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(1). सुश्री सीमा सिंह जी  
दूध का जला


“चलो, अविनाश, तुम भी हमारे साथ चलो! आज ओडियन में फिल्म देखने का प्रोग्राम है।” नेगी मैडम ने मुस्कुरा कर कहा।
“नहीं, मैडम। आज माँ को डॉक्टर के पास ले जाना है, सात बजे का एपॉइंटमेंट है,” अविनाश ने विनम्रता से उत्तर दिया।
अविनाश को पहली बार बोर्ड की कॉपियां जांचने का काम मिला था। बेगारी से जूझते अविनाश के किसी परिचित ने उसको काम दिला दिया था। एक हॉल में सरकारी और प्राइवेट स्कूल के अध्यापक–अध्यापिकाऐं गपशप के बीच कॉपी जाँचते, विद्यार्थियों का आकलन करते जाते। उन्ही के साथ बैठ कर वह भी कॉपियां जांचता।
“अरे, यार! फिल्म तो छः बजे खत्म हो जाएगी।” अपने पान सने दांत चमकाते हुए, साथ की कुर्सी पर बैठे एक अध्यापक ने अपनी ऐनक के ऊपर से झांकते हुए कहा।
“अजी, टिकट के पैसे हम दे देंगे!” उन्ही के बगल में बैठे दूसरे अध्यापक ने चुटकी लेते हुए कहा।
“नहीं, सर, वो बात नहीं हैं। अभी नया हूँ, आप लोगों जैसी स्पीड से कॉपी चेक नहीं कर पाता। मुझे पूरा दिन लग जाएगा।” अविनाश ने सकुचाते हुए कहा।
“अमां मियाँ! तो क्या आप एक-एक हर्फ पढ़कर जांचते हो?” बोर्ड कॉपी चेकिंग के इन्चार्ज ने अपनी उंगली पर लगा चूना चाटते हुए, अचम्भित स्वर में पूछा।
“जी... जी...” उत्तर देते समय अविनाश थोड़ा हकला सा गया।
“इनको समझाओ कोई, कॉपी ऐसे नहीं जांची जातीं! ऐसे पढ़ने लगे तो पैंतालिस कॉपियां जांचने में पूरा हफ्ता लग जाए!” इंचार्ज महोदय ने चश्मा उतार हाथ में थाम, दार्शनिक अंदाज़ में कहा, तो सब ठठा कर हँस पड़े।
“अरे, अविनाश बाबू , सीधी सी बात है। दो-चार लाइन पढ़कर अंदाज़ा लगाओ, और बीस से बयालीस के बीच में नम्बर दे दो। किसी को थोड़े, कम किसी को ज्यादा । हाँ, ये ध्यान रखना, बहुत कम न देना। और पैंतालीस से ऊपर तो भूल कर भी नहीं, नहीं तो जांच हो जाएगी।”
“पर, सर...”
“सारा दिन यही करते रहेंगे, क्या? मिलता भी क्या है पूरे दिन की मगजमारी के बदले?!”
“फिर भी, सर...”
“अभी नए हो, बन्धु! जल्द ही बंडल निपटाने का हुनर भी सीख ही जाओगे।”
“सर, मैं खुद किसी के इसी हुनर का मारा हूँ। कम अंकों के चलते कितनी ही जगह से वापस लौटा हूँ... कम से कम मैं तो किसी और के साथ ऐसा न कर पाऊंगा।”
भीगे मगर मजबूत स्वर में अविनाश ने उत्तर दिया, और सिर झुका पेन पकड़ ध्यान से कॉपी में एक-एक अक्षर पढ़ने लगा।
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(2). सुश्री राहिला जी  
धारा के विपरीत


