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पहाड़ और स्नो व्हाइट

(बर्फ सी उजली व नीली ऑखों वाली नील मैम को   यह कहानी नज़र करता हूं। जो तन व मन से खूबसूरत तो हैं ही, और जिनकी खूबसूरत उंगलियां  पत्थरों मे भी जान ड़ाल देती हैं। जिन्हें आज भी कामशेत पूणे की वादियों में देखा जा सकता है। उन्ही की जिंदगी से यह कहानी चुरायी है।’)

             

आज भी - दिवाकर अपने सातों  रंग समेट मेज पे पसरा है । पहाड़ खिला है । हरे, भूरे, मटमैले रंगो मे अपनी पूरी भव्यता के साथ । रोज सा। मानो सातो रंग छिटक दिये गये हों एक एक कर। इंद्र धनुष…

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Added by MUKESH SRIVASTAVA on May 4, 2014 at 1:30pm — 6 Comments

निकाल दूँ कैसे तुझे अपने खयाल से

1212 2212   22  1212

भले नहीं रिश्ता तेरा अब मेरे हाल से

निकाल दूँ कैसे तुझे अपने खयाल से

फकीर जैसा हो गया हूँ तेरे इश्क में

बचा नहीं अब तक कोई भी हुस्न जाल से

कोई नहीं क्या हद कोई इस इन्तजार की

गुजर रहे है दिन महीने जैसे साल से

रकीब की महफिल को जब तूने सजा दिया

तो हो गया सबको अचम्भा इस कमाल से

कहाँ कहाँ ढूँढू तुझे दुनिया की भीड में

जहाँ परेशाँ हैँ यहाँ अब तो सवाल से

उमेश…

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Added by umesh katara on May 4, 2014 at 12:40pm — 10 Comments

दूर गगन के टिम-टिम तारें

दूर गगन के टिम-टिम तारें,

लुक छिप कर सब करें इशारे।

धरती पर क्षण भंगुर जीवन,

जैसे निश में जुगुनू हारे।।

स्वार्थी मानव लोभ सताए,

दम्भ ज्ञान से मन बहलाए।

अहं द्वेष माया के बन्धन,

जैसे मृग कश्तूरी धारे।।1



देश-गॉंव की बातें करके,

जाति-धर्म को आड़े करके।

स्वार्थ फलित विष तन में बोते,

जैसे राजनीति भिनसारे।।2



भव सागर में कश्ती सारी,

तूफां संग बवन्डर भारी।

उमड़-घुमड़ कर सॉंझ सबेरे,

जैसे वर्षा-सूखा…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 4, 2014 at 10:53am — 7 Comments

नवगीत...आजाद शुका खूंखार हुआ

नवगीत...आजाद शुका खूंखार हुआ

छत्तीस गढ़ के दो राहे पर,

तेरा मेरा साथ हुआ।

एक मात्र माशा रत्ती का

जमकर सोलह श्रृंगार हुआ।।

एक-एक मिलकर जो ग्यारह,

वह दो नम्बर व्यवहार करे।

तीन तिकड़मी सी मॅंहगाई,

जीवन भर आघात करे।

तीन-पॉंच मन राजनीति का,

आजाद शुका खूंखार हुआ।।1

चार वेद-ॠतु-वर्ण व्यवस्था,

चारों खाने चित्त हुए जब।

पंच तत्व कण के परमेश्वर-

छिन्न--िभन्न रिश्ते करते अब।

छवों शस्त्र के सात रंग-रस,

स्वर…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 3, 2014 at 9:40pm — 7 Comments

गौरैया

गौरैया

माँ ! आँगन में अपने

अब क्यों नहीं आती गौरैया

शाम सवेरे चीं चीं करती

अब क्यों नहीं गाती गौरैया

फुदक- फुदक कर चुग्गा चुगती

पास जाओ तो उड़ जाती

कभी खिड़की, कभी मुंडेर पर

अब क्यों नहीं दिखती गौरैया

माँ बतला दो मुझ को

कहाँ खोगई  गौरैया ?

विकास के इस दौर में,बेटा !

