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Manan Kumar singh's Blog – January 2016 Archive (5)

गजल(मनन)

2122 2122 2122 212

दोष उनको दे रहे क्यूँ आप कुछ तो बोलिये

मौन यह कबतक चलेगाआज मुँह तो खोलिये।1



सिर रहे धुन क्या मिला आगे मिलेगा और क्या

याद करनाआप क्यूँ ऐसे किसीके हो लिये।2

पर्व था जनतंत्र का चलते जरा आगे कहीं

मिल गये नाले समझ नद आपने मुँह धो लिये।3

हाथ में डोरी पड़ी थी हाँकते रथ और भी

घिर गयी क्षणभर घटा ढीले पड़े फिर सो लिये।4

आपके वरदान से राजा बने कितने सभी

मिल गया थोड़ा कहीं फिर तो बहुत कुछ खो…

Continue

Added by Manan Kumar singh on January 31, 2016 at 8:30am — 14 Comments

गजल

2212 2212 2212 12

बदले भले मौसम कभी मत आप दहलिये

सुलगे हमीं कितना कहें चुपचाप रह लिये।1



बदली हुई रुत देखते जाती रही खुदी

होगी नजर फिर आपकी सोचा उछह लिये।2



सूनी पड़ी है देखिये अपनी जहाँ अभी

आकर यहाँ चुपचाप ही निः शंक टहलिये।3



आधी अधूरी आज तक दिल की लगी रही

अबतक सहे हम हैं बहुत बस आज कह लिये।4



अब तो खिले कुछ फूल हैं फिर आपकी नजर

मसले गये हर बार सहते खार रह लिये।5



इतरा रहे कितना अभी गेंदा गुलाब हैं

छितरा रहे… Continue

Added by Manan Kumar singh on January 25, 2016 at 8:18am — 6 Comments

गजल

2212 2212 2212

कटते सिपाही ठग रही अब भीत है

बस मर्सिया पढ़ना यहाँ की रीत है।1



शर्मोहया ढूँढ़ें कहाँ,तू कह रहा-

कटते सिपाही खोखले! तू रीत है।2



बगुला बना तू रे चकाचक हो गया

गाता रहा तबसे पुराना गीत है।3



तू मछलियाँ लपका किया बस बेधड़क

जीता किसीने कह रहा निज जीत है।4



बँट ता रहा घर -बार है तेरी दुआ

रे दुखहरण! तुझसे समां भयभीत है।5



हर बार काँटा है चुभा परसे दही

रे छा रही संकट-घटा विस्फीत है।6



है फेंकता… Continue

Added by Manan Kumar singh on January 10, 2016 at 1:21pm — 2 Comments

गजल(मनन)

#गजल#

2212 2212 2212

कटते सिपाही ढ़ह रही कब भीत है?

बस फातिहा पढ़ना यहाँ की रीत है।1



शर्मोहया रख ताक पर ,तूने कहा-

कटते सिपाही,बात तेरी नीत है।2



बगुला बना चलता चकाचक तू हुआ

गाता रहा रे बस पुराना गीत है।3



तू मछलियाँ लपका किया बस बेधड़क

जीता किसीने कह रहा निज जीत है।4



बँटता रहा घर -बार है तेरी दुआ

रे दुखहरण! तुझसे समां भयभीत है।5



हमने जहाँ परसे दही काँटा चुभा,

रे भाल तेरा हो गया अब पीत है।6



है… Continue

Added by Manan Kumar singh on January 5, 2016 at 10:30pm — 18 Comments

गजल

2122 2122 2122 212

कामना आ ओ करें ऐसी जहाँ में रीत हो!

भूल जायें भेद सब नव वर्ष में बस प्रीत हो!!

पुष्प मुकुलित हों प्रिये आये मधुप लेकर नवल

रसभरी मधु-मालती को सिक्त करता गीत हो।

ज्योत्सना ऐसी खिलेअब रे खिले जन-मन मृदुल

हों सभी उन्मुक्त मन फिरअब नहीं कुछ भीत हो।

पी अमर रस पीक जब टेरे खड़ा फिर रे पिकी

छेड़ती हो धुन अमर गुंजित जहाँ हो जीत हो।

हों नियति के सब सभासद रुख लिए अनुकूल ही

हो निशा का अंत फूटे रोशनी नव नीत हो।

चंप-लतिका फेरती हो शीश…

Continue

Added by Manan Kumar singh on January 1, 2016 at 8:30am — 6 Comments

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