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आगंतुक

       

 

    (निराश को आशाप्रद करती रचना)

     

 

         आगंतुक

                                        
मन के द्वंद्वात्मक द्वार पर
दिन-प्रतिदिन   दस्तक   देती
ठक-ठक  की वही  एक  आवाज़,
पर दरवाज़े पर खड़ा हर बार
आगंतुक   कोई   और…
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Added by vijay nikore on March 11, 2013 at 12:00pm — 24 Comments

हंसबैंड,

हंसबैंड

बिल शोपिंग का देते –देते, जिसकी ढीली हो गई पेंट

फिर भी हंसते हंसते जो , खुद की बजवाये बैण्ड ...

उसको कहते है हंसबैंड, की भईया कहते है हंसबैंड,

भोर भई जब सोते सोते बीबी बोले डार्लिंग,

देखो बाहर सूरज निकला, हो गई है गुड मार्निग.

यदि…

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Added by बसंत नेमा on March 11, 2013 at 11:30am — 5 Comments

दास्ताने होली

दास्ताने होली (होली के पावन पर्व पर जनहित में जारी)

होली के हुरियारों ने, मुझे पिला दी भंग

अंग अंग में छा गई, भंग की तरंग

गिरते पड़ते जैसे तैसे, वापिस घर मै आया

बाहर खड़े खजहे कुत्ते को, खूब गले लगाया

वो मुझे चाट रहा था, मै उसको चूम रहा था

मदहोश था यारो, मेरा सर घूम रहा था

रंगरंगीली छैलछबीली, वहाँ एक नार खड़ी थी

वो मुझे देखकर मुस्काई, मेरी उससे आँख लड़ी थी

उसकी कातिल मुस्कान ने, मेरे अरमानो को हवा दी

रोमांटिक हुआ…

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Added by Dr.Ajay Khare on March 11, 2013 at 11:00am — 4 Comments

!! टीका !! ’’ढोल गवार शूद्र पशु नारी। यह सब ताड़न के अधिकारी।‘‘

जस गॅवार गुण हीन अज्ञानी। आशा विपरीत सदा दुःख मानी।।

उलटि भजे सुनि कर्म भय ताहू। क्षमा राखि इच्छित फल पाहू।।

ज्यों ढोल मढि़ पोल उर राखा। गावहिं सगुन भवानहि भाषा।।

ढमढम ढोल ताल बिनु बाजा। नटसि नाथ हिय सुर ताल साजा।।

जनम जनम सेवा शूद्र वारे। दुःख दरिद्र त्यों जीवन धारे।।

कबहु न सीस मान अधिकारी। निषाद मित्र शबरी पय वारी।।

ज्यों समाज पशु धन श्री साजे। शत विधि भला असत रस राजे।।

बलि शीशा नर क्षुधा मिटाही। गिघ्द भालु कपि प्रभु जिय माही।

सकल ब्रहम संग रहे…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 11, 2013 at 10:30am — No Comments

होली गीत / मंजरी पाण्डेय

   

रंग गई रंग गई हे री सखी

मैं तो फाग के रंग में रंग गई।

1 - रंग ना गुलाल मै तो शर्म से लाल हुई

पिया घर आये मै आप गुलाल हुई

छेड़ो न छेड़ो न हे

मोहे छेड़ो न छेड़ो न छेड़ो सखी

मै तो अपने पिया रंग रंग गई।

रंग गई .........................

2 - धानी चुनर सरक सरक जाय रही

कान्हे से माथे की दौड़ लगाय रही

पकड़ो न पकड़ो न हे

अरे पकड़ो न पकड़ो न हे री सखी

मैं अपने पिया संग हो ली।

रंग गई…

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Added by mrs manjari pandey on March 11, 2013 at 12:00am — 4 Comments

ॐ .............

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Added by Deepika Mandal on March 10, 2013 at 9:30pm — 6 Comments

ज़रूरी नहीं...

ज़रूरी नहीं

कि हम पीटें ढिंढोरा

कि हम अच्छे दोस्त हैं

कि हमें आपस में प्यार है

कि हम पडोसी भी हैं

कि हमारे साझा रस्मो-रिवाज़ हैं

कि हमारी मिली-जुली विरासतें हैं

कतई ज़रूरी नहीं है ये

कि हम दुनिया के सामने

अपने प्यार का इज़हार करें

क्योंकि जब दोस्ती टूटती है

जब प्यार नफरत में बदलता है

तब रिश्तों में खटास आती है

तब दिल टूट जाते हैं

तब अकबका जाते हैं वे लोग

जिनके दिल मोम हैं

जो…

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Added by anwar suhail on March 10, 2013 at 7:24pm — 8 Comments

हरि-महिमा

                        हरि-महिमा

तिनका तिनका हरि नाम धरै, महिखंड समूल रसातल को!