शेख़ साहब ने अपने इंजीनियर बेटे का रिश्ता जब बहुत बड़े घर में तय किया, तो जाहिर सी बात थी कि लेन देन की बात करके खुद को हकीर साबित क्यूँ करते ।यहाँ जब वह बारातियों की लम्बी फेरिस्त तैयार कर रहे थे तब वहीं बेटे ने ये कह कर उनके सारे अरमानों पर पानी फेर दिया कि वह निकाह शरियत के हिसाब से करेगा ।और बारात में केवल घर के पंद्रह बीस लोगों के अलावा कोई और नहीं जायेगा। साथ ही दहेज़ के नाम पर भी एक ढेला नहीं लेगा।बेटे का फैसला सुनकर शेख़ साहब एकदम से बौखला गये । उन्होंने दुनियादारी का उसे खूब हवाला दिया, लेकिन बेटा टस से मस ना हुआ। आख़िरकार लड़के की जिद के आगे उन्हें झुकना पड़ा । ख़ैर, बिना तामझाम और बिना शोर शराबे के शरियत मुताबिक , निकाह संपन्न हुआ ।लेकिन जब बात तोहफ़ो की आई तो शेख़ साहब!ने लड़के की एक ना चलने दी ।खुद लड़की वाले भी अपनी बेटी को खाली हाथ नहीं भेजना चाहते थे ।तो जरूरत के सभी सामान के लिए तय हुआ कि लड़के वाले अपने ही शहर से सारा सामान खरीद लें ।बस फिर क्या था शेख़ साहब ने अच्छे से अच्छा सामान खरीद कर अच्छा खासा बिल बनवाया।
"अम्मी !अब्बू ने तो भाई की एक ना चलने दी।बेचारा शरियत,शरियत करता रह गया ।"सामान देखकर ,शादी में आई बड़ी बहन मुँह दबा कर हँस दी।
"बिटिया !ऐसा है ...,कि जब कोई पक्के इरादे वाला कुछ ठान लेता है ना तो शक़ की गुंजाईश नहीं रहती।"कह कर अम्मी जिस तरह मुस्कुरायी, शबाना उस मुस्कराहट का आशय समझ , आँखे फाड़े रह गयी।
"तो क्या बिल भाई ने....?"
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(3). सुश्री प्रतिभा पाण्डेय जी  
‘नायक’
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वो दोनों ठग आज फिर से इस नगर में आ गए थे I ये वो ही ठग जुलाहे  थे जिन्होंने पच्चीस छब्बीस वर्ष पहले इस नगर के राजा को ये कहकर ठगा था कि वो उसके लिए दुनिया की सबसे खूबसूरत पोशाक तैयार कर रहे हैं Iऐसी पोशाक जो सिर्फ सच्चे लोगों को ही दिखेगी I हवा में झूठ मूठ की पोशाक बनाने का नाटक करते हुए वो  राजा से मुद्राएँ ऐंठते रहे थे I और फिर एक दिन सड़कों पर अदृश्य पोशाक पहने भोंदू राजा की सवारी निकली I भीड़ जुट गई I अपने अन्दर के झूठ से डरा हुआ हर एक आदमी राजा की जय जयकार और पोशाक की तारीफ़ कर रहा था I तभी भीड़ में से एक बच्चा चिल्ला पडा था  कि राजा तो नंगा है I भीड़ का फायदा उठा कर ये दोनों वहां से भाग गए थे I
इन दोनों ने अब ठगी छोड़ दी थी I उस बच्चे से मिलने की इच्छा इन्हें यहाँ ले आई थी I
“ अब तो वो साहसी बच्चा अच्छा ख़ासा युवा हो गया होगा “I   एक ठग बोला I
“हाँ i  कैसे बिना डरे चिल्ल्या था वो उस दिन कि राजा तो ..” I
उस दिन की याद कर दोनों हँसने लगे I
“ लगता है नगर में नए हो ,तभी यूँ  हँस रहे हो “I एक भिखारी सा दिखने वाला बूढा  पास आ गया I
“क्यों हँसना मना है क्या यहाँ “?
“ बदहाली में कोई हँस सकता है क्या “?
बूढ़े की बात सुन दोनों ने अपने आस पास देखा I  सब फटेहाल गरीब  दिख रहे थे I टूटे फूटे मकान ,जर्जर सड़कें I गरीबी बदहाली बिखरी पड़ी थी I
“ इस नगर के उस मशहूर किस्से को याद कर हँस रहे थे जब एक बच्चे ने राजा की अदृश्य पोशाक  की पोल खोल दी थी” I
“आज भी तो सब कुछ अदृश्य है “I बूढा अपने आप से बोल रहा था I
“ मतलब “?
“ राजा के अनुसार राज्य में खूब  खुशहाली है I, पर फिर हमें क्यों नहीं दिखती? और हाँ i तब तो दो ही ठग थे ,पर आज तो ..”I बूढा चुप हो गया I
“ देख लेना एक दिन फिर से कोई नायक निकल कर आ जाएगा भीड़ से राजा का सच बताने “I ठगों ने बूढ़े के कंधे पर हाथ रख दिया I
तभी घोड़े दौडाते सैनिक सडक पर आकर लोगों को मार्ग के इधर उधर खदेड़ने लगे I  राजा की भव्य सवारी आ रही थी I  एक दूसरे पर गिरते पड़ते फटेहाल लोग राजा की जयजयकार कर रहे थेI
“ राजा के रथ के पीछे वाले रथ में कौन है जानते हो “? बूढा दोनों के कान में फुसफुसाया I
“कौन “?
“ राजा का मंत्री,  ठगों का सरगना  तुम्हारा वो नायक, वो साहसी बच्चा “I बूढा अब जोर जोर से हँस रहा थाI
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(4). श्री मोहम्मद आरिफ जी  
दान

"पापा, मैं और शालिनी आपको लेकर दिन भर परेशान होते रहे । बिना बताए कहाँ चले गये थे?"
"बेटा सागर, मेडिकल कॉलेज गया था ।"प्रो. संतोष जैन ने बड़े इत्मीनान से कहा ।
"क्यों ? आप बीमार तो कतई नहीं है ।"
" दर असल घोषणा-पत्र भरने गया था । रजिस्ट्रेशन भी करवाना था ।"
" कौन-सा घोषणा-पत्र और क्या रजिस्ट्रेशन करवाया ?" अब सागर की जिज्ञासा और बढ़ी ।
"जिसे सुनकर तुम विचलित भी हो सकते हो । जो थोड़ा परंपरा और संस्कार के खिलाफ भी है ।"
" क्या पहेलियाँ बुझा रहे हैं । परंपरा , संस्कार मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा । ज़रा साफ-साफ बताइए ।"
" तो सुनो , मैंने बरसों पहले देह दान का निर्णय लिया था । मरणोपरांत मेरा दाह-संस्कार मत करना बल्कि मेरी देह मेडिकल कॉलेज जाएगी । हज़ारों विद्यार्थियों को मेरी देह से लाभ होगा । घोषणा-पत्र भर आया और देह को रजिस्टर्ड करवा आया ।" अब सागर पिता के दुस्साहस के आगे नतमस्तक था ।
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(5). डॉ विजय शंकर जी 
प्रवाह के विपरीत

उसकी नई नई नौकरी थी , अभी एक सप्ताह भी नहीं हुआ था कि ऑफिस के सारे रंग-ढंग उसे समझ में आने लगे। सेवा भाव तो कहीं दूर-दूर तक उसे नज़र नहीं आया। हाँ , अपनी अपनी मेवा बनाने में सब लगे रहते थे। बड़े जतन , बड़े परिश्रम और बड़े-बड़े तिकड़म , सब किये जाते। कहीं किसी से न कोई डर , न किसी से कोई कुछ छुपाव। जैसे , सब देख कर भी हर कोई दूसरे के मामले में बिलकुल अंजान बना रहता है। सुना था , लोग सरकारी पैसे का हेर-फेर करते हैं पर यहां तो पूरे का पूरा खेल साफ़ है। वह बैठा बैठा सब सोच रहा था कि अचानक उसे अपने चाचा के मित्र का ख्याल आया , जो इसी कार्यालय में कुछ उच्च पद पर हैं। उसने निर्णय किया आज घर जाने से पहले उनसे जरूर बात करेगा। शाम भीड़ कम होने पर वह उनके कक्ष में गया और जो कुछ देख रहा था सब उन्हें साफ़ साफ़ बता दिया कि क्या कुछ कैसे कैसे होता है , जैसे कहीं किसी को किसी का लेश-मात्र भी डर नहीं। कोई यह भी नहीं सोचता कि कहीं कोई उसकी शिकायत न कर दे। उनके चेहरे पर कहीं कोई भाव नहीं आये , वरन , असीम शांत भाव से उन्होंने बताया कि ये सब एक ही धारा में बहने वाले लोग हैं , सब एक से , एक प्रवाह में बह रहे हैं। साथ बहने वालों में कोई किसी के लिए बाधा नहीं बनता , बल्कि अपने अपने बहने में लगा रहता है। कोई आपस में टकराव नहीं होता क्योंकि बहाव ही सबको बहा रहा है। एक पारस्परिक भय मुक्त व्यवस्था बन जाती है। हाँ कठिनाई तब आती है जब इस धारा - प्रवाह में कोई बहाव के विपरीत चलने का साहस करता है।
" कैसी कठिनाई " वह पूछ बैठा।
" कोई ख़ास नहीं , सब मिल कर उसे बहाव में बहने को बाध्य करते हैं और यदि वह नहीं मानता तो उसे रास्ते से हटा भी देते हैं।"
उनके उत्तर से वह अंदर तक सहम गया , फिर भी पूछ बैठा , " मतलब " ?
" मतलब कुछ ख़ास नहीं , उसका ट्रांसफर कहीं दूर करवा देते है , नहीं तो उसे कहीं फंसा देते हैं। वह अपने आप धारा में आ जाता है " .
वह चुपचाप आकर अपनी सीट पर बैठ गया।
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(6). सुश्री अर्चना त्रिपाठी जी 
 योग्यता का पैमाना 

