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September 2010 Blog Posts

ऐसे हराम के खाने वाले गरीबो को निशाना बनाते हैं ,

आइये यु.पी. की सैर कराते हैं ,

उस घर में लेकर चलते हैं ,

जहाँ घर नें गवाएँ मालिक हैं ,

भला हो मीडिया की बात सामने आती हैं ,

"आजतक" पर जो देखा आँख से आसू आती हैं ,

छोटेलाल ने अरजी किया था ,

घर में बिजली पाने की ,

घर में बिजली नहीं आयी ,

नजर लगी बिजली वालो की ,

आया बिल सवा लाख का ,

बेचारा का सर चकरा गया ,

गया बिचली ऑफिस में ,

कुर्की जप्ती का फरमान पा गया ,

बहुत कोशिश की पर नहीं… Continue

Added by Rash Bihari Ravi on September 7, 2010 at 2:00pm — 1 Comment


प्रधान संपादक
ग़ज़ल - 8 (योगराज प्रभाकर)

रेशम के शहर आ बसा हूँ इस यकीन से

कोई तो मिले इश्क जिसे पापलीन से !



मैं चाँद सितारों के ज़िक्र में हूँ अनाड़ी,

इन्सान हूँ जुड़ा हुआ अपनी ज़मीन से !.



सच्चाई की तासीर तो कड़वी ही रहेगी,

आएगी न मिठास कभी भी कुनीन से !



मजबूरी-ए-हालात है कुछ और नहीं है,

जो मस्त लगा नाग सपेरे की बीन से !



बंगले मकान तो यहाँ लाखो ही मिलेंगे

घर ढूँढना पड़ेगा मगर दूरबीन से !



सर को उठाऊँ ग़र तो चूल्हा रहे ठंडा,

सर को झुकाऊँ गर तो गिरता हूँ… Continue

Added by योगराज प्रभाकर on September 7, 2010 at 10:00am — 21 Comments

::::: चाँद की चाहत ::::: ©



▬► Photography by : Jogendrs Singh ©

The little girl in dis pictire is my daughter "Jhalak"..



::::: चाँद की चाहत ::::: Copyright © (मेरी नयी शायरी)

जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh ( 08 अगस्त 2010 )



▬► NOTE :- कृपया झूठी तारीफ कभी ना करिए.. यदि कुछ पसंद नहीं आया हो तो Please साफ़ बता दीजियेगा.. मुझे अच्छा ही लगेगा..

▬►… Continue

Added by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on September 5, 2010 at 10:30pm — 4 Comments

::::: मैं एक हर्फ़ हूँ ::::: Copyright ©

.

▬► Photography by : Jogendrs Singh ©



::::: मैं एक हर्फ़ हूँ ::::: Copyright © (मेरी नयी कविता)

जोगेंद्र सिंह Jogendra Singh ( 09 अगस्त 2010 )



मेरे मित्र आर.बी. की लिखी एक रचना जो नीचे ब्रैकेट्स में लिखी है से प्रेरित होकर मैंने अपनी रचना रची है..

आर.बी. की मूल रचना नीचे है आप देख सकते हैं ► ► ►

((hum dono jo harf hain....

hum ek roz mile....

ek lafz bana...

aur humne ek maane… Continue

Added by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on September 5, 2010 at 10:00pm — 15 Comments

"मैं खुश हूँ"



आज...

मैं बहुत खुश हूँ...

पूरी दुनिया 'कल' थी...

पर 'मैं' आज हूँ..

क्योंकि आ ज मिला है मुझे...

एक नया खिलौना...

जिसे सब कह रहे थे 'तिरंगा'...



कल था ये सबके हाथों में...

चाहता था मैं भी...

इसे छूना...

लहराना...

फेहराना...

पर किसी ने ना दिया इसे हाथ लगाना...

जैसे ना हो 'हक' मुझे इन सबका...



कल था तरसता सिर्फ 'एक' को...

आज पाया है पड़ा 'अनेक' को...

कल…
Continue

Added by Julie on September 5, 2010 at 9:37pm — 4 Comments

ग़ज़ल - पैग़ाम-ए-मौहब्बत

नफरत के बदले प्यार को लुटा रहा हूँ मैं

सदियों पुरानी रस्म को ठुकरा रहा हूँ मैं



मेरी ज़ात को समा ले अपनी ही ज़ात में

है बचा खुचा जो चेहरा वो मिटा रहा हूँ मैं



गीतों में मेरे ख़ुशबू अब होने लगी दोबाला

अब इनमे तेरी रंगत को मिला रहा हूँ मैं



नगमे वफ़ा के शायद निकले तुम्हारी रूह से

यही सोच शेख साहिब तुझे पिला रहा हूँ मैं



तेरे मतब पे जाकर भी इन्सां बना रहूँगा

तेरी रिवायत की जड़ें हिलाने जा रहा हूँ मैं



देता रहा वाईज मुझे जो… Continue

Added by Shamshad Elahee Ansari "Shams" on September 5, 2010 at 11:19am — 3 Comments

कोई दीवानी इंतजार में शहीदों की ----

अक्सर कई मित्र पूछ लेते हैं हंसी मजाक में --भाई ये ग़ज़ल क्या होती है --

ग़ज़ल कह के ही समझाओ हमें --ऐसी ही मुश्किल को आसान करने का छोटा सा प्रयास

किया है हमने ---उन्हीं मित्रों को सादर समर्पित है

--------------------------------------

शमां से आँख लड़ी हो तो ग़ज़ल होती है ---

या के फिर खूब चढ़ी हो तो ग़ज़ल होती है |



तुम किसी शोख हसीना को छेड़ कर देखो --

जेल जाने की घडी हो तो ग़ज़ल होती है --|



वो शाम से ही अगर ले रहे हों अंगड़ाई --

तमाम रात… Continue

Added by jagdishtapish on September 5, 2010 at 9:30am — 2 Comments

अंजान हक़ीकत

Added by Subodh kumar on September 4, 2010 at 9:30pm — No Comments

झूठ बोलने की जिद

यह जानते हुए
सच की खुशबू
एक दिन फैलेगी ही
उर्जा व्यर्थ गंवाते है हम
ढकने में उसे
झूठ की चादरों से ॥