मानव ने देखा स्वार्थ सुनेरा

काटे पेड़ और जंगल सारे

 और छीना पंछी का रैन बसेरा

रुठ गई हम से अब हरियाली

पत्थर का…

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Added by Maheshwari Kaneri on May 3, 2014 at 7:39pm — 10 Comments

आल्हा छंद - मसाला क्रिकेट(आईपीएल) अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

क्रिकेट की मंडी भारत है, जहाँ हर क्रिकेटर बिक जाय।  

लग जाती है जिसकी बोली, खुश होकर “याहू” चिल्लाय।।

 

पशु जैसे नीलाम हो गये, धन के आगे सब मजबूर।  

क्रेता इन सब का मालिक है, और सभी बँधुवा मजदूर॥  

अच्छा है मौजूद नहीं थे, जहाँ हुए थे सब नीलाम। 

ठोक बजाकर देखे जाते, नस्ल कौन सी, क्या है दाम।।

 

इज्ज़त से बढ़कर पैसा है, जो देता ऐश्वर्य तमाम।

खुश दिखते हैं बिकने वाले, नहीं बिके तो, नींद हराम॥      

खेल अज़ब है…

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Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on May 3, 2014 at 7:30pm — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
'' ईश्वर होना चाहता भी हूँ या नहीं " ( अतुकांत ) गिरिराज भंडारी

ईश्वर होना चाहता भी हूँ या नहीं

******************************

आज पूजा जा रहा हूँ ।

दूर दूर से आ कर

नत मस्तक हो हज़ारों हज़ारों भक्त

दुआयें मांगते हैं , चढ़ावे चढ़ाते हैं ,

अपनी अपनी मुरादों के लिये ।

उनकी अटूट ,गहरी आस्थाओं ने, विश्वासों ने  

सच में ज़िन्दा कर दिया है

मेरे अंदर , ईश्वरत्व ,

वो ईश्वरत्व

जो सारे ब्रम्हांड के कण कण में है ।

पूरी हो रहीं है मुरादें भी,

पर ,

कैसे कहूँ मै शुक्रिया उन…

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Added by गिरिराज भंडारी on May 3, 2014 at 6:43pm — 19 Comments

स्त्री की दुनिया

स्त्री की ये दुनिया

बहुत सिमटी हुई

बहुत कोमल

ठीक जैसे आईना

जरा सी खरोंच काफी

उसके स्वरूप को

निमिष भर में वीभत्स करने

और

वो खरोंच धीरे-धीरे बढ़ी

तो

आईना चटक जाए

ये अनुभूत सत्य है ,

उस चटक को कई बार

महसूस किया

आईने के सौ -सौ टुकडो को

अश्रू युक्त सिसकियां सुनाते

उम्मीदों के नीड़ को

थरथरा धूलि धूसरित देख

रोम-रोम काँप उठा था

इसीलिए कहती हूँ

लौट जाओ आवारा बादल

किसी के आशियाने…

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Added by Deepika Dwivedi on May 3, 2014 at 6:07pm — 9 Comments

रहना हमे सचेत ....(रोला)

मेरे अजीज दोस्त, अमर मै अकबर है तू ।

मै तो तेरे साथ, साथ तो हरपल है तू ।।

रहना हमे सचेत, लोग कुछ हमें न भाये ।

हिन्दू मुस्लिम राग, छेड़ हम को भरमाये ।।



मेरे घर के खीर, सिवइयां तेरे घर के ।

खाते हैं हम साथ, बैठकर तो जी भर के ।।

इस भोजन का स्वाद, लोग वो जान न पाये ।

बैर बीज जो रोप, पेड़ दुश्मनी का लगाये ।। रहना हमे सचेत ....



यह तो भारत देश, लगे उपवन फूलों का ।

माली न बने चोर, कष्ट दे जो शूलों का ।।

रखना हमको ध्यान, बांट वो हमें न…

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Added by रमेश कुमार चौहान on May 3, 2014 at 6:00pm — 6 Comments

मन की उपलब्धियों की ढेरी

बेकार अख़बारों की ढेरी जैसा

खाली दूध की थैली व बोतल -सा

मन की उपलब्धियों का -

माल बिक सकता है ?

