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कुछ खरी-खरी

कुछ खरी-खरी 

(१)
घर के बीच खिंच रही दीवार 
बुजुर्गों के दिलों में पड़ी दरार  
कैसा दर्दनाक मंजर है किसे देखूं |
(२)
तेरे इस गूंगे घर से तो 
खंडहर  ही बेहतर हैं 
वहां कम से कम पत्थर तो बाते करते हैं |
(३)
तुम लाये हो इक बवंडर छिपा के अपने सीने में 
एक बार तो ये सोचा होता 
ताश के पत्तों से बना है मेरा…
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Added by rajesh kumari on April 27, 2012 at 12:00pm — 14 Comments

आज की नारी

मैं हूँ स्वछन्द ,नीर की बदरी, जहां चाहे बरस जाऊँगी …

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Added by rajesh kumari on April 26, 2012 at 9:00am — 13 Comments

प्रथ्वी दिवस हाइकु

पृथ्वी दिवस हाइकु 

(१ )
धन्य धरित्री 
बचाओ अभियान 
करो संकल्प  
(२ )
सुकृति धरा 
मात्र सम वन्दिता 
जल संचय
(३ )
पूज्य धरिणी
सुमणित प्रकृति 
वन्य रक्षण 
(४ )
सुढर भूमि 
ब्रह्माण्ड गौरव 
शीश नमन
(५ )
भू संरक्षण 
प्रदूषण मिटाओ 
धरा बचाओ 
(६…
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Added by rajesh kumari on April 22, 2012 at 2:30pm — 10 Comments

पिघलते हिमनद

सो रही है दुनिया सारी

तुम हर पल क्यूँ सजग रहे 

कौन व्यथा है दबी हिय में 

किस अगन में संत्रस्त रहे |

घूर रहे क्यूँ रक्तिम चक्षु 

कुपित अधर क्यूँ फड़क रहे 

दावानल से केश खुले क्यूँ 

तन से शोले भड़क रहे |

प्रदूषण ने ध्वस्त किये 

जो, बहु  तेरे संबल रहे 

कतरा -कतरा टूट-टूट कर 

चुपके -चुपके पिघल रहे…

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Added by rajesh kumari on April 12, 2012 at 6:30pm — 19 Comments

खौफनाक चेहरे

हर मजहब के दुःख -दर्द एक सामान होते हैं

फिर क्यूँ पराई पीर से हम अनजान होते हैं

क्यूँ फेंकते पत्थरों को हम उनके घरों पर

जब खुद के भी तो शीशों के मकान होते हैं

उन लोगों की कम सोच का क्या करियेगा

जिनकी वजह से रिश्ते कुछ बेजान होते हैं

बन जाते हैं वो सफ़र में मुसीबतों के सबब

कई दफह जब रास्ते बेहद सुनसान होते हैं

मत छूना कभी जो लावारिस पड़े हैं राह में

मुमकिन हैं छुपे मौत का वो सामान होते हैं

मिलके गले वो घोंप दे खंजर ये क्या पता…

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Added by rajesh kumari on April 5, 2012 at 11:30am — 16 Comments

एक मायावी शब्द

तीन वर्ण और 

एक मायावी शब्द ,

जिसके कर्णपटल में प्रवेश करते ही 
एक मासूम नन्हा बालक 
जो अपने जीवन का
पहला कदम रख रहा है, 
उत्साहित और रोमांचित हो उठता है 
कैसा अद्दभुत  रिश्ता है इस शब्द का 
मन मस्तिष्क की तंत्रिकाओं  से 
जिसके तिलस्मी प्रभाव से 
चार सीढियां चढ़ता हुआ 
इंसान आठ सीढियां चढ़ जाता है |
और एक दिन अम्बर छूने में 
कामयाब…
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Added by rajesh kumari on April 4, 2012 at 10:31am — 10 Comments

वो पीपल का पेड़

कुछ पल मेरी छावं में बैठो तो सुनाऊं

हाँ मैं ही वो अभागा पीपल का दरख्त हूँ

जिसकी संवेदनाएं मर चुकी हैं

दर्द का इतना गरल पी चुका हूँ

कि जड़ हो चुका हूँ !