सच वह ओस है
जिसे प्रत्येक दिन
झूठ का तमतमाता सूरज
गायब कर देता है ॥

मगर पुनः
कल सबेरे
सच का ओस
फिर हाज़िर हो जाता है
अपने चमकीले रूप में ॥

मेरे दोस्त ...
सच को परास्त करना नामुमकिन है
छोड़ दो जिद
झूठ बोलने की ॥

Added by baban pandey on September 4, 2010 at 5:00pm — 1 Comment

कृष्ण तुम हो कहाँ ? Dr Nutan Gairola

तुम कौन ?





तुम कौन जो धीमे सा एक गीत सुना देते हो ,



मन के अन्दर एक रौशन करता दीप जला देते हो|



बंद कर ली मैंने सुननी कानों से आवाजें ,



जब से सुन ली मैंने अपने दिल की ही आवाजें ||





तुम भूखे बच्चो के मुंह से निकली क्रंदन वेदना सी,



तुम जर्जर होते अपेक्षित माँ बापू के विस्मय सी |



तुम पेट की भूख की खातिर दौड़ते बेरोजगार युवा सी,



तुम खुद को स्थापित करती एक नारी की कोशिश सी,



तुम आतंकियों की भेदी… Continue

Added by Dr Nutan on September 4, 2010 at 4:00pm — 6 Comments

वो ज़हान मेरा नही

वो ज़हान
मेरा नही
जहाँ
तेरी खुशबू
न हो
तेरी यादें न हो
जिक्र न हो
जहाँ तेरा
वो महफिल
मुझे रास आती नही

Added by rajni chhabra on September 4, 2010 at 3:30pm — 4 Comments

सरकारी बन्दूक

बन्दूक .....
एक भय है
एक डर है
लोगों को डराने की चीज है
मारने की नहीं ॥
इससे गोलीयाँ
शायद ही कभी निकलती हो ॥


जो इस बात को समझ गया
वह बन्दूक से नहीं डरता ॥
बल्कि ...
चाकू दिखाकर
छीन लेता है बन्दूक ॥

हमारे नक्सली
सरकारी बंदूकों की भाषा
अच्छी तरह पढ़ चूके है ॥

Added by baban pandey on September 4, 2010 at 2:00pm — 3 Comments

Ru-B-Ru

Added by Subodh kumar on September 4, 2010 at 1:00pm — 2 Comments

तेरा ख़याल

हसीं इतना है तेरा ख्याल, पल भर के लिए दिल से निकलता नहीं|

पहले जैसे भी हम जी लिए पर, जीवन अब तेरे बिन देखो चलता नहीं||



वो गज़ब का समय था हमारे लिए, तेरी पहली नज़र का, पहले प्यार का|

सारी बाते बिछड़ जायेंगी एक दिन , कैसे भूलूंगा दिन तेरे इकरार का||

तेरे पहलू में रहने की जिद पे अड़ा, लाख बहलाऊं ये दिल बहलाता नहीं|

हसीं इतना है तेरा ख़याल...............................................



तेरे गेसुओं की घनी छाँव में, मेरा डेरा बने, एक बसेरा बने|

मेरी हर…

Continue

Added by आशीष यादव on September 4, 2010 at 10:30am — 8 Comments

मुक्तिका: चुप रहो... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:



चुप रहो...



संजीव 'सलिल'

*

महानगरों में हुआ नीलाम होरी चुप रहो.

गुम हुई कल रात थाने गयी छोरी चुप रहो..



टंग गया सूली पे ईमां मौन है इंसान हर.

बेईमानी ने अकड़ मूंछें मरोड़ी चुप रहो..



टोफियों की चाह में है बाँवरी चौपाल अब.

सिसकती कदमों तले अमिया-निम्बोरी चुप रहो..



सियासत की सड़क काली हो रही मजबूत है.

उखड़ती है डगर सेवा की निगोड़ी चुप रहो..



बचा रखना है अगर किस्सा-ए-बाबा भारती.

खड़कसिंह ले… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 4, 2010 at 8:30am — 5 Comments

अजब हिंद की गजब कहानी कैसे मैं बतलाऊ ,

अजब हिंद की गजब कहानी कैसे मैं बतलाऊ ,

जो जो लुटता हैं हमें उसको मेहमान बनाऊ ,

अफजल गुरु की करनी को आप नहीं भूले होंगे ,

अजमल कसाब क्या किया सोच के जलते होंगे ,

अंग्रेजो की क्या बोलू मुगलों की राज सुनाऊ ,

अजब हिंद की गजब कहानी कैसे मैं बतलाऊ ,

लुट मची लुट लो जो मुग़ल अंग्रेज किये ,

माँ भारती के दामन पर सौ सौ दाग दिए ,

दिल्ली वाले लुट रहे हैं कमनवेल्थ के नाम पर ,

यु पि में भी लुट मची हैं मूर्ति वाला काम पर ,

ये सोचने की समय नहीं हैं दर्द कैसे… Continue

Added by Rash Bihari Ravi on September 3, 2010 at 5:54pm — 4 Comments

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