" सही ही कहा हैं बुजुर्गो ने! औरतों को शादी ब्याह के मामले में सामने लाना ही नहीं चाहिए।ये सदा उल्टी गंगा ही बहाती हैं जबकि इन मामलों में कुछ-ना- कुछ झूठ बोलना ही पड़ता हैं।"शांति के पति ने झल्लाते हुए कहा
शांति रोती बिसूरती दूसरे कमरे में चली गयी।सारा वाकया पुनः उनकी आँखों में चलचित्र की भाँति चलने लगा :
लड़की वाले गोदभराई और विवाह की तिथि तय करने नियत समय पर आ गए थे।हँसी ठहाकों के मध्य शांति ने गंभीर स्वर में कुछ कहना चाहा।सर्वत्र सन्नाटा छा गया।पतिदेव शांति को आँख तरेरने लगे।बात सँभालने की दृष्टि से लड़की के पिता मनोहर जी कह उठे :
" अरे !साहब कहने दीजिये।इनके भी तो कुछ अरमान होंगे आखिर वे हैं तो एक सफल बेटे की माँ "
कुछ रुककर पुनः कह उठे ," फिक्र ना कीजिये इस सूचि के अतिरिक्त कोई और मांग हो तो बेझिझक बता दीजिये।"
लड़खड़ाती आवाज में शांति कहने लगी, " मेरी कोई मांग नहीं हैं ,मैं मात्र एक बात आपको बताना चाहती हूँ।"
" हाँ हाँ कहिये " बेचैन मनोहर जी ने उनका हौसला बढ़ाया
" मेरे बेटे को एक बार बचपन में और अभी दो साल पहले मिर्गी का दौरा पड़ चूका हैं जिसकी दवा अभी लगातार तीन साल और चलेगी।"
अब तक चहकने वाले मनोहर जी की काटो तो खून नहीं वाली स्थिति हो गयी और सोचने के लिये समय मांग वे चले गए।
शांति अपने से ही बड़बड़ा रही थी ,"क्या इसी बात से मेरा बेटा अयोग्य हो गया?"
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(7). डॉ टी आर सुकुल जी  
नारी
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‘‘ दीदी ! मैं आपके दरवाजे पर घण्टी बजाने के पहले जो कुछ सुन पा रहा था क्या वह रोज ही होता है ?‘‘
‘‘ क्या हुआ? मुझे तो कुछ नहीं पता‘‘
‘‘ क्यों झूठ बोलती हो ? अभी अभी आपकी मदर- इन- ला आप पर कितना बरस रहीं थीं और आपने एक शब्द भी नहीं बोला?‘‘
‘‘ अरे, वह तो यों ही बोलती रहती हैं, उनका यही स्वभाव है, उन्हें जवाब देने का किसी में साहस नहीं ।‘‘
‘‘ तो तुम पिछले तीन साल से इस प्रकार की मानसिक प्रताड़ना झेल रही हो और हम लोगों को कभी नहीं बताया? जानती हो, यह घरेलू हिंसा कहलाती है और इस पर सरकार ने कड़े कानून बना रखे हैं? जीजा जी तो खुद पुलिस अफसर हैं इतना तो जानते ही होंगे?‘‘
‘‘ अवश्य जानते हैं, परन्तु वे इतने मातृभक्त हैं कि उनके कहने से एक पैर पर दिनभर खड़े रह सकते हैं ‘‘
‘‘ अच्छा, तो अब हमें ही कुछ उपाय करना पड़ेगा, आखिर चार भाइयों की इकलौती बहिन हो, तुम्हें इस प्रकार से गुलामों जैसी जिंदगी नहीं जीने देंगे, चलो आज ही मेरे साथ, मैं तुम्हें लेने ही आया हॅूं।‘‘
‘‘ नहीं भैया। तुम वकील हो, कानून जानते हो अतः तुम जो कह रहे हो वह उचित है। लेकिन मैंने अपने बाबा के पास बैठ कर मनोविज्ञान के कुछ सूत्र सीखे हैं जिनमें एक सूत्र यह है कि क्रोध को अक्रोध से जीता जा सकता है। मैं उसी का प्रयोग कर शाॅंत रहती हॅूं‘‘
‘‘ तुम सूत्र कहो या शस्त्र, तीन साल से तो इसको प्रयोग में ला ही रही हो और स्थिति ज्यों की त्यों है । अब तो भाइयों का एक ही अस्त्र आजमा कर देखो, चार दिन में ही सब सरेंडर हो जाऐंगे, आखिर हम किसी से कम हैं क्या?‘‘
‘‘ भैया ! यह बताओ, जो लोग मानसिक रूपसे बीमार होते हैं, उनको दवा देना चाहिए या सजा ?‘‘
‘‘ अरे ! तो उन्हें मनोचिकित्सालय में भरती क्यों नहीं करते ? मेरी बहिन ने ही उनकी गुलामी करने का ठेका ले रखा है ? चलो मेरे साथ, अब यहाॅं मैं एक पल भी तुम्हें नहीं रहने दूंगा।
‘‘ ठीक है, कब तक रहॅूंगी वहाॅं ? ‘‘
‘‘ आजीवन रहो, हमारे पास क्या कमी है ? ‘‘
‘‘ क्या तुमने इस धरती पर बिना पहिए का कोई वाहन चलते देखा है ? अथवा क्या बिना तार की वीणा बजते देखी है ?‘‘
‘‘नहीं‘‘
‘‘ तो बिना पति के नारी की कल्पना कैसे की जा सकती है ? तुम निश्चिन्त रहो मुझे कोई कष्ट नहीं है। ‘‘
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(8). श्री सुनील वर्मा जी  
माटी का गुल्लक..लोहे के सिक्के


