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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – December 2018 Archive (5)

नव वर्ष के दोहे

संस्कार  की  नींव दे, उन्नति  का  प्रासाद

हर मन बंदिश में रहे, हर मन हो आजाद।१।



महल झोपड़ी सब जगह, भरा रहे भंडार

जिस दर भी जायें मिले, भूखे को आहार।२।



लगे न बीते साल सा, तन मन कोई घाव

राजनीति ना भर सके, जन में नया दुराव।३।



धन की बरकत ले धनी, निर्धन हो धनवान

शक्तिहीन अन्याय हो, न्याय बने बलवान।४।



घर आँगन सबके खिलें, प्रीत प्यार के फूल

और जले नव वर्ष मेें, हर नफरत का शूल।५।



निर्धन को नव वर्ष की, बस इतनी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 31, 2018 at 5:54pm — 8 Comments

एक ही  सपना  हमारा  जी  हजूरी की जगह - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२

अब किसी के मुख न उभरे कातिलों के डर दिखें

इस वतन में हर तरफ खुशहाल सब के घर दिखें।१ ।



काम हासिल हो सभी को जैसा रखते वो हुनर

फैलते सम्मुख किसी के अब न यारो कर दिखें।२।



भाईचारा जब हो कहते हम सभी के बीच तो

आस्तीनों में छिपाये  लोग  क्यों खन्जर दिखें।३।



हौसला कायम रहे  यूँ सच बयानी का सदा

आईनों के सामने आते न अब पत्थर दिखें।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 26, 2018 at 10:51am — 3 Comments

तिजारत वो  चुनावों  में  हमेशा  वोट  की करते - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' ( गजल)

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२

हुआ कुर्सी का अब तक भी नहीं दीदार जाने क्यों

वो सोचें  बीच  में  जनता  बनी  दीवार  जाने क्यों।१।



बड़ा ही भक्त है या  फिर  जरूरत वोट पाने की

लिया करता है मंदिर नाम वो सौ बार जाने क्यों ।२।



तिजारत वो  चुनावों  में  हमेशा  वोट  की करते

हकों की बात भी लगती उन्हें व्यापार जाने क्यों ।३।



नतीजा एक भी अच्छा नहीं जनता के हक में जब

यहाँ सन्सद…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 21, 2018 at 3:35pm — 12 Comments

घुटन के इन दयारों में तनिक परिहास बढ़ जाये - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

छलकते देख कर आँसू ग़मों की प्यास बढ़ जाये

कभी ऐसा भी मौसम हो चुभन की आस बढ़ जाये।१।



लगे ठोकर किसी को भी न चाहे घाव खुद को हो

मगर देखें तो दिल में दर्द का अहसास बढ़ जाये।२।



भला कब चाहते  हैं  ये  जिन्हें  हम  शूल कहते हैं

मिटे पतझड़ चमन का साथ ही मधुमास बढ़ जाये।३।



लगाई नफरतों  ने  है  यहाँ  हर सिम्त ही बंदिश

घुटन के इन दयारों में तनिक परिहास बढ़ जाये।४।



रखो ये ज्ञान भी यारो जो चाहत घुड़सवारी की

नहीं घोड़ा सँभलता है अगर जो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 12, 2018 at 12:36pm — 6 Comments

ओढ़े बुढ़ापा  जी  रहा  बचपन कोई न हो - ( गजल)- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१ २१२१/२२२/१२१२



घर में किसी के और अब अनबन कोई न हो

सूना  पड़ा  हमेशा   ही  आगन  कोई   न  हो।१।



कुछ  तो  सहारा  दो  उसे  हँसने  जरा लगे

होकर निराश  घुट  रहा  जीवन  कोई न हो।२।



झुकना पड़े तनिक तो खुद झुकना सदा ही तुम

यारो  मिलन  की  राह  में  उलझन  कोई न हो।३।



आओ बनायें आज फिर ऐसा समाज हम

ओढ़े बुढ़ापा  जी  रहा  बचपन कोई न हो।४।



जल जाएँ…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 4, 2018 at 12:22pm — 14 Comments

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