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सो रही है दुनिया सारी

तुम हर पल क्यूँ सजग रहे 

कौन व्यथा है दबी हिय में 

किस अगन में संत्रस्त रहे |

घूर रहे क्यूँ रक्तिम चक्षु 

कुपित अधर क्यूँ फड़क रहे 

दावानल से केश खुले क्यूँ 

तन से शोले भड़क रहे |

प्रदूषण ने ध्वस्त किये 

जो, बहु  तेरे संबल रहे 

कतरा -कतरा टूट-टूट कर 

चुपके -चुपके पिघल रहे |

हे हिमगिरी,हे हिमनद   

पिघलते रहे जो 

यूँ ही अप्रतिहत      

प्रलय  भयावही आएगी  

जगत  जननी, पावन  धरिणी 

सब  जल  थल  हो  जायेगी |  

कष्ट निवारक ,विपदा हारक

हे  जगदीश ,हे  त्रिपुरारी 

उसे  जगा दो अपने बल से 

सो रही जो दुनिया सारी|

           *****

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 15, 2012 at 9:59am

प्रदीप कुमार कुशवाह जी सराहना हेतु   हार्दिक बधाई

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 14, 2012 at 10:54pm

कष्ट निवारक ,विपदा हारक

हे  जगदीश ,हे  त्रिपुरारी 

उसे  जगा दो अपने बल से 

सो रही जो दुनिया सारी|

jagrat karne vala kavy aur sudar prarthna. badhai


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 14, 2012 at 7:43am

बहुत बहुत आभार सौरभ जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 14, 2012 at 7:43am

शलेन्द्र म्रदु जी हर्दय  से आभारी हूँ इस सराहना के लिए 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 14, 2012 at 7:41am

हर्दय से आभारी हूँ सीमा जी इस सराहना के लिए |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 14, 2012 at 7:40am

बहुत बहुत हार्दिक आभार सरिता जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 14, 2012 at 3:04am

उद्येश्यपरक रचना.. .  

शुभेच्छा

Comment by CA. SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 13, 2012 at 9:05pm

मैम एक विशिष्ट कृति के लिए बधाई स्वीकार करें 

Comment by Sarita Sinha on April 13, 2012 at 6:31pm

आदरणीय राजेश कुमारी जी, सादर नमस्कार,

ग्लोबल वार्मिंग जैसी गंभीर समस्या का  बहुत मार्मिक और चिंतनीय प्रस्तुतीकरण....साधुवाद,,,,

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 13, 2012 at 2:43pm

जी हाँ महिमा जी यह बहुत गंभीर समस्या है जिस पर विचार करना तथा उस समस्या का निदान करना बहुत जरूरी है आपने इस तथ्य को दिल से महसूस किया हार्दिक आभार आपका 

कृपया ध्यान दे...

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