शादी के इतने सालों बाद भी दोनों में अक्सर किसी बात को लेकर तकरार हो जाती थी। आज फिर अबोलापन ओढे दोनों किसी काम से बाजार जा रहे थे। रास्ते में उनसे आगे चल रही कार द्वारा सहसा ब्रेक लगा लेने के कारण उनका स्कूटर उसे छू भर गया। नतीजतन कार सवार लड़के ने पीछे आकर अपनी कार पर नजर डाली।
हल्की सी एक खरोंच देखकर उसने स्कूटर पर बैठे आदमी से गुस्से में कहा "ओये अंकल..देख कर चला न। अपने बाप की सड़क समझ कर स्कूटर चला रहा है क्या ?"
"मगर बेटा, ब्रेक तो तुमने अचानक से लगाये थे।" आदमी ने सफाई दी।
"तो...इसका मतलब तू पीछे से ठोक देगा। बुढ्ढा है इसलिए लिहाज कर रहा हूँ वरना.."
"वरना क्या..?" अब तक स्कूटर पर चुप बैठी औरत ने जवाब में प्रतिप्रश्न किया।
अपनी पत्नी को शांत रहने का इशारा करते हुए आदमी ने लड़के से कहा "कम से कम बात तो तमीज से करो बेटा। हल्की सी खरोँच ही तो है।"
आदमी का शांत स्वभाव देखकर लड़का और अधिक हावी होते हुए बोला "हल्की सी खरोँच..! बुढापे में क्यों अपनी पसलियाँ तुड़वाना चाहते हो अंकल ?"
शर्ट की बाहें चढाता हुआ वह आगे बढ़ा ही था कि स्कूटर के पीछे से उतरकर औरत लड़के के सामने आ खड़ी हुई और उससे भी कुछ अधिक आवेशित स्वर में बोली "तू हाथ तो लगाकर देख। तोड़ न दूँ तो कहना.."
अप्रत्याशित जवाब सुनकर लड़का सकपकाया। अब तक जमा हो चुकी भीड़ में भी उन दोनों का पक्ष बढ़ता देख उसने कार स्टार्ट की और वहाँ से चुपचाप निकल गया।
औरत ने वापस मुड़कर आदमी को देखा और स्कूटर पर बैठते हुए बड़बड़ाई "इतना सुनने की क्या जरूरत थी ? एक थप्पड़ न रख देते खीँच के..
तमाशा अधूरा रह जाने का मलाल करते हुए छँट रही भीड़ में से एक ने कहा "कमाल है यार..वह आदमी होकर चुपचाप सुनता रहा और उस औरत को देखो तो।"
दूसरे ने उसे मुस्कुराते हुए जवाब दिया "लोग यूँ ही थोड़े कहते हैं कि जोड़ियाँ ऊपर से बनकर आती हैं।"
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(9). श्री तसदीक़ अहमद खान जी 
बदलती सोच
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ता करन शर्मा टी वी के सामने बैठ कर विधान सभा के नतीजे देख कर इस लिए मन ही मन मुस्करा रहे हैं क्यूँ कि वो अपने प्रतिद्वंदी अर्जुन से दूसरे राउंड में आगे चल रहे हैं | उनकी बेटी ने चाय का कप पिता जी के हाथ में देते हुए कहा:
"आपने हर बार की तरह इस बार भी लोगों में ज़ात पात और धार्मिक भावनाएँ भड़का कर, दहशत फैला कर वोट माँगे हैं मगर दूसरी तरफ अर्जुन ने बे रोज़गारी ,भ्रष्टाचार ,विकास और क़ानून ब्यवस्था के मुद्दे पर , आपको क्या लगता है "
नेता जी फ़ौरन बोल पड़े:
"मैं अपने मुद्दे पर पिछले चार चुनाव जीत चुका हूँ यह नया लड़का मेरा क्या मुक़ाबला करेगा "
बेटी ने फिर कहा:
"इस बार वोटिंग बहुत ज़्यादा हुई है "
बेटी अपनी पूरी करती उस से पहले नेता जी के माथे पर अचानक पसीना आ गया , वो चौथे राउंड में अर्जुन के बराबर आ गये थे |
बेटी ने दिलासा देते हुए कहा "लगता है इस चुनाव में दो दिशाओं और विचार धाराओं की लड़ाई है ,अभी चार राउंड फ़ैसला होने में बाक़ी हैं "
घर में आपस में चर्चा चलते चलते यक बयक खामोशी छा गयी ,नेता जी ने चुपचाप कुर्सी से उठ कर अपना फोन आफ कर लिया और अपने कमरे में चले गयेI
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(10). श्री तेजवीर सिंह जी
 सुनहरी भोर

"बड़े भैया प्रणाम, यह क्या हो रहा है आपके घर में"।
"अरे कुसमा बहिन, तुम कब आंई"।
"वह सब छोड़िये, आप शेर की तरह दहाड़ने वाले इंसान, गीदड़ कैसे बन गये"।
"अरे ऐसा कुछ नहीं है। आजकल  के लड़के चार किताब क्या पढ़ लेते है, माँ बाप की बात सुनी अनसुनी कर देते हैं"।
"तो लगाइये चार जूते और निकाल बाहर कीजिये"।
"अरे, तुम यह कैसी भाषा बोलने लगी हो, यह सब ठीक नहीं लगता तुम्हारे मुंह से"।
"हमको मुद्दे से मत भटकाइये, हमारी बात का जवाब दीजिये"।
"कुसमा, तुम जानती हो ,इकलौता लड़का है, पढ़ा लिखा इंजीनियर है,खाता कमाता है।जोर जबरदस्ती से नहीं मानेगा"।
"तो क्या करेगा"।
"तुम्हें याद नहीं, विनोद बाबू का लड़का ज़रा सी डाँट डपटपर रेल गाड़ी से कट गया था"।
"भैया, ऐसी औलाद किस काम की, जिसकी वज़ह से माँ बाप को बार बार ज़लील होना पड़े"।
"कुसमा, तुम भी, तिल का ताड़ बना देती हो"।
"वाह भैया, यह खूब कही, पहले तो वह अपनी मर्ज़ी से लव मैरिज कर लिया।डोनेशन देकर इंजीनियरिंग करायी | लाखों के दहेज की उम्मीद थी, वह सब तो गया, भाड़ चूल्हे में ।और अब यह एक नया नाटक"।
"अब जाने भी दो कुसमा, तुम क्यों दिल छोटा करती हो"।
"कैसे जाने दें, हमारे घर में उलटी गंगा बहे और हम चुप चाप देखते रहें, हमने तो ऐसा न कभी देखा और न कभी सुना"।
"अब बेटे ने बहू से वादा कर लिया है तो मानना ही पड़ेगा "।
"पर इतना बड़ा फ़ैसला,अकेले, अपनी मर्ज़ी से, इसके पीछे कोई  वज़ह तो बताई होगी"।
"हाँ, बच्चू कह रहा था कि बहू के पिता को लक़वा मार गया है। उसका छोटा भाई अभी पढ़ रहा है।इसलिये बहू की पगार उसके मायके भेजी जाया करेगी
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(11). श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय जी 
परम्परा

