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March 2015 Blog Posts

ये भटकते हुये रास्ते

मैं हिला तक नहीं हूँ 

उस जगह से 

जहाँ तुमने छोडा था कभी 

तुम लौट आये हो

कौनसा रास्ता आया है 

लौटकर मुझ तक

खैर ! तुम्हारा कोई दोष नहीं है  

तुम्हारे लौट आने में 

ये रास्ते ही ऐसे हैं 

घूम फिर कर 

फिर आ पहुँचते हैं वहीं 

जहाँ से चले थे कभी 

राह से भटके हुये 

ये भटकते हुये रास्ते

तुम लौट ही आये हो 

तो कुछ देर आराम करलो

निकल जाना सुबह होते होते 

फिर किसी भटकते हुये रास्ते के साथ

रोज कई रास्ते निकलते…

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Added by umesh katara on March 1, 2015 at 5:00pm — 23 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल

1212 1122 1212 112/22



दबी हर आह तेरा इश्क़ भी दबा ही सही

जुदा है तेरा ये अंदाज़ तो जुदा ही सही



मेरी ग़ज़ल में उतर आती है वो आहिस्ता

मेरा हयात से बस इतना वास्ता ही सही



ग़ज़ल में डूब के खुद को भुला दिया हमने

चलो कुछ और नहीं तो यही नशा ही सही



खयाल तेरी तमन्ना का है मेरे दिल में

सो रहनुमाई को अब तेरा मशविरा ही सही



हर एक शय में मुहब्बत के किस्से बिखरे हैं

महल नहीं न सही एक मक़बरा ही सही



मेरा खयाले मसर्रत में… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on March 1, 2015 at 4:52pm — 22 Comments

मुझसे नकाब क्यों ? : हरि प्रकाश दुबे

दिल में रहने वाले मुझसे नकाब क्यों ?

इतना मुझे बता दे मुझसे हिज़ाब क्यों?

 

साकीं यह सुना तू है मदिरा का सागर

लाखों को तूने तारा मुझको जवाब क्यों?

 

मेरे गुनाह लाखों होंगे ये मैंने है माना

गैरों से कुछ न पूछा मुझसे हिसाब क्यों?

 

तूने जिसको अपनाया उसको खुदा बनाया

उनका नसीब है अच्छा मेरा खराब क्यों?

 

छोटी सी ये हस्ती में है कुल कमाल तेरा

बेहद का है तू दरीया फिर मैं हुबाब क्यों?

 

© हरि…

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Added by Hari Prakash Dubey on March 1, 2015 at 2:34pm — 30 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आम गज़ल - अरुण निगम

आम  हूँ  बौरा रहा हूँ

पीर में  मुस्का रहा हूँ

मैं नहीं दिखता बजट में

हर  गज़ट पलटा रहा हूँ  

फल रसीले बाँट कर बस

चोट को सहला रहा हूँ

गुठलियाँ किसने गिनी हैं

रस मधुर बरसा रहा हूँ

होम में जल कर, सभी की

कामना पहुँचा रहा हूँ

द्वार पर तोरण बना मैं

घर में खुशियाँ ला रहा हूँ

कौन पानी सींचता…

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Added by अरुण कुमार निगम on March 1, 2015 at 2:00pm — 14 Comments

एक तरही ग़ज़ल....-महिमा श्री

बहर- 

2122 1212  22

खुशनुमा ये सफ़र है क्या कहिये

साथ मेरे वो गर है क्या कहिये

 

आ गई जान पर है क्या कहिये

चाक मेरा जिगर है क्या कहिये

इश्क में जीत कुछ नहीं होती…

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Added by MAHIMA SHREE on March 1, 2015 at 11:30am — 29 Comments

बहिष्कार (कहानी )

बहिष्कार

“क्यों री आंनद की अम्मा ?अपनी देवरानी को शादी में नहीं बुलाईं क्या ?”निमन्त्रण पत्र पकड़ते हुए भोली की अम्मा यानि मायादेवी ने पूछा

“आपकी भी तो जेठानी लगती हैं |आपहि कौन उन्हें रामायण में बुलाई रहीं !” बिंदियादेवी ने मुँह बनाते हुए कहा

“हमार कौन सगी है,ऊपर से काम ही ऐसा करी हैं कि उन्हें बिरादरी से बहिरिया देना चाहिए |अपनी लड़की ही काबू में नहीं |पता नहीं कहाँ से मुँह काला कर आई |”

“हाँ दीदी ,सुना है चौका बाज़ार में बदरी बनिया के बेटे का काम था |जात-बिरादरी…

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Added by somesh kumar on March 1, 2015 at 11:14am — 10 Comments

हालात आदमी के - डॉo विजय शंकर

कितना होशियार है आदमी ,

हर समय सचेत रहता है ,

बुद्धि को प्रखर करता रहता है,

हर एक के दिमाग को पढ़ता रहता है ,

बस, जब लुटता है तो दिमाग से नहीं,

दिल से लुटता है,पूरे दिल से लुटता है ......



दिमाग उस समय भी

उसका चौकन्ना रहता है,

खूब याद रखता है, कि कब कहाँ ,

कैसे-कैसे , कितना-कितना लुटे ,

स्मृति में सब रहता है ,

बार बार , दोहराता रहता है,

सुनाता है अपने लुटने की कहानी,

दूसरों की भी सुनता है कहानी………



और फिर तैयार होता… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on March 1, 2015 at 11:00am — 21 Comments

ग़ज़ल -- सब कुछ न आज आदमी किस्मत पे छोड़ तू

सब कुछ न आज आदमी किस्मत पे छोड़ तू

दरिया की तेज धार को हिम्मत से मोड़ तू



इस जिन्दगी की राह में दुश्वारियाँ बहुत

रहबर का हाथ छोड़ न रिश्तों को तोड़ तू



मेहनत के दम पे आदमी क्या कुछ नहीं करे

अपने लहू का आखिरी कतरा निचोड़ तू



जो कुछ है तेरे पास वही काम आएगा

बारिश की आस में कभी मटकी न फोड़ तू



मन की खुशी मिलेगी, तू यह नेक काम कर

टूटे हुए दिलों को किसी तर्ह जोड़ तू



दो गज कफन ही अंत में सबका नसीब है

अब छोड़ भी 'दिनेश'…

Continue

Added by दिनेश कुमार on March 1, 2015 at 1:00am — 12 Comments

गीतिका ---शायर

२११--२११/२११--२११/२११ २

मंचों को तज गाँवों में जा अब शायर

धन को मत भज गुर्बत को गा अब शायर

 

दूर गगन पर तूने सपने जा टाँगे   

इस धरती पर ज़न्नत को ला अब शायर

 

जाम बुझायेगें क्या तिसना इस  मन की

गम को पिघला छलका गंगा अब शायर

 

आहों से भी ज्यादा ठंडी हैं रातें

फुटपाथों पर नंगे तन आ अब शायर

 

चाँद सितारों से मत बहला दुनिया को  

इस माटी का कण कण चमका अब शायर

 

अच्छाई को ढाल बुराई की मत…

Continue

Added by khursheed khairadi on March 1, 2015 at 12:30am — 10 Comments

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