अब किसी की व्यथा से

विह्वल नहीं होता

मेरी आँखों में अश्कों का

समुंदर सूख चुका है |

बहुत अश्रु बहाए उस वक़्त

जब कोई वीर सावरकर

मुझसे लिपट कर…

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Added by rajesh kumari on April 1, 2012 at 8:00am — 11 Comments

सच्चाई का दमन

 

कल फिर किसी चट्टान को फोड़ने की कोशिश होगी 
कल फिर किसी ईमान को निचोड़ने की कोशिश होगी 
सूरज तो दिन में हर रोज की तरह दमकेगा 
कल फिर  अँधेरे में सच को मरोड़ने की कोशिश होगी 
एक और बुलंद आव़ाज का शीशा चट्केगा 
कल फिर तिलस्मी वादों से जोड़ने की कोशिश होगी
फूट रहा क्रोध का लावा बनकर हर्दय में जो 
कल फिर उसी सैलाब को मोड़ने की कोशिश होगी 
फिर तमाश्बीन  की तरह बैठे रहेंगे…
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Added by rajesh kumari on March 28, 2012 at 7:55pm — 16 Comments

देश की सूरत

भावनाओं का दमन,  

संवेदनाओं का संकुचन देख रहे हैं 

आदान-प्रदान सब गौण  हुए  

अब ऐसा चलन देख रहे हैं |

स्वार्थ के बढ़ते  दाएरे, 

जन- जन  को छलते देख रहे हैं 

हिंद  का वैभव स्विस बेंकों में 

 हक को जलते देख रहे हैं |

भ्रष्टाचारी को जीवंत, 

संत ज्ञानी को मरते देख रहे हैं 

अगन उगलते सूरज में, 

नम धरा झुलसते देख रहे हैं | 

दूध की नदियाँ…

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Added by rajesh kumari on March 26, 2012 at 10:30am — 10 Comments

बड़े बेखबर

आज मन में क्यूँ उठी मेरे लहर 

चाँद जाने दे गया कैसी खबर 

चलो घर को अपने करीने से सजा लूँ 

किसको  साथ लाती है मेरी सहर 

बहकी बहकी सी फ़िजा लगती है 

कौन जाने है ये किसका असर 

वो तो समझो  है शाइस्तगी मेरी 

वर्ना हक़ से कहती अभी और ठहर 

आजकल दरवाजे उनके बंद रहते हैं 

चुपचाप ना जाने वो गए किधर 

रुसवाइयों से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता 

कसम से हैं वो बड़े बेखबर 

रास्ता शायद वो दरिया भूल गया 

मुड़ गया इस और जो…

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Added by rajesh kumari on March 21, 2012 at 2:09pm — 20 Comments

मोहब्बत की खातिर

वो टूटा फिर से सितारा मोहब्बत की खातिर 

देख लो तुम भी नजारा मोहब्बत की खातिर 

आ जाओ तसव्वुर में घडी दो घडी 

ये वक़्त न मिलेगा दुबारा मोहब्बत की खातिर 

लोग तो इश्क में जीवन ही लुटा देते हैं 

दे  दो  बाँहों का सहारा मोहब्बत की खातिर

छूट गई है मेरे हाथों से पतंग की डोर

थाम लो इसका किनारा मोहब्बत की खातिर

खुशियों की ये दौलत मुझसे छीन ना लेना

ग़ुरबत में जीवन है…

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Added by rajesh kumari on March 9, 2012 at 9:17am — 9 Comments

तुम्हारी प्रेरणा

उपलब्धियों के मंच पर 

जब भी  कोई तुमसे पूछता कि 
तुम्हारी सफलता के पीछे किसका हाथ है 
तुम हमेशा मुझको अपनी ताकत 
बताते रहे |और उसके बाद
करतल ध्वनी 
की गूंजती आवाज से 
मेरा वो प्रेम का एहसास 
और बुलंद और गर्वित होता चला गया|
याद आया है वो हमारे मिलन का पहला दिन 
जब तुमने मेरे हाथ को थामते हुए कहा था 
कि मेरे अस्तित्व को आज पंख 
मिल गए |
और…
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Added by rajesh kumari on February 29, 2012 at 1:52pm — 14 Comments

