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September 2011 Blog Posts

tatha kathit budhhijeevi

I have recently read an article, in indian express wrote  by shekhar gupta .  My view about the article is that   :- 
बहुत अच्छा लगा क़ी अभी भी देश में कुछ लोग तो बाकि हें जो  हमारे नेताओं को अच्छा मान रहे हें , नेताजी के बारे में लिख रहे हें क़ी one good thing about party politics is that politicians cannot wrap themselves in the Tricolour. Because they are, at least presumably, accountable to that flag: in the form of Parliament, the judiciary, and to we, the people.… Continue

Added by Rajendra Kumar Sharma on September 4, 2011 at 4:33pm — 4 Comments

काव्य सलिला: अनेकता हो एकता में -- संजीव 'सलिल'



*

विविधता ही सृष्टि के, निर्माण का आधार है.

'एक हों सब' धारणा यह, क्यों हमें स्वीकार है?



तुम रहो तुम, मैं रहूँ मैं, और हम सब साथ हों.

क्यों जरूरी हो कि गुड़-गोबर हमेशा साथ हों?



द्वैत रच अद्वैत से, उस ईश्वर ने यह कहा.

दूर माया से सकारण, सदा मायापति रहा..



मिले मोदक अलग ही, दो सिवइयां मुझको अलग.

अर्थ इसका यह नहीं कि, मन हमारे हों विलग..



अनेकता हो एकता, में- यही स्वीकार है.

तन नहीं मन…

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Added by sanjiv verma 'salil' on September 4, 2011 at 4:17pm — 2 Comments

"इश्क में"

पहले कभी ऐसा तो था नहीं मैं,

दीवाना तुमने मुझको बना दिया;

सोचा कभी नहीं बदलूँगा मैं,

तेरे इश्क ने मुझको बदल दिया;

इश्क क्या चीज़ है मालूम न था,

तेरे मुहब्बत ने मुझको दीवाना बना दिया;

क्यों करते हो मुझ पर भरोसा…

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Added by Smrit Mishra on September 4, 2011 at 12:30pm — 1 Comment

प्रकृति

मैं लिखना चाहती हूँ गीत 

तेरी प्रशंसा में, प्रकृति 

लेकिन तू तो स्वयं एक गीत है 

जीता जागता संगीत है 

लयबद्ध , तालबद्ध 

छंद है  ,गान है 

एक अनवरत अनचूक सिलसिला  है जीवन का |

तेरे मौसम…

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Added by mohinichordia on September 3, 2011 at 3:30pm — 5 Comments

जाही बिधि रखे राम ताहि बिधि रहिये ,

सीताराम, सीताराम, सीताराम, कहिये ,

जाही बिधि रखे राम ताहि बिधि रहिये ,

प्रभु मनमोहन को सदबुधि दीजिये ,

उनके साथियों को प्रभु सुमति कीजिये ,

सब हिंद वासी अब इतना ही चाहिए ,

सीताराम, सीताराम, सीताराम, कहिये ,

जाही बिधि रखे राम ताहि बिधि रहिये ,

अरविन्द ,प्रशांत किरण संग रहिये ,

कुमार बिस्वाश उनसब से ये कहिये ,

हिंद के चहेते हम हैं जुल्म ना करिये ,

हिन्दुस्तानी संग हैं आप आगे बढ़िये ,

सीताराम, सीताराम, सीताराम, कहिये ,

जाही बिधि…

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Added by Rash Bihari Ravi on September 3, 2011 at 2:30pm — 2 Comments

इतना बंदी मत करो मुझे अहसानों से....

इतना बंदी  मत करो मुझे अहसानों से,

कि आखिर को प्रतिदान नहीं मैं दे पाऊँ.

 

विस्मृत अस्तित्व होगया जब मुझसे मेरा,

अहसान तेरे सदियों  के कैसे  याद रहें.

जलने दो जो जलती मुस्कानों की होली,

इतने आंसू मत गिरो, नहीं…

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Added by Kailash C Sharma on September 2, 2011 at 8:00pm — 9 Comments

जन लोकपाल लिए मन माहि ,

जन लोकपाल लिए मन माहीं ,

अन्ना बोले जन सन्मुख जाहीं ,
साथ किरण बेदी आई ऐसे , 
राम काज लगी हनुमत जैसे ,
कपिल आये रूप धरि रावण ,
चाहैं  कार्य बिगारन पावन ,
जन समर्थन अन्ना जो पाये ,
तबहिं बिरोधि हुडदंग मचाये ,
मांग भई अस संसद बिरोधी ,
आयें प्रधान देख गतिरोधी ,
संसद कुछ जनहित में सोचा ,
हिंद की जनता का सिर ऊँचा" ­ ,
  

 

Added by Rash Bihari Ravi on September 2, 2011 at 2:00pm — 18 Comments

लोकतंत्र

"अक्षर ही न जाने वो किताब क्या पढ़ पाएँगे
पानी मे बिना तैरे खुद मर जाएँगे
ज्ञान न जानो विज्ञान न जानो तुम
संविधान को तुम कैसे समझ पाओगे
लोकतंत्र का अर्थ मालूम नहीं हे जिन्हे
उनका हे दावा लोकतंत्र को बचाएँगे."

