बड़ा कुकृत्य है......जब ऐसा होता है तो कष्ट का होना तो लाज़मी है.....और आपके ही शब्दों में .."जिनकी तासीर मज़ाक नहीं होती कभी" ....कुल मिलकर इतना कह सकता हूँ ..संवेदनाओं से ओतप्रोत एक उत्कृष्ट रचना पढ़ रहा हूँ.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 28, 2010 at 7:38pm
धन्यवाद सतीशजी.. सहयोग बनाए रखें.
-सौरभ
Comment by satish mapatpuri on July 28, 2010 at 4:48pm
ऐसा नहीं
अँधेरे में भागता हर अभागा पलायनवादी ही हो
चकचकाती इस उजली धूप से
बच पाने की इच्छा भी हो सकती है
वर्ना देखो उसकी आँखें
लाल डोरे की जालियाँ कितनी उलझती गई हैं, और
उलझाती गई हैं उसकी जाने कितनी वेगवती संभावनाएँ
श्रद्धेय पाण्डेय जी, आपका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ. आपने बहुत ही सुन्दर रचना प्रस्तुत की है. मेरा अभिवादन सहित साधुवाद स्वीकार करें.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 28, 2010 at 8:45am
गणेशजी, अभिनन्दन. सहयोग बनाए रखिएगा. धन्यवाद.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 27, 2010 at 9:22pm
ऐसा नहीं
अँधेरे में भागता हर अभागा पलायनवादी ही हो
चकचकाती इस उजली धूप से
बच पाने की इच्छा भी हो सकती है,

परिस्थितियों का खुबसूरत समावेश , अच्छी रचना और सुंदर प्रस्तुति , धन्यवाद,
Comment by Admin on July 27, 2010 at 9:14pm
आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी ,
प्रणाम,
सर्वप्रथम ओपन बुक्स ऑनलाइन के मंच पर मैं आपके पहले ब्लॉग का ह्रदय से स्वागत करता हूँ , आपने अच्छी रचना प्रस्तुत की है इसके लिये दिल से धन्यवाद, उम्मीद करते है कि आप के सहयोग और सानिध्य मे OBO परिवार प्रगति के पथ पर अग्रसरित रहेगा,
सादर
ADMIN
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