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'यह असंभव है. हमारे यहां ऐसा नही होता है,'' उस के ताऊजी ने जम कर विरोध किया.
'' तुम्हारी मां और तुम जो चाहे जो करो, हमें कोई ऐतराज नहीं है. मगर,  यह नया रिवाज यहाँ नहीं चल सकता  है,''  काका ने भी अपना आदेश सुना दिया.
'' क्यों नहीं चला सकता है. जब हमारा समाज में ‘कन्यादान’ हो सकता है तो ‘पुत्रदान’ क्यों नहीं हो सकता हैं ?''
'' यह हमारी परंपरा के खिलाफ है. हम ऐसा नहीं होने देंगे.'' ताऊजी ने काका के सुर में सुर मिलाए ताकि विधवा के मरने के बाद सारी जायदाद उन की हो सके.
'' यह मेरी मां के जीवन सवाल है. हम जैसा चाहे वैसा कर सकती हैं .'' रीना ने प्रतिरोध किया तो ताऊजी दबंगाई से बोले,  '' कभी अपनी मां से पूछा है. वह ऐसा करना चाहती है या नहीं ?'' जैसे उन की बात खत्म हुई कि मां आ गर्इ्, '' तुम्हारे ताऊजी ठीक कह रहे हैं. मैं ऐसा हरगिज नहीं करूंगी.''
'' हां मां ! मुझे पता है. आप ऐसा क्यों कह रही हो, क्यों कि आप अपनी होने वाली दुर्दशा नहीं देख सकती है. मगर मैं देख रही हूँ इसलिए आप से कह रही है कि आप यह शादी कर ले.''
फिर माँ को चुपचाप देख कर  रीना बोली , '' मां ! आप जवानी में नानाजी के डर से अपने प्रेम का इजहार नहीं कर सकी. मगर,  अब जब पापा ही नहीं रहे हैं तब आप अपने प्रेम को इजहार करने से क्यों डर रही है ?''
'' समाज क्या कहेगा ?  यह तो सोचो बेटी ?''मां ने बड़ी मुश्किल से इतना ही कहा.
'' मां ! हमें उस की परवाह करना चाहिए जो हमारी परवाह करता है. फिर हमारे नए पापा, खुद शादी कर की इस नई परंपरा ‘पुत्रदान’ को निभा कर हमारे घर आने को तैयार है.''
यह सुन कर मां धम्म से जमीन पर बैठ गर्इ् और धीरे से बोली,'' बेटी ! मुझ में धारा के विपरीत बहने की ताकत न पहले थी और न अब है.''
यह सुन कर रीना ने माँ को हौसला बढ़ाना चाहा , “ माँ ! किसी को तो परम्परा बदलने के लिए हिम्मत व जोश दिखाना ही पड़ेगा ना .” और माँ उन की बात को सुन कर विचारमग्न हो गई कि क्या निर्णय लूं ?

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(12). सुश्री अपराजिता जी 
तूफान

अमावस की कालिमा आज कुछ अधिक गहरी थी। स्थीर हवा मे अजब सी उमस .. नितांत खामोशी मानो किसी तूफान का दस्तक ...झोपड़ी के बाहर हल्की रौशनी मे कुछ लोग औंधे कुर्सियों पर झपकी ले रहे थे । मगर कोई था जो बार बार पहलू बदल रहा था ...
लुक्का सेठ ! देसी शराब के ठेके का बेताज बादशाह , आस - पास के दस गांवो मे उसके अड्डे चलते थे । महुआ लाहन से बनी कच्ची , गांव की आधी बेरोजगार आधी बेगार आबादी को मदहोश बनाए रखती थी । दिहाड़ी की कमाई शाम होते हीं लुक्का की झोली मे आ गिरती।
पिछले साल जहरीली शराब ने कितने घरों के चराग बुझा दिये लेकिन लुक्का पर आंच न आई । उसके खिलाफ बोले भी कौन ? मर्दो की बुद्धि तो उसने पहले ही गिरवी रख ली थी । थाना , जमादार , छुटभइये नेता सब उसकी जेब मे ।
' फिर ये कौन है जो लगातार मात दिये जा रहा है ? ' बेचैनी से पहलू बदलते लुक्का का चेहरा तन गया । कुछ महीनों से एक गुट उसके अड्डेे पर हमला कर के पूरी शराब बर्बाद कर महुआ लाहन जला देता । कुल आठ दस की टोली थी जो आंधी सी आती और तूफान सी गायब ।
मगर आज उसने वो जाल बुना है कि सब फंसे ही फंसे ..सोंच कर उसके भद्दे होंठ कनपट्टियो तक खींच गये । दूसरे गांव के अड्डे पर शराब का भारी जखीरा है ऐसी अफवाह फैला कर उसने वहाँ अपने सभी लठैतों को भेज दिया था । टोली के खात्मे का साफ फरमान देकर । खुद भी वहां जाना चाहता था लेकिन यहाँ असल जखीरे की रखवाली जरूरी थी । वो निश्चिंत था कि इधर कोई नही आएगा ।
तभी अचानक झोपड़े से आग की लपटें उठने लगीं । वो हड़बड़ाया सा अपने गुर्गों को चीखता आवाज देता अपनी दोनाली संभाले भागा । दूर आठ दस परछाइयां नहर की तरफ भागती दिखीं
..उसने निशाना लगाया , अंधेरे में एक आकृति डगमगा कर गिरी । लुक्का उस पर झपटा मगर हाथ मे उसकी पगड़ी आ गयी । पगड़ी खींचते हीं लहराते बाल खुल गये और दर्द से कराहती आकृति पलटी । लुक्का की आँखे आश्चर्य से फट गयीं ।
" तू ? " सामने खुले बाल और लाल आँखें लिए साक्षात कालिका बनी रमुआ की बीवी थी , जो जहरीली शराब कांड मे ग्रास बन गया था ।
" तो ये सब तेरी करामात ..." आगे के शब्द हलक मे हीं रह गये लुक्का के ...बिजली सी पलट कर दरांती से उसकी अंतड़िया खंगालती वो नहर मे कूद गयी
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(13). श्री सुधीर द्विवेदी  
नूरजहाँ

