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राज़ नवादवी
  • Male
  • Bhopal, Madhya Pradesh
  • India
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सालिक गणवीर left a comment for राज़ नवादवी
"भाई राज़ नवादवी जी आदाब बहुत उम्दा ग़ज़ल की बधाइयां स्वीकारें. आशा करता हूँ कि भविष्य में भी ऐसी ही रचनाओं को पढ़ने का अवसर प्राप्त होता रहेगा."
Mar 29
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"आदरणीय मोहन बेगोवाल जी, बेहद शुक्रिया आपका. "
Mar 28
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"आदरणीय जनाब समर कबीर साहिब, इस्लाह का बेहद शुक्रिया, बहुत जल्दी में कही गई ग़ज़ल खासकर वो पहला मतला. उसे हटा दूंगा. सादर "
Mar 28
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"2122-1122-1122-22/112   चोट खा खा के कोई फ़र्द बशर बनता है रिज़्क़ जब गलता है पानी में, ख़ुमर बनता है //१   कितना भी शोला हवाओं में ज़बर बनता है एक दिन जल के वो भी राख मगर बनता है //२   हम मरे जाते हैं उल्फ़त में ख़बर है किसको उनको इक छींक…"
Mar 28
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"आदरणीय  dandpani nahak जी, वाह वह बहुत अछा प्रयास  इल्तिज़ा है कि सभी लोग घरों में ही रहेंटाल दें कोई ज़रूरी जो सफ़र बनता हैऔर मैं क्या कहूँ ऐ यार तेरी यारी मेंमार दे मुझको तेरा काम अगर बनता है अच्छे अशआर, बधाई स्वीकार करें.…"
Mar 28
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
" आदरणीया Rachna Bhatia जी,  अछा प्रयास है. जीस्त का यूँ ही नहीं यारो कवर बनता है आजकल झूठ से ही कोई बशर बनता है कुछ यूँ करें तो बह्र पूरी होती है. आदरणीय  समर साहिब ने इसी और इशारा किया है. सादर "
Mar 28
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"जनाब Khan Hasnain Aaqib साहिब, वाह वाह मतला सुन्दर है,  वक़्त बदले तो हर एक ज़ेर ज़बर बनता है आम को चूस के खाना भी ख़बर बनता है। बाक़ी आदरणीय समर साहिब की बात. सादर. "
Mar 28
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"आदरणीय सूबे सिंह सुजान  साहिब, वाह वाह, बहुत अच्छा प्रयास, बधाई स्वीकार करें.  जितनी कड़वी दवा,उतना ही असर बनता है (2) को  जितनी कड़वी है दवा,उतना असर बनता है (2) ऐसे भी कहा जा सकता है. सादर "
Mar 28
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
" आदरणीय Md. Anis arman, साहिब, वाह वाह बहुत खूब भाई, क्या कहने  2)जड़ पकड़ लेता है ये दिल की ज़मीं पर फ़ौरनइश्क़ का पौधा बड़ी जल्दी शजर बनता है | मज़ा आ गया इस शहर में, सादर "
Mar 28
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"वाह वाह जनाब  Tasdiq Ahmed Khan साहिब, क्या कहने, बधाई हो  ग़म भी पड़ते हैं मुहब्बत में उठाने यारोयूँ किसी का न कोई जान ए जिगर बनता है l बहुत ख़ूब, सादर "
Mar 28
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"वाह वाह जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर साहिब, बहुत ख़ूब,  जिसने औरों का बचाया है हमेशा जीवनयार दुनिया में वही शख़्स अमर बनता है।४। बहुत सुन्दर, सादर "
Mar 28
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"आदरणीय   रवि भसीन 'शाहिद जी, आदाब अर्ज़ है. एक सुन्दर प्रयास के लिए हृदय से आभार. शे'र कहने का हुनर खेल नहीं है यारोरात दिन मश्क़ से उस्ताद-ए-'समर' बनता है [10] बहुत खूब, वाह वाह  सादर "
Mar 28
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"आदरणीय   anjali gupta जी, आदाब अर्ज़ है. एक सुन्दर प्रस्तुति के लिए हृदय से आभार. सादर  चाहे जितना भी उछालो उसे टूटे न मगर कोई बतलाये के दिल ऐसा किधर बनता है (4) बहुत खूब. "
Mar 28
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"आदरणीय  ASHFAQ ALI (Gulshan khairabadi) साहिब, आदाब अर्ज़ है. मुशायरे का आगाज़ करने के लिए ढेरों बधाइयां. बहुत बढ़िया प्रयास. सादर "
Mar 28
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-108
"वाह, बहुत ख़ूब आदरणीय रवि शुक्ला जी, सुंदर प्रस्तुति के लिए ढेरों बधाई। सादर। "
Jun 27, 2019
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-108
"आदरणीय नाहक साहिब, बहुत आभार। सादर। "
Jun 27, 2019

Profile Information

Gender
Male
City State
Bhopal, Madhya Pradesh
Native Place
Nawada, Bihar
Profession
Education, Training, and Community Development. Hybrid Value Chain Entrepreneur (HVCE) at Ashoka Innovators for the Public
About me
Main shayar to nahin, magar ai zindgee, jab se tum ko samjha, shayari aa gai.

