तुम हर पल क्यूँ सजग रहे
कौन व्यथा है दबी हिय में
किस अगन में संत्रस्त रहे |
घूर रहे क्यूँ रक्तिम चक्षु
कुपित अधर क्यूँ फड़क रहे
दावानल से केश खुले क्यूँ
तन से शोले भड़क रहे |
प्रदूषण ने ध्वस्त किये
जो, बहु तेरे संबल रहे
कतरा -कतरा टूट-टूट कर
चुपके -चुपके पिघल रहे |
हे हिमगिरी,हे हिमनद
पिघलते रहे जो
यूँ ही अप्रतिहत
प्रलय भयावही आएगी
जगत जननी, पावन धरिणी
सब जल थल हो जायेगी |
कष्ट निवारक ,विपदा हारक
हे जगदीश ,हे त्रिपुरारी
उसे जगा दो अपने बल से
सो रही जो दुनिया सारी|
*****
Comment

प्रदीप कुमार कुशवाह जी सराहना हेतु हार्दिक बधाई
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 14, 2012 at 10:54pm कष्ट निवारक ,विपदा हारक
हे जगदीश ,हे त्रिपुरारी
उसे जगा दो अपने बल से
सो रही जो दुनिया सारी|
jagrat karne vala kavy aur sudar prarthna. badhai

बहुत बहुत आभार सौरभ जी

शलेन्द्र म्रदु जी हर्दय से आभारी हूँ इस सराहना के लिए

हर्दय से आभारी हूँ सीमा जी इस सराहना के लिए |

बहुत बहुत हार्दिक आभार सरिता जी

उद्येश्यपरक रचना.. .
शुभेच्छा
Comment by CA. SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 13, 2012 at 9:05pm मैम एक विशिष्ट कृति के लिए बधाई स्वीकार करें
Comment by Sarita Sinha on April 13, 2012 at 6:31pm आदरणीय राजेश कुमारी जी, सादर नमस्कार,

जी हाँ महिमा जी यह बहुत गंभीर समस्या है जिस पर विचार करना तथा उस समस्या का निदान करना बहुत जरूरी है आपने इस तथ्य को दिल से महसूस किया हार्दिक आभार आपका
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