"क्या हुआ? आज़ नूरजहाँ बेनूर क्यूँ है? मनोज़ ने आदतन अपनी भाभी से चुहल की। पर हर बार के उलट भाभी ने आज़ कोई करारा ज़वाब नहीं दिया। बस उनकी मोटी-मोटी आँखें छलछला आईं। "हाँ आती हूँ...' वे एकायक बोलीं जैसे उन्हें किसी ने पुकारा हो, और आगे बढ़ गईं। मनोज़ ने उन्हें इस तरह कतराते हुए पहली बार देखा था, नहीं तो भाभी उसकी चुहल का जवाब देने से आज़ तक नहीं चूकीं।
छोटी बहन की शादी के कारण घर में जश्न का माहौल था। चारों तरफ़ हँसी-खिलखिलाहट बिखरी हुई थी। भाभी भी पूरे उत्साह से तैयारियो को मुक्कमल अंजाम पर पहुँचा रही थीं। अपनें इन्ही गुणों के बलबूते उन्होंने ख़ुद को अच्छी पत्नी, एक क़ाबिल बहू और अपने ननद-देवरों की पसंदीदा भाभी के रूप में साबित किया था। पूरे घर में रौशनी सी बिखरी रहती थी ,उनके होने से। शायद इसीलिए मनोज़ उन्हें नूरजहाँ पुकारता है।
बस जब मनोज़ उनसे ऊंट-पटाँग चुहल करता तो वे खिसिया जातीं और माक़ूल ज़वाब से उसकी बखिया उधेड़ देतीं। पर मनोज़.. अपनी आदत से बाज़ न आता।
आज़ 'पहरावन' की रस्म निभाने का दिन था। मामा -मामी माँ के लिये बनारसी साड़ी, और बाबा के लिए उनकी पसन्द का भागलपुरी सिल्क का कपड़ा लाए थे। माँ के लिए तो उनके भाई-भावज की आमद ही सब कुछ थी। पर रस्म निभाने के बाद वे वहां बैठी महिलाओं को उनके द्वारा लाई गई बनारसी साड़ी को इतराते हुए दिखाना नहीं भूलीं थीं। और बाबू जी! उन्हें कपड़े का रंग कम पसन्द था,पर माँ के आगे वे कुछ कह नहीं पा रहे थे। अनमने से अपनी आरामकुर्सी पर चाय सुड़कते वे कुछ बड़बड़ाते जा रहे थे।
भाभी के इस रवैये से मनोज़ परेशान हो उठा। इस समय माँ से कुछ पूछना उसे उचित नहीं लगा। वह बहन के पास जा पहुंचा। " बिंदिया ! यह नूरजहाँ आज़ कुछ उदास क्यों हैं?" बाहर आँगन में रिश्तेदारों को चाय परोसती भाभी के उदास चेहरे को टटोलते हुए उसने अलमारी में कुछ तलाशती हुई अपनी बहन से सवाल किया। " भाई ! आज़ 'पहरावन' की रस्म का दिन है। आज के दिन हर बहन यह चाहती है कि उसका भाई उसके ससुराल में मौजूद हो ! पर भाभी का तो कोई भाई ही नहीं..." कहते हुए बिंदिया जैसे ही पलटी मनोज़ वहाँ नहीं था।
" बहू ! तुम्हे 'पहरावन' की रस्म नहीं पूरी करनीं! चलो जल्दी करो।" बूढ़ी बुआ ने कपड़े तह करती भाभी के हाथ से कपड़े छुड़वाये और लगभग घसीटते हुए उन्हें मंडप की ओर ले चलीं। "पर बुआ...आप तो जानती है न कि मेरा कोई भाई..." बोलते हुए भाभी का गला रुंध आया।
बुआ मुस्कुराईं और ऊँगली से मंडप की ओर इशारा कर दिया। "मैं हूँ न!" कहता हुआ मनोज़ हाथ में साड़ियों के कई पैकेट समेटे मंडप के नीचे खड़ा मुस्कुरा रहा था। भाभी की आँखों की कोरें छलक उठीं। सहमति में सिर हिलाकर आँखों की कोरे पोंछती हुई वे मंडप में आ खड़ी हुईं।
" रस्म अदायगी के लिए भाभी के सिर पर साड़ी रखते हुए मनोज़ उनके कान में फुसफुसाया " भइया का भाई तो मैं जन्म से ही हूँ, तो सोचा आपका भाई भी बन जाऊं। जस्ट फॉर चेन्ज ।" भाभी रुंधे गले से कुछ कह न पाई बस स्नेह से उन्होंने मनोज का सिर सहला दिया। "पर सिर्फ आज़ भर के लिए ही...कल से फ़िर आप मेरी नूरजहाँ और मैं आपका..." मनोज़ अपनी शरारतें फ़िर शुरू कर पाता इससे पहले भाभी ने वही साड़ी का पैकेट पकड़ा और मनोज़ की पीठ पर हौले से दे मारा। घर का जर्रा-जर्रा भाभी-देवर की खिलखिलाहट के नूर से एक बार फ़िर से जगमगा उठा।
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(14). सुश्री राजेश कुमारी जी  
‘पट्टी’
 
