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आओ साथी बात करें हम

अहसासों की रंगोली से रिश्तों में जज़्बात भरें हम..

 

रिश्तों की क्यों हो परिभाषा

रिश्तों के उन्वान बने क्यों

हम मतवाला जीवनवाले

सम्बन्धों के नाम चुने क्यों

तुम हो, मैं हूँ, मिलजुल हम हैं, इतने से बारात करें हम..

आओ साथी बात करें हम.........

 

शोर भरी ख्वाहिश की बस्ती--

--की चीखों से क्या घबराना

कहाँ बदलती दुनिया कोई

उठना, गिरना, फिर जुट जाना

स्वर-संगम से अपने श्रम के, मन कव्वाली-नात करें हम..

आओ साथी बात करें हम.......

 

सूखी बाड़ी, कंटक, झाड़ी

निर्मम-निष्ठुर जीवन कितना

चाहत-मरुथल, सपन बगूले

प्यासी भटकन, हतप्रभ जीना

द्वेष-दमन की दुपहरिया को मिलजुल कर सुख-रात करें हम..

आओ साथी बात करें हम............

 

हामी भरती रात सिसकती

दिन का हासिल ’स्वर क्रंदन के’

उमस भरी है बगिया मन की

जटिल हुए उच्छ्वास पवन के

कठिन निशा है साथी मेरे, आओ मिलजुल प्रात करें हम..

आओ साथी बात करें हम...........

 

नहीं भरोसा, नहीं समर्पण

लोभ-लाभ ही का नाता है

नहीं दिखे जो स्नेह परस्पर

रिश्ता फिर क्या कहलाता है

तेरा मुझसे, मेरा सबसे, प्यार बढ़े, हालात करें हम..

आओ साथी बात करें हम.........

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Comment

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Comment by Saurabh Pandey on July 2, 2012 at 9:22pm

डा. प्राची, आपकी प्रतिक्रिया ने हमारा उत्साह दूना कर दिया है.  आपको मेरा रचना-कर्म रुचा, इस हेतु मैं आपके प्रति आभार व्यक्त कर रहा हूँ.

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 2, 2012 at 4:16pm
कविता का एक एक शब्द जैसे बिलकुल सधा हुआ है... आपकी रचनाओं को पढ़ कर ज्ञात हो रहा है काव्य कैसा होना चाहिए... कैसे हर शब्द भाव सान्द्र और कहन का उद्देश्य उच्च व जन मानस से जुड़ा होना चाहिए.
यकीन मानिए मेरे पास शब्द नहीं है आदरणीय सौरभ सर इस रचना की तारीफ़ के लिए. सादर.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 28, 2011 at 3:49pm

विश्वास के व्यवहार को इंगित करने के लिये धन्यवाद.

Comment by Aradhana on July 27, 2011 at 9:34am
बहुत सुंदर और छ्लकता हुआ सा विश्वास रिश्तों, समाज एवं संवेदनाओं पर.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 25, 2011 at 2:12pm

वीरेन्द्रजी, बहुत-बहुत धन्यवाद.

.

Comment by Veerendra Jain on June 25, 2011 at 12:46pm
bahut hi khubsurat geet ..Saurabh sir..bahut bahut badhai aapko...

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 25, 2011 at 12:19am
विवेकजी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद.
खुले दिल से व्यक्त आपकी बेबाक प्रतिक्रिया ने मुझे बहुत-बहुत धनी और कई तरह से सबल बनाया है.
Comment by विवेक मिश्र on June 24, 2011 at 11:59pm

मैं शर्त लगा कर कह सकता हूँ कि इस कविता को दुबारा पढ़े बिना नहीं रहा जा सकता. "हामी भरती रात सिसकती" और "द्वेष-दमन की दुपहरिया" जैसी उपमाएँ रचना में चार-चाँद लगा रही हैं. तिस पर प्रवाह है कि पूरी कविता एक स्वर में निकलती है. हार्दिक बधाई सौरभ सर!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 24, 2011 at 11:09pm

भाई अरुण ’अभिनव’जी..

अपनी भावनाओं को अनुमोदित हुआ देख मन वस्तुतः कव्वाली-नात की मुरकियाँ ले रहा है. सहयोग की सदैव अपेक्षा रहेगी. हार्दिक धन्यवाद. 

Comment by Abhinav Arun on June 24, 2011 at 10:39pm

कहाँ बदलती दुनिया कोई

उठना, गिरना, फिर जुट जाना

स्वर-संगम से अपने श्रम के, मन कव्वाली-नात करें हम..

आओ साथी बात करें हम.......

वाह क्या तारीफ़ करें हम .. रचना ने सकारात्मक सोच की सरिता प्रवाहित कर दी .. सच्ची और सन्देश परक रचना हार्दिक बधाई सौरभ जी को !!

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