यमलोक सुलोक हवा पहिरे, हरि नाम जपे हरि आपन को!!

हनुमान  हरी  हरि राम  रटे, मिलगे वन मा सुग्रीव सखा ! 

रघुवीर  मिले  दुःख  दूर भये, मनमीत बने हरि राम सखा!!

कहि कोल किरात चंडाल जपे,उलिटा हरि नाम सुनाम लगे!

हरि नाम जपे कवि के रसना, सुर प्रीत बने गंगा जमुना !!

हरि नाम कथा कहहि सुनही, पर प्राण सराहि हरे दुःख को!

कही मोह बढाहि चले मद में, हरी नाम भुलाय पड़े गत…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 10, 2013 at 5:09pm — 6 Comments

दोहे

अहंकार है जड़ प्रकृति, स: ह्वै चेतन सार!

हंसा बूझि अस मूढ़मति, ज्ञानी भए भव पार!!

 

द्युलोक मा व्यापक रहत,आदित तैजस रूप!

बसुधा धारत अनल सत,वायु शून्‍य इक भूप!!

 

आदित्य सोसत सागर, गुरुत्व शून्य अस भाए!

बादल डाले  वीर्य रस, धरा उपज अति पाए!

विश्वान इक गर्भ सृजक, चेतन रहा डोलाए!!

षट घन घना कुंभ विकृत,सत जागत सुख पाए!!

 

हंस उड़त एक पाद से,इक जलाशय रहि जाए!

कर्म  पाश रस  चाहना, फिरै  सरोवर …

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 10, 2013 at 12:31pm — 2 Comments

पाँच क्षणिकाएँ

(१) ज्वलंत प्रश्न

जब फलदार वृक्ष ही

बन जाएं नरभक्षी,

चूसने लगें रक्त,

तब क्या करे पथिक,

किधर ढूँढे छाँव, शीतलता,

कहाँ करे विश्राम,

कैसे जुटाये भोजन

जेठ की तपती राहों में।

(२) एक घटना

सुबह कुछ फूल देखे थे,

आकार में बड़े-बड़े,

चटख रंगोंवाले, भड़कदार,

मन किया कि घर ले आऊँ,

जाँच की तो पाया

सारे के सारे जहरीले थे।

(३) कैसी…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on March 10, 2013 at 11:46am — 8 Comments

मजबूरी क्यों खून के आंसू पीने की

जिनके लिये हिन्द प्राण से प्यारा था।

सत्य अहिंसा ही बस जिनका नारा था।

तैंतीस कोटि जनो का जो विश्वास था।

जिसमे होता देवों का आभाष था।

जिसने देखे स्वप्न राम के राज की।

उसी हिन्द की दशा हुई क्या आज की।

सत्य बैठ कोने मे सिसकी लेता है।…

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Added by आशीष यादव on March 10, 2013 at 10:30am — 7 Comments

दो भाई! – भाग-३

भाग 2 से आगे ..

खरीफ की फसल को तैयार कर अनाज को सहेजते और ठिकाने लगाते लगाते रब्बी की फसल भी तैयार होने लगती है. मसूर, चना, खेसारी, और मटर आदि के साथ सरसों, राई, तीसी आदि भी पकने लगते हैं, जिन्हें खेतों से काट कर खलिहान में लाया जाता है. इन सबके दानो/फलों को इनके डंटलों से अलग करने से पहले इन सबको पहले ठीक से सजाकर रखा जाता है, ताकि खलिहान के जगह का समुचित उपयोग हो. आम बोल-चाल की…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on March 10, 2013 at 7:30am — 4 Comments

स्वामी विवेकानंद की 150 वीं जन्म-शती के अवसर पर

 स वर्ष सारा राष्ट्र स्वामी विवेकानंद की 150 वीं जन्म-शती मना रहा है। स्वामी जी द्वारा दिया गया विचार-दर्शन युग-युगीन और शाश्वत है। उनकी दिव्य वाणी अमरता का महान् संदेश प्रदान कर रही है। स्वामीजी के दर्शन की आज भी उतनी ही प्रासंगिकता है जितनी विगत 20 वीं सदी में रही थी। मात्र 39…