कोई कबाड़ी वाला आएगा।

ये सब ले जाएगा,

पूरा-का-पूरा कबाड़ उठ जाएगा

सच्ची सजावट सुथरी हो कर निखरेगी

हर चीज यथावत रखी हुई चमकेगी ।

मन की उपलब्धियों की इस ढेरी में

टूटे-फूटे शीशों और कनस्तर जैसा-

मुरझाया हुआ विश्वास,

फटे-पुराने जूतों सा-

बदरंग स्वाभिमान ,

टूटी -फूटी काँच की बोतल…

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Added by kalpna mishra bajpai on May 3, 2014 at 4:00pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
यूँ ही सोचा ज़माने की रविश भी जान ली जाये - ग़ज़ल

1222/ 1222/ 1222/ 1222

यूँ ही सोचा ज़माने की रविश भी जान ली जाये

पसे तस्वीर सूरत किसकी है पहचान ली जाये               पसे तस्वीर= तस्वीर के पीछे

 

ज़रा देखूँ कि सच कितना है तेरे इन दिखावो में

चलो कुछ देर को तेरी कही भी मान ली जाये         

 

कभी तो आप अपने तज़्रिबे से तौलें सच्चाई

ज़रूरी तो नहीं है हाथ में मीज़ान ली जाये                    मीज़ान =तराजू

 

नहीं लगती मुझे अनुकूल मौसम की तबीयत क्यूँ

बरस जायें न…

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Added by शिज्जु "शकूर" on May 3, 2014 at 12:30pm — 23 Comments

विश्वासों की बढती डोर- लक्ष्मण लडीवाला

जयकारी/चोपई छंद (१५ मात्राओं के इस छंद में चरणान्त गुरु लघु से)

राष्ट्र सृजन में जिनका योग, उनको कहे पुरोधा लोग

जनता का मिलता सहयोग, खुशहाली का होता योग |

कानूनन जन हित का भान, सफल प्रशासक उसको मान

योग्य प्रशासक का सम्मान, तभी देश का हो उत्थान ||

 

जड़ चेतन का जिसको भान, उसमे ही आध्यात्मिक ज्ञान

परम पिता ने डाले प्राण, इसके मिलते बहुत प्रमाण |

जिसमे हो सेवा का भाव, मन में वह रखता सद्भाव

जिसमे भी जिज्ञासा जान, गुरुवर का वह…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 3, 2014 at 10:00am — 12 Comments

तान्या : तुम्हे पा कर

तुम आये

मै खुश था

बहुत खुश /

मुझे घेर लेते थे

या कहो

कोशिश करते थे

घेर लेने की /

कुछ अहसास

उल्लास ,दर्प , ईर्ष्या ,द्धेष

सम्मान / कुछ मखमली से

कुछ अनजाने से भी

और मैं उड़ता था / परी कथाओं के

नायक की तरह

पंखों वाले सफ़ेद घोड़े पर

खुशगवार मौसम में

चमकीली धूप में

नीले आसमान में /

सर-सर चलती हवाएं से आगे

और आगे ।

और फिर

जैसा कि सुनता आया था सबसे/

कि ऐसा ही होता है /…

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Added by ARVIND BHATNAGAR on May 3, 2014 at 8:00am — 11 Comments

ऋतु गर्मी की आई

ऋतु गर्मी की आई

छन्न पकैया छन्न पकैया, ऋतु गर्मी की आई|

आँधी धूल उडाते चलती, बहे गर्म लू भाई|१|

छन्न पकैया छन्न पकैया, नीम सिरिष हैं फूले |

हवा सुगंध बिखेरे उनकी, खुशबू से मन झूले|२|…

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Added by Satyanarayan Singh on May 2, 2014 at 9:30pm — 24 Comments

गैर जरूरी चीजें

तमाम गैर जरूरी चीजें 

गुम हो जाती हैं घर से चुपचाप 

हमारी बेखबर नज़रों से 

जैसे मम्मी का मोटा चश्मा 

पापा जी का छोटा रेडियो 

उन दोनों के जाने के बाद 

गुम हो जाता है कहीं 

पुराने जूते, फाउंटेन पेन, पुराना कल्याण 

हमारी जिंदगी की अंधी गलियों से .... 

