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नीरव-गुमसी चट्टानों पर
कटी-पिटी उभरी रेखाएँ
उन्मत्त काल का
हिंस्र वज्र-नख
जगह-जगह से नोंच गया है..।

अभिलाषा है कुछ विक्षिप्त
स्वप्न बच गए जूठे-जूठे
मसले थकुचे नुचे-चुथे से
स्वप्न बच गए जूठे-जूठे

धूसर उपलों की धूप तापती
विवश बिसुरती ध्वनि अकेली
अशक्त नव-जन्मी बाला-सी पसरी..
उठा सके बस भार श्वाँस का निश्चय का जी तोड़ परिश्रम..

कि,
मुँदी
उठी
झपकी
ठिठकी
रुक-ठहर
परख
तकती... .. तबतक में
झट छूट छलक भागा झटके में
वह काल भूमि पर रहा कहाँ
रह गया किन्तु पगचिह्न यहीं तो..
यही मौन सहचर प्रिय तक का..

सरक गए फिर अवश निकट सब
व्यथाएँ ले अपनी-अपनी..
कथाएँ ले अपनी-अपनी..।

-- सौरभ

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Comment by sanjiv verma 'salil' on October 30, 2010 at 12:46am
सशक्त...सारगर्भित रचना... साधुवाद.
Comment by विवेक मिश्र on October 29, 2010 at 12:43am
'काल का हिंस्र वज्र-नख' झेलना और 'बचे हुए जूठे सपनों को' अनुभव कर पाना सबके बस की बात नहीं.. कुछ महीने पहले गुलज़ार साहब की 'पुखराज' पढ़ी थी. आपकी कविता पढ़कर लगा कि अगर वे भी हिन्दी में लिखते, कुछ इसी तरह की नज्में बना करतीं. अद्भुत और अभूतपूर्व अभिव्यक्ति. जय हो..!
Comment by Shashi Ranjan Mishra on October 28, 2010 at 12:27pm
सौरभ भैया, अब तक चार बार इस कविता को पढ़ चुका और हर बार भाव कुछ अलग मिले... पाँचवी बार भी पढ़ुंगा | बहुत कुछ निचोड़ना है इन पंक्तियों से....
मैने अपना मौन स्वप्न देखा है इसमे...

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