रघु के फ़ौज  में जाने के बाद घर  में उसकी पुरानी मोटरसाइकिल को चालू व् फिट रखने के लिए हर तीसरे दिन उसमे किक मारकर स्टार्ट करने की ड्यूटी छोटी बहन रानो  बखूबी निभा रही थी|
एक दिन उसके पिता गिरिजा ने देख ही  लिया की वो उसपर बैठकर पीछे घेर में  एक चक्कर भी लगा आई  पिता ने हैरत में पूछा
“तूने कब सीख ली बेटी ”?
“भैया ने  एक दो बार सिखाई थी बाबू जी ” रानो ने कुछ डरते हुए कहा |
“क्या बाबू जी  मैं अच्छी तरह सीख लूँ चलाना”? बाबा के चेहरे पर  गर्वित मुस्कान देख कर रानो को पूछने की हिम्मत हुई, बाबा ने  ख़ुशी से हामी भर दी |
किन्तु इस गाँव में हंगामा न खड़ा हो जाए इस बात को लेकर उसके माथे पर चिंता की लकीरें भी उभर आई एक तो छोटी जात  फिर गाँव में जाटों का बोलबाला तो चिंता होना स्वाभाविक था |किन्तु फिर भी गिरिजा ने बेटी को मना नहीं किया| .
अब रानो रोज गाँव के  एक खाली मैदान में प्रैक्टिस  करने लगी जैसे ही गाँव के प्रधान को भनक लगी लाख दलीलें देने के बाद भी उसने अच्छी खासी खरी खोटी सुनाई  गिरिजा को तथा बेटी  को अनुशासन में रखने की हिदायत दी| माँ के मना करने के बाद भी गिरिजा की बेटी ने प्रैक्टिस बंद नहीं की  तो प्रधान ने परिणाम भुगतने की चेतावनी तक दे डाली|
पत्नी की खरी खोटी भी सिर पर हथौड़े की तरह सहन करनी पड़ी|
पूरे गाँव वालों को मुनादी करके इकट्ठा होने को कहा गया| ‘आप दोनों बाप बेटी को इसी वक़्त पंचायत में हाजिर होने का फरमान ज़ारी किया जाता है’ ये लिखा हुआ पर्चा  काँपते हाथ में  ज्यों ही हवा से फड़फड़ाया गिरिजा अचानक वर्तमान में लौट आया माथे पर पसीना आ गया बेटी प्रैक्टिस के काफी देर बात भी अभी तक नही लौटी थी|
पंच व गाँव वाले पूछ रहे थे “तेरी बेटी क्यों नहीं आई गिरिजा”? प्रधान  चौधरी का गुस्सा सातवें आसमान पर था|
“आती हो होगी चौधरी जी थोड़ा इन्तजार और कर लेते” हाथ जोडकर विनती करते हुए गिरिजा बोला|
पंचों व गाँव  वालो के सब्र का बाँध टूटा जा रहा था  इतनी ही देर में मोटरसाइकिल की गड़गड़ाहट सुनी तो सबका ध्यान उधर गया  |
रानो के पीछे एक लड़का प्रधान के छोटे पोते  को गोदी में लेकर बैठा था उसके सिर व् आँख पर पट्टी बंधी थी |
लड़का बोला “ताऊ जी छोटे को मेरी क्रिकेट की बॉल लग गई थी बहुत खून बह  रहा था हमारे कहने से रानो   दीदी तुरंत डॉक्टर  के पास ले गई डॉक्टर  ने कहा देर हो जाती तो छोटे की आँख चली जाती”|      
सुनते ही  प्रधान की आँखें छलछला गई वो हाथ जोड़ते हुए बोला “मेरे पोते  की आँख पर पट्टी करवा कर बेटी तूने हमारी आँखों पर बंधी पट्टी खोल दी  तू तो हमारे गाँव की शान है कल से और छोरियों को भी तू  बाइक चलाना सिखाएगी”|
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(15). सुश्री अर्पणा शर्मा जी 
पवित्र बंधन

"दिमाग खराब होगया है तेरा!!", क्रोध में तमतमाए प्रबोध कुमार गरजे,"क्या इसी दिन के लिए तुझे विदेश में उच्च शिक्षा दिलाई थी कि तू पूरे शहर में खानदान की नाक कटा दे!"
पूरे परिवार के सदस्य वहीं एकत्रित क्रोध से भरे हुए थे।
निहार शांत भाव से बोला - "परंतु पिताजी शिक्षा का तो उद्देश्य ही यही है कि हम समाज में व्याप्त कुरीतियों, गलत परंपराओं को तोड़कर नई शुरुआत करें। स्वर्णा भी उच्च शिक्षा प्राप्त संभ्रांत घर की बेटी है। वह मेरे लिए पूरी तरह पवित्र है और मैं उसी से विवाह करूँगा । "
वह अपने निर्णय पर पूर्णतः दृढ़ था।
" जा-जा बड़ा आया, नई शुरुआत करने वाला। क्रांति लाना चाहता है। क्या समाज सुधारने का ठेका हमने ही लिया हुआ है?? खबरदार , मैं सड़क की गंदगी को घर नहीं लाने दूंगा। वरना हमसे तेरा रिश्ता हमेशा के लिए खत्म समझ", प्रबोध कुमार क्रोध में मुठ्ठी भींच रहे थे। यूँ लग रहा कि बस निहार पर हाथ उठाने की देर है।
"नहीं पिताजी, मैं अपना निर्णय कदापि नहीं बदल सकता।",
निहार ने उसी शांत स्वर में परंतु सुदृढ़ता से उत्तर दिया,"मैं केवल इसलिए स्वर्णा को नहीं त्याग सकता कि वह कुछ गुंड़ों के सामूहिक बलात्कार का शिकार होगई थी।"
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(16). श्री शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी  
'बड़े पेट के लोग'

"पंडित जी, अब हमारी बिटिया उस घर में नहीं जाएगी, वह हम पर कोई भारी भी नहीं है!" तिवारी जी ने मायके में ही रह रही अपनी बेटी से चर्चा करने के बाद अपना अंतिम फैसला लेते हुए कहा।
"ठीक है कि आपकी लाड़ली बेटी उच्च शिक्षित है; नौकरी भी कर सकती है यहाँ रहकर! लेकिन ग़लती पर आप और बिटिया ही हैं, न तो लड़के वाले ग़लती पर हैं और न ही दामाद साहब! वे बड़े ही भले लोग हैं!" परिवार के पंडित जी ने पुनः समझाते हुए कहा।
"आप सही कह रहे हैं या ग़लत, पता नहीं, लेकिन वे न तो हमारे हिसाब के निकले और न ही हमारी बिटिया के हिसाब के! हम ज़माने के साथ चलने वाले लोग हैं!" तिवारी जी ने उग्र और व्यंगात्मक लहज़े में कहा- "हाथी के दांत खाने के कुछ और दिखाने के कुछ और होते हैं, हम उन इन्जीनियर साहब के बारे में ऐसा ही समझे थे! लेकिन वे तो सचमुच पूरे ईमानदार, आदर्शवादी और धार्मिक टाइप के ही निकले और उनका लाड़ला बेटा उनसे भी बढ़कर!"
यह सुनकर पंडित जी सोफे से उठकर बोले- "हर कोई आप जैसा ही थोड़े न होगा! दरअसल आप बड़े पेट के लोग हैं और वे छोटे पेट के लोग!"
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(17). श्री महेंद्र कुमार जी
ठहरी हुई लहरें