हर जगह पैर फैलाकर कब्जा करती जाती है 

हमारी जरूरतें, लालसाए 

आलमारी में पीछे खिसकती जाती है 

पुरानी डायरी, जीते हुये कप 

मम्मी का भानमती का…

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Added by Amod Kumar Srivastava on May 2, 2014 at 7:59pm — 11 Comments

गजल : बिंदी, काजल, झुमके, बेसर, चूड़ियां//शकील जमशेदपुरी

बह्र : 2122/2122/212



बिंदी, काजल, झुमके, बेसर, चूड़ियां

पास वो रखतीं हैं कितनी बिजलियां



आज फिर उसने किया है मुझको याद

आज फिर अच्छी लगीं हैं हिचकियां



खुशबू तेरी लाएगी बाद-ए-सबा          [बाद-ए-सबा = सुब्ह की हवा]  

खोल दी कमरे की मैंने खिड़कियां



तेरी जुल्फों से उलझती है हवा

काश मैं भी करता यूं अठखेलियां



दिल तो तेरे नाम से मंसूब था          [मंसूब= निर्दिष्ट, Assign]

यूं बहुत आई थी दर पे लड़कियां



जब…

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Added by शकील समर on May 2, 2014 at 6:00pm — 15 Comments

रिटायरमेंट

केदार के मरने की खबर सुनते ही एक मिनट को राय साहब चौंके फिर अपने को सामान्य करते हुये बस इतना ही कहा अरे अभी उसी दिन तो आफिस में आया था पेंशन लेने तब तो ठीक ठाक था। ‘हां, रात हार्ट अटैक पड गया अचानक डाक्टर के यहां भी नही ले जा पाया गया’ राय साहब ने कोई जवाब नहीं दिया बस हॉथो से इशरा किय, सब उपर वाले की माया है, और चुपचाप चाय की प्याली के साथ साथ अखबार की खबरों को पढने लगे। खबर क्या पढ रहे थे। इसी बहाने कुछ सोच रहे थे।



चाय खत्म करके राय साहब ने अपनी अलमारी खोल के देखा पचपन हजार…

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Added by MUKESH SRIVASTAVA on May 2, 2014 at 1:30pm — 12 Comments

ऐसे नेता को क्या कहिए -// व्यंग्य रचना // अन्नपूर्णा बाजपेई' अंजु'

ऐसे नेता को क्या कहिए

जो पीटे हिन्दू मुस्लिम राग

सांप्रदायिकता का बिगुल

बजा कर लगाये देश मे आग 

ऐसे नेता .......

जिनका कोई ईमान नहीं 

धर्म से कोई प्रेम नहीं 

राष्ट्र प्रेम का ढोंग दिखाएँ 

बेबस जनता को लूटें खाएं 

ऐसे नेता .......

गिरगिट से होते नेता 

पल मे रंग बदलते नेता 

पल मे तोला पल मे माशा 

खूब दिखाते रोज तमाशा 

ऐसे नेता .......

हाथ जोड़ ये दौड़े आते 

झोली…

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Added by annapurna bajpai on May 2, 2014 at 1:30pm — 18 Comments

मजदूर दिवस : काश ऐसा न होता...

रात अंधड़ में 

छितराए फूस के छप्पर को 

करना है दुरस्त

लेकिन समय कहाँ

अभी तो जाना है काम पर 



फिरसे फूल आये पेट में 

कुलबुला रहा है जीव 

अनमनी सी कराह रही घरवाली

रांध नही पाती भात...



भूखे पेट पैडल मारता भूरा 

टुटही साइकिल खींच रहा 

ससुरी चैन साईकिल की 

काहे उतरती बार-बार

भूरा बेबस-लाचार, 

ठीकेदार का मुंशी भगा देगा उसे 

जो देर से पहुंचा वो...

लड़ भी तो नही सकता 

भगा दिया गया तो 

डूब…

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Added by anwar suhail on May 2, 2014 at 9:37am — 9 Comments

चुनावी क्षणिकाएँ

1

जारी है कवायद

शब्दों को रफ़ू करने की

बुलाये गए हैं 

शब्दों के खिलाड़ी

 

शब्द

काटे जोड़े और

मिलाये जा रहे हैं

रचे और रंगे जा रहे हैं

शब्दों का सौंदर्यीकरण जारी है

2

शब्द

कभी चाशनी में

घोले जा रहे हैं

तो कभी छौंके जा रहे हैं 

कढ़ाई में

फिर जारी है खिलवाड़

हमारे सपनों का

 

3

 

भाँपा जा रहा है मिजाज़

हर शख्स का

अचानक…

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Added by नादिर ख़ान on May 2, 2014 at 8:30am — 11 Comments

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