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चाहत के पंछी को जब उडाता हूँ

दर्दे -ए -दिल और  करीब पाता हूँ

घूम कर जब तक वो घर नहीं आता 

घर का दर हूँ कब चेन  पाता    हूँ

मैनें  मुस्करा  कर  हाथ बढाया 

 उस के अहं से क्यूँ  टकराता हूँ

तब मुझ को होने का होता है यकीं

लौ की तरह जब में कांप जाता हूँ 

वो चाहे  के बो  दूँ अपने अरमां ,

क्या  बताऊ के एहसास ऊगाता हूँ '

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Comment by Dr.Ajay Khare on March 11, 2013 at 4:30pm

चाहत के पंछी को जब उडाता हूँ

दर्दे -ए -दिल और  करीब पाता हूँsunder rachana mohan ji badhai keep it up

Comment by मोहन बेगोवाल on March 11, 2013 at 3:11pm

सरस्वती जी, 

उत्साहित करने के  लिए धन्यवाद

Comment by Yogi Saraswat on March 11, 2013 at 11:37am

तब मुझ को होने का होता है यकीं

लौ की तरह जब में कांप जाता हूँ 

वो चाहे  के बो  दूँ अपने अरमां ,

क्या  बताऊ के एहसास ऊगाता हूँ

बहुत खूब

Comment by मोहन बेगोवाल on March 9, 2013 at 7:24pm

मोहन बेगोवाल ,

राम जी , उत्साहित करने के लिए धन्यवाद 

Comment by ram shiromani pathak on March 9, 2013 at 7:15pm

bahot hi badiya hai adarneey mohan ji.....kathya ko chdkar aur kuchh bhi hota hai ......pahle to aap gazl ki kaksha,chand vidhaan ,hindee ki kaksha adi join kar jankaari le filhal sab theek hai ....

gurujano se unaki raay lena na bhoole mai bhi seekh raha hu...saadar

Comment by मोहन बेगोवाल on March 7, 2013 at 10:03pm

 मोहन बेगोवाल

एडमिन व दोस्तों, कृपा करके  मेरी रचना बारे अपनी राए दीजिए , क्या मुझे ऐसी रचना को पोस्ट करना चाहिए ?

कृपया ध्यान दे...

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