For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

आओ साथी बात करें हम

अहसासों की रंगोली से रिश्तों में जज़्बात भरें हम..

 

रिश्तों की क्यों हो परिभाषा

रिश्तों के उन्वान बने क्यों

हम मतवाला जीवनवाले

सम्बन्धों के नाम चुने क्यों

तुम हो, मैं हूँ, मिलजुल हम हैं, इतने से बारात करें हम..

आओ साथी बात करें हम.........

 

शोर भरी ख्वाहिश की बस्ती--

--की चीखों से क्या घबराना

कहाँ बदलती दुनिया कोई

उठना, गिरना, फिर जुट जाना

स्वर-संगम से अपने श्रम के, मन कव्वाली-नात करें हम..

आओ साथी बात करें हम.......

 

सूखी बाड़ी, कंटक, झाड़ी

निर्मम-निष्ठुर जीवन कितना

चाहत-मरुथल, सपन बगूले

प्यासी भटकन, हतप्रभ जीना

द्वेष-दमन की दुपहरिया को मिलजुल कर सुख-रात करें हम..

आओ साथी बात करें हम............

 

हामी भरती रात सिसकती

दिन का हासिल ’स्वर क्रंदन के’

उमस भरी है बगिया मन की

जटिल हुए उच्छ्वास पवन के

कठिन निशा है साथी मेरे, आओ मिलजुल प्रात करें हम..

आओ साथी बात करें हम...........

 

नहीं भरोसा, नहीं समर्पण

लोभ-लाभ ही का नाता है

नहीं दिखे जो स्नेह परस्पर

रिश्ता फिर क्या कहलाता है

तेरा मुझसे, मेरा सबसे, प्यार बढ़े, हालात करें हम..

आओ साथी बात करें हम.........

Views: 897

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 2, 2012 at 9:22pm

डा. प्राची, आपकी प्रतिक्रिया ने हमारा उत्साह दूना कर दिया है.  आपको मेरा रचना-कर्म रुचा, इस हेतु मैं आपके प्रति आभार व्यक्त कर रहा हूँ.

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 2, 2012 at 4:16pm
कविता का एक एक शब्द जैसे बिलकुल सधा हुआ है... आपकी रचनाओं को पढ़ कर ज्ञात हो रहा है काव्य कैसा होना चाहिए... कैसे हर शब्द भाव सान्द्र और कहन का उद्देश्य उच्च व जन मानस से जुड़ा होना चाहिए.
यकीन मानिए मेरे पास शब्द नहीं है आदरणीय सौरभ सर इस रचना की तारीफ़ के लिए. सादर.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 28, 2011 at 3:49pm

विश्वास के व्यवहार को इंगित करने के लिये धन्यवाद.

Comment by Aradhana on July 27, 2011 at 9:34am
बहुत सुंदर और छ्लकता हुआ सा विश्वास रिश्तों, समाज एवं संवेदनाओं पर.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 25, 2011 at 2:12pm

वीरेन्द्रजी, बहुत-बहुत धन्यवाद.

.

Comment by Veerendra Jain on June 25, 2011 at 12:46pm
bahut hi khubsurat geet ..Saurabh sir..bahut bahut badhai aapko...

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 25, 2011 at 12:19am
विवेकजी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद.
खुले दिल से व्यक्त आपकी बेबाक प्रतिक्रिया ने मुझे बहुत-बहुत धनी और कई तरह से सबल बनाया है.
Comment by विवेक मिश्र on June 24, 2011 at 11:59pm

मैं शर्त लगा कर कह सकता हूँ कि इस कविता को दुबारा पढ़े बिना नहीं रहा जा सकता. "हामी भरती रात सिसकती" और "द्वेष-दमन की दुपहरिया" जैसी उपमाएँ रचना में चार-चाँद लगा रही हैं. तिस पर प्रवाह है कि पूरी कविता एक स्वर में निकलती है. हार्दिक बधाई सौरभ सर!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 24, 2011 at 11:09pm

भाई अरुण ’अभिनव’जी..

अपनी भावनाओं को अनुमोदित हुआ देख मन वस्तुतः कव्वाली-नात की मुरकियाँ ले रहा है. सहयोग की सदैव अपेक्षा रहेगी. हार्दिक धन्यवाद. 

Comment by Abhinav Arun on June 24, 2011 at 10:39pm

कहाँ बदलती दुनिया कोई

उठना, गिरना, फिर जुट जाना

स्वर-संगम से अपने श्रम के, मन कव्वाली-नात करें हम..

आओ साथी बात करें हम.......

वाह क्या तारीफ़ करें हम .. रचना ने सकारात्मक सोच की सरिता प्रवाहित कर दी .. सच्ची और सन्देश परक रचना हार्दिक बधाई सौरभ जी को !!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Tuesday
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Tuesday
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Jul 11
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Jul 10
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Jul 9
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Jul 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service