(लघु कथा) अपना आशियाना

लघु कथा 

अरे भाई हँसमुख जी, आज क्यूँ उदास हो, क्या हुआ ? क्या बताऊँ मैं आज बहुत परेशां हूँ, आप ही बताओ आप को कैसा लगेगा यह जान कर कि आप जिस घर में पिछले दस साल से अकेले रहते हो, उसमे आप के अलावा कोई और भी अचानक आकर रहने लगे !! कल रात कुछ लोग अचानक मेरे घर में मेरे ही सामने मेरे घर में डेरा डाल कर बैठ गए और अपना आधिपत्य जताने लगे और मैं कुछ न कर सका | जी में तो आया कि एक एक को उठाकर फेंक दूं पर क्या करे हमारी भी कुछ अपनी…

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Added by rajesh kumari on February 25, 2012 at 10:00am — 14 Comments

मुझको दुनिया में आने दो I मुझको दुनिया में आने दो I

यह कविता उन व्यक्तियों ,महिलाओं के सन्दर्भ में है जो कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपराध में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भागीदार हैं इसके खिलाफ लड़ाई में मेरा यह छोटा सा प्रयास है !मेरी यह कविता QAWWA(मिनिस्ट्री ऑफ़ डिफेन्स )

की बुक में पब्लिश होकर राष्ट्रपति महोदया के निर्देशानुसार स्वास्थ्य,परिवार कल्याण मंत्रालय की किताब हमारा घर में पब्लिश हुई|आज आप सब के सम्मुख रख रही हूँ कृपया प्रतिक्रिया…
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Added by rajesh kumari on February 23, 2012 at 8:36pm — 11 Comments

कब तक जलो

फर्ज के अलाव में कब तक जलो 

परछाई भी कहने लगी इधर चलो 
चन्दन से लिपट खुद को समझ बैठे चन्दन, 
भ्रम जाल में खुद को कब तक छलो|
हम तो पानी पे तैरती लकड़ी हैं दोस्तों  
सागर भी कहता है अब यूँ ही गलो|
हंस- हंस के गले मिलते हैं जड़े काटने वाले, 
फिर चलते हुए कहते हैं फूलों फलो |
ख़त्म हो चुका है कब से तेल बाती का
पर उनका  यही कहना है रात भर बलो|
 फर्ज के अलाव…
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Added by rajesh kumari on February 23, 2012 at 9:05am — 11 Comments

प्रेम दिवस

प्रेम दिवस 

ख़त्म हो दिलो की कड़वाहट 
हर शख्स के चेहरे पे…
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Added by rajesh kumari on February 14, 2012 at 10:00am — 3 Comments

इन्तजार में

बिखरे  हुए हैं गेसू इस इन्तजार में 

आये कोई झोंका  हवा का 
और संवार दे !
ढलका हुआ है आँचल 
नर्म  जमीं के बदन पर   
कि चांदनी भी 
तारों की लड़ियाँ निसार दे !
वो बैठे हैं गिराकर 
पलकों की झालरें 
चल के आये जवां ख़्वाब कोई 
और पहलू में जिंदगी गुजार दे !
ऐ काली घटाओ !
तिल सा…
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Added by rajesh kumari on February 5, 2012 at 10:00am — 10 Comments

तुम्हारी आदत

अभी तक गई नहीं तुम्हारी  आदत 

हर जगह मेरा नाम लिखने की !
वो भी दिन थे 
जब तुम रंग बिरंगी चॉक से 
लिख देते थे मेरा नाम श्यामपट्ट पर 
और उपहास के पात्र बनते थे हमदोनो!
कभी मेरे घर के इर्द गिर्द घूमते हुए 
दीवारों पर 
कभीचुपके से फेंके हुए मेरे आँगन में 
अपने ख़त में ,
 लिख देते थे खून से मेरा नाम !
फिर तुमने उस…
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Added by rajesh kumari on February 2, 2012 at 11:39am — 11 Comments

गरीब की किस्मत

चुन चुन कर जमा किये थे 

झोली में तेरे प्यार के सुमन 
एक -एक कर बाहर निकल गए  
आँचल के फटे दरवाजे से 
हाय गरीब की किस्मत !!…
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Added by rajesh kumari on January 31, 2012 at 11:00am — 2 Comments

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