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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९४

जनाब अहमद फराज़ साहब की ज़मीन पे लिखी ग़ज़ल



221 1221 1221 122



बुझते हुए दीये को जलाने के लिए आ

आ फिर से मेरी नींद चुराने के लिए आ //१



दो पल तुझे देखे बिना है ज़िंदगी मुश्किल

मैं ग़ैर हूँ इतना ही बताने के लिए आ //२



तेरे बिना मैं दौलते दिल का करूँ भी क्या

हाथों से इसे अपने लुटाने के लिए आ //३



तेरा ये करम है जो तू आता…

Continue

Posted on May 1, 2019 at 12:00am — 9 Comments

प्याज भी बोलते हैं (लघुकथा) राज़ नवादवी

प्याज भी बोलते हैं- एक लघुकथा

-------------------------------------

हर कोई सब्ज़ी वाले से बड़ा प्याज माँगता है। कल मैं भी ठेलेवाले भाई से प्याज ख़रीदते समय बड़े प्याज माँग बैठा। तभी, बड़े प्याजों के बीच बैठे एक छोटे प्याज ने मुझसे कहा,

"भाई साहब, हर कोई बड़ा प्याज माँगता है, तो हमारा क्या होगा? हम भी तो प्याज हैं!"

मैं सकपका गया, ये कौन बोल रहा है? प्याज? क्या प्याज भी बोलते हैं? तभी मैंने देखा वहीं पड़े कुछ बड़े प्याज आंनद…

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Posted on April 27, 2019 at 1:00pm — 7 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९३

२२१ २१२१ १२२१ २१२



अपनी गरज़ से आप भी मिलते रहे मुझे

ग़म है कि फिर भी आशना कहते रहे मुझे //१ 



दिल की किताब आपने सच में पढ़ी कहाँ

पन्नों की तर्ह सिर्फ़ पलटते रहे मुझे //२ 



मिस्ले ग़ुबारे दूदे तमन्ना मैं मिट गया

बुझती हुई शमा' सा वो तकते रहे मुझे //३ 



सौते ग़ज़ल से मेरी निकलती थी यूँ फ़ुगाँ

महफ़िल में सब ख़मोशी से सुनते रहे मुझे…

Continue

Posted on February 4, 2019 at 10:13am — 6 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९२

२२१ २१२१ १२२१ २१२



मिलना नहीं जवाब तो करना सवाल क्यों

मेरी ख़मोशियों पे है इतना मलाल क्यों //१

दामाने इंतज़ार में कटनी है ज़िंदगी

मरने तलक है हिज्र तो होगा विसाल क्यों //२ 

यारों को कब पता नहीं कैसे हैं दिन मेरे

है जो नहीं वो ग़ैर तो पूछेगा हाल क्यों //३ 



जब है ज़रीआ कस्ब का कोई नहीं मेरा

आसाईशों की चाह की फिर हो मज़ाल…

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Posted on February 3, 2019 at 12:09pm — 3 Comments

Comment Wall (15 comments)

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At 6:10pm on March 29, 2020, सालिक गणवीर said…
भाई राज़ नवादवी जी
आदाब
बहुत उम्दा ग़ज़ल की बधाइयां स्वीकारें. आशा करता हूँ कि भविष्य में भी ऐसी ही रचनाओं को पढ़ने का अवसर प्राप्त होता रहेगा.
At 9:42am on January 27, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय राज़ जी
बहुत बहुत शुक्रिया आपका
At 9:54pm on August 28, 2017, Samar kabeer said…
जनाब राज़ साहिब,कृपया फोन कर लें,मुझे ओबीओ पर चेट करना नहीं आता ।
At 2:14am on July 31, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स परिवार की ओर से आपको जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनायें.

At 3:21pm on July 18, 2013,
सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari
said…

जी आप कुछ कुछ ठीक कह रहे हैं त्रुटी वश ये न की जगह ना लिखा गया 'केवल दो किलोमीटर पीछे हुए एक्सीडेंट का वो बेचारा पेशेंट साइकिल वाला था न  और ये कार वाला, क्या ये  अंतर मैं नहीं समझती'----ये इस तरह लिखा था मेरी मूल लघु कथा में ----हम दैनिक बोलचाल में न शब्द का इस्तेमाल ? के साथ करते हैं  इसमें न के बाद ? मार्क लगाना भूल गई बहुत बहुत आभार इस और ध्यान दिलाने के लिए 

At 12:30pm on July 18, 2013,
सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari
said…

सादर आभार तहे दिल से शुक्रिया ग़ज़ल आपको पसंद आई राज़ जी 

At 5:36pm on October 11, 2012, Deepak Sharma Kuluvi said…

welcome sir

At 2:36pm on October 11, 2012, Deepak Sharma Kuluvi said…

aapki rachnaen behatreen hain

At 4:38pm on October 8, 2012, नादिर ख़ान said…

मुझको तिरी बेजारियों का कुछ गिला नहीं

मेरी भी ज़िंदगी अना दिखला के रह गई  

मैं भी न मिल सका उसे पिछले बरसके बाद

तनहा कली कहीं कोई मुरझा के रह गई

बहुत ही उम्दा गज़ल है राज़ भाई  बहुत ख़ूब

At 11:45am on September 21, 2012, प्रमेन्द्र डाबरे said…

राज़ साहब आपने मुझ नाचीज़ की भी रचना पढ़ी मैं धन्य हो गया, आपकी दाद मेरे लिए सबसे बड़ा तोहफा है और कुछ और अच्छा लिखने की प्रेरणा अब मुझे मिलती रहेगी.... आपका तलबगार  प्रमेन्द्र डाबरे

 
 
 

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