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Added by prabhat kumar roy on March 10, 2013 at 7:00am — 4 Comments

महाशिवरात्रि पर विशेष : शिव पार्वती विवाह



शिव पार्वती विवाह (खण्ड-काव्य) सॆ कुछ छन्द

----------------------------------------------------------------

मत्तगयंद सवैया :-

================

शारद, शॆष, सुरॆश  दिनॆशहुँ,  ईश  कपीश गनॆश मनाऊँ ॥

पूजउँ राम सिया पद-पंकज, शीश गिरीश खगॆशहिं नाऊँ ॥

बंदउँ  चारहु  बॆद  भगीरथ, गंग  तरंगहिं  जाइ नहाऊँ ॥

मातु-पिता-गुरु आशिष…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on March 9, 2013 at 9:30pm — 31 Comments

नए ख्वाब खुद को दिखाने लगे हैं

 

नए ख्वाब खुद को दिखाने लगे हैं…

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Added by Pushyamitra Upadhyay on March 9, 2013 at 6:41pm — 6 Comments

गज़ल

चाहत के पंछी को जब उडाता हूँ

दर्दे -ए -दिल और  करीब पाता हूँ

घूम कर जब तक वो घर नहीं आता 

घर का दर हूँ कब चेन  पाता    हूँ

मैनें  मुस्करा  कर  हाथ बढाया 

 उस के अहं से क्यूँ  टकराता हूँ

तब मुझ को होने…

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Added by मोहन बेगोवाल on March 9, 2013 at 5:51pm — 6 Comments

महिला दिवस (बेटियाँ) दोहे

बेटी  ऐसी  बेल  है, ऊपर तक चढ़ जाय!

भले-बुरे संग खुश रहे,कभी न तोड़ा जाय!!

बेटी प्यारी दूब सी, नरम बिछौना जान!

गाट-गाट जोड़त रहे,खुशहाली की शान!!

बुलबुल कोकिल मैना सी,कूक रहे दिन-रात!

मात-पिता का अंतिम मन,बेटी घर ससुराल!!…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 9, 2013 at 2:30pm — 4 Comments

जीवन धारा

जब मि . गुप्ता ने कैफे में प्रवेश किया तब मि . खान और मसंद का ठहाका उनके कानों में पड़ा। उन्हें देखकर मि .खान बोले " आओ भाई सुभाष आज देर कर दी।" मि . गुप्ता ने बैठते हुए कहा " अभी तक रघु नहीं आया, वो तो हमेशा सबसे पहले आ जाता है।" मि . मसंद बोले " हाँ हर बार सबसे पहले आता है और हमें देर से आने के लिए आँखें दिखाता है, आज आने दो उसे सब मिलकर उसकी क्लास लेंगे।" एक और संयुक्त ठहाका कैफे में गूंज उठा।

तीनों मित्र मि . मेहता का…

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Added by ASHISH KUMAAR TRIVEDI on March 9, 2013 at 12:46pm — 3 Comments

महिला दिवस जागरण (दोहे)

मौलिक एवम् अप्रकाशित रचना

महिला दाता प्रेम की, बना भिक्षुक नर जात !
माया ममता ना मरी, मरा अहम् बड़जात !!

दामिनी भारत की बेटी, कल्पना भरे उड़ान !
इंदिरा किरण वेदी चॅढी, सुनीता गगन शान!!

बच्चे अच्छे एक या दो, जीवन का श्रृंगार!
पढ़ते - पढ़ते ग्यान दे, बेटी को मत मार !!
(के.पी.सत्यम)

मौलिक एवम् अप्रकाशित रचना !

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 8, 2013 at 10:50pm — 4 Comments

आतंकवादी

जाने क्यों आजकल

जब भी

देखता / सुनता हूँ ख़बरें

तो धड़कते दिल से

यही सुनना चाहता हूँ

न हो किसी आतंकी घटना में

किसी मुसलमान का हाथ...

 

अभी जांच कार्यवाही हो रही होती है

कि आनन्-फानन

टी वी करने लगता घोषणाएं

कि फलां ब्लास्ट के पीछे है

मुस्लिम आतंकवादी संगठन...

 

बड़ी शर्मिंदगी होती है

बड़ी तकलीफ होती है

कि मैं भी तो एक मुसलमान हूँ

कि मेरे जैसे

अमन-पसंद मुसलमानों के बारे…

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Added by anwar suhail on March 8, 2013 at 9:11pm — 11 Comments

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