Added by monika on September 2, 2011 at 2:24am — 5 Comments

भारतीय शिक्षा में खामियों की बढ़ती खाई

यह तो सही है कि भारत में न पहले प्रतिभाओं की कमी रही और न ही अब है। पुरातन समय से ही यहां की शिक्षा व्यवस्था की अपनी एक साख रही है। कहा भी जाता है, जब शून्य की खोज नहीं हुई रहती तो फिर हम आज जो वैज्ञानिक युग का आगाज देख रहे हैं, वह कहीं नजर नहीं आता। भारत में विदेशों से भी प्रतिभाएं अध्ययन के लिए आया करते थे, मगर आज हालात बदले हुए हैं। स्थिति उलट हो गई है। भारत से प्रतिभाएं पलायन कर रही हैं, उन्हें नस्लभेद का जख्म भी मिल रहा है, लेकिन यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। यहां कहना है कि…

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Added by rajkumar sahu on September 2, 2011 at 1:41am — 2 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल - भोगा हुआ यथार्थ..

.

जिसकी  रही  कभी नहीं आदत उड़ान की

अल्फ़ाज़ खूबियाँ कहें खुद उस ज़ुबान की

*

भोगा हुआ यथार्थ जो सुनाइये,  सुनें

सपनों भरी ज़ुबानियाँ  दिल की न जान की..

*

जिसके खयाल हरघड़ी परचम बने उड़ें

वो खा रहा समाज में इज़्ज़त-ईमान की ..

*

जिनके कहे हज़ारहा बाहर निकल पड़े

ऐसी जवान ताव से चाहत कमान की..

*

जबसे सुना कि शोर है अब इन्क़िलाब का

ये सोच खुश हुआ बढ़ी  कीमत दुकान की.

*

हर नाश से उबारता, भयमुक्त जो…

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Added by Saurabh Pandey on September 1, 2011 at 9:30am — 15 Comments

सावन गीत: -- संजीव 'सलिल'

सावन गीत:

संजीव 'सलिल'

*

मन भावन सावन घर आया

रोके रुका न छली बली....

*

कोशिश के दादुर टर्राये.

मेहनत मोर झूम नाचे..

कथा सफलता-नारायण की-

बादल पंडित नित बाँचे.



ढोल मँजीरा मादल टिमकी

आल्हा-कजरी गली-गली....

*

सपनाते सावन में मिलते

अकुलाते यायावर गीत.

मिलकर गले सुनाती-सुनतीं

टप-टप बूँदें नव संगीत.



आशा के पौधे में फिर से

कुसुम खिले नव गंध मिली....

*

हलधर हल धर शहर न जाये

सूना…

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Added by sanjiv verma 'salil' on September 1, 2011 at 8:04am — 3 Comments

व्यंग्य - उपाधि मिलने की वाहवाही

‘उपाधि’ देने की परिपाटी बरसों से है। बदलते समय के साथ यह परिपाटी अब पूरे रंग में है। पहले आप कुछ नहीं होते हैं। उपाधि मिलते ही आप रातों-रात उपलब्धि की सभी उंचाई पार लगा लेते हैं। हर तरफ बस वाहवाही रहती है। जब हर कहीं सम्मान मिले और नाम के आगे चार चांद लग जाए। ऐसी स्थिति में कौन नहीं चाहेगा, किसी उपाधि से सुशोभित होना। उपाधि पाने का कीड़ा जब काटता है, उसके बाद उपाधि छिनने की करामात भी करनी पड़ती है। माथे पर उपाधि की मुहर लगते ही एक अलग पहचान बनती है। आने वाली पीढ़ी भी उपाधि के सहारे ही जानती हैं कि… Continue

Added by rajkumar sahu on September 1, 2011 at 1:32am — 2 Comments

आँख

  चेहरा ये कैसा होता गर आँख नहीं होती.

दिल कैसे फिर धड़कता गर आँख नहीं होती.

रक़ीब से भी बदतर हो जाते कभी अपने.

मालूमात कैसे होता गर आँख नहीं होती.

कितना हसीन है दिल चाक करने वाला.

एहसास कैसे होता गर आँख नहीं होती.

कुर्सी के नीचे बर्छी आखिर रखी है क्यूँ कर.

तहक़ीकात कैसे होती गर आँख नहीं होती.

मिलती औ झुकती - उठती फिर चार…

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Added by satish mapatpuri on September 1, 2011 at 12:08am — 10 Comments

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