यशोधरा ने दृढ़ निश्चय कर लिया था कि आज वह यह करके ही रहेगी।
खिड़की के पास खड़ी होकर वह बहुत देर से आसमान की ओर देख रही थी। "परमेश्वर को कैसे देखा जा सकता है पिता जी?" उसे वह प्रश्न याद आया जिसके उत्तर ने उसे कभी सन्तुष्ट नहीं किया। "उसे देखा नहीं महसूस किया जाता है।"
रोज की तरह आज भी उसके मन में ढेरों प्रश्न उमड़ रहे थे। जैसे हम मरते हैं तो कहाँ जाते हैं? कहीं जाते भी हैं या नहीं? क्या आत्मा जैसी कोई चीज होती है? होती है तो कैसी होती है? जीवन का लक्ष्य क्या है? सुख प्राप्त करना? या कि मोक्ष?
उसने मुड़कर कमरे में लगे बिस्तर की तरफ़ देखा। बेटे राहुल का हाथ खर्राटे ले रहे पिता गौतम के सीने पर था। दोनों गहरी निद्रा में थे। वह आगे बढ़कर उनके पास गयी और थोड़ी देर तक वहीं खड़ी रही। फिर धीरे से कहा:
"मैं सत्य की खोज में जा रही हूँ।" और घर छोड़ कर चली गयी।
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(18). श्री मोहन बेगोवाल जी 
मिथ से हकीकत

उम्र भर मैनें वैसी ही जिंदगी बिताई जैसी मेरे घर की दुनिया और समाज ने चाही थी । मगर आज मैं बेड पर लेटे हुए ये सोच रहा था कि मुझे क्या ऐसे ही जीना चाहिए था ।  बचपन में  जिस तरह की कहानियाँ मैनें सुन रखी थी उन्हें मैं अपनी जिंदगी का हिस्सा बना कर ही जिंदगी जी रहा था ।
और साथ ही जैसा घर का माहौल था जिंदगी के बारे यही सुना था कि जिंदगी चलाने वाला कोई और है, मगर मैं कभी मिला नहीं,  शायद कोई भी नहीं मिला उसे ।
मगर आज जिस हालत में मुझे हस्पताल में दखल कराया गया था ।  मेरी हालत के बारे सभी घर वाले भी  चिंतत थे और उनके चेहरे भी मुरझाए हुए थे । मेरी हालत मुझे खुद भी बहुत सिरियस लग रही थी साँस लेने मैं बहुत तकलीफ हो  रही थी ।
मेरे घर वालों को डाक्टर के कहे पर भी यकीन नहीं हो रहा था, और मुझको भी  खुद पे यकीन नहीं आ रहा था ।
मैं  सोच रहा था  "बस अब ......!" ।
मगर आज  सुबह जब मेरी जाग खुली तो मेरे  इर्द गिर्द का माहौल बदला हुआ था । मुझको अभी भी खुद पर यकीन नहीं आ रहा था, मगर नई जिंदगी की शुरुआत हो चुकी थी ।
जब डाक्टर  ने मुझे कहा, “अब तुम खुद शौचालय  जा सकते हो, तब मेरे मुँह से अचानक ही निकला, "सच"
तब मुझे लगा कि जैसे किसी  मिथ ने  हकीकत की जिंदगी की तरफ सफर कर लिया हो ।  
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(19). श्री मनन कुमार सिंह जी  
आठवीं फेल
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-देख शीतल,मैं अंकों में हेर फेर नहीं कर सकता।
-काका,गाँव की बात है।ससुरा शीला फेल होगा,तो शिकायत होगी', शीतल बोला।
-नंबर लिखने के मिलते हैं,गाँव-जवार के नहीं', मधुप ने झिड़की दी।
-पर कुछ तो सोचना पड़ेगा न।सुमी को आपने पास कर दिया।
-अरे बुड़बक उसने लिखा था पास होने लायक।गलतियों के नम्बर उसके भी कटे हैं।
-सब लोग कह रहे है, गाँव-घर के आदमी से उम्मीद तो रहती ही है न।
- कौन कहें कि यह बोर्ड की परीक्षा है।अभी समय है तीन साल।ठीक से पढ़ेगा,तो मैट्रिक में अच्छा करेगा अपना शीला।
-तो क्या कहते हैं आप?कुछ नहीं करेंगे?
-अब देखो हेडमास्टर साहेब के चेलवा की भी हवा खराब है।आठ का पाठ उसे भी शायद फिर से पढ़ना पड़े।कुल अठाइस नंबर हैं,बस।अब तुम्हें बता रहा हूँ।मुँह बंद ही रखना।
-आपकी हलवाही में जो निकल जाये,वही बैल।बाकी तो समझिये पड़ुआ।
-भरोसा करके न मुझे यह काम सौंपा गया है।वरना नवीं का विद्यार्थी क्या खाकर आठवीं की उत्तर पुस्तिका जाँचेगा?
-भइल गोबड़वन के बँटाधार।
-भइये, जइसा लेख,वइसा शेष।
और शीला आठवीं फेल हो गया।
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(20). सुश्री नीता कसार जी 
"बहाव"

"फिर क्या सोचा है? बेला,कुछ तो सोचा होगा" ।
"यही शादी और मैं रानी अपने पिया के घर की" कहते हुये बेला के गाल गुलाबी हो गये ।
"नौकरी करूँगी ।जैसे यहाँ ठाठ से रहती हूं ,वैसे ही रहना चाहती हूँ ।ससुराल वाले मेरे नख़रें उठायेंगे ना ।मैं ख़ाना नही बना सकती,आता भी नही है ।"
बेला ने चमेली से कहा तो वह चौंक गई ।
"होंश में तो हैं ना रानी साहिबा, मुंगेरीलाल के हसीन सपने ना देखिये तुम्हारी भारभी ससुराल आते ही क्या रानी बन गई ? ससुराल के इस यज्ञ में शुरूआत में अरमानों की आहुति देना होती है।" चमेली अब समझदार सखी की भूमिका में आ गई,नवविवाहिता सखी ने अपनी समझदारी का परिचय दिया।
"तो क्या शादी के बाद ससुराल वालों के लिये जीना , लड़की की मजबूरी है मेरी अपनी जिंदगी नही है ।" बेला ने सखी से पूछ ही लिया ।
"होती है पर पहिले अपनों के मन में जगह बनाना पड़ती है, फिर अपने अरमान पूरे करने की बारी आती है । माता पिता तेरे नख़रें उठा सकते है ससुराल वाले उठाये ज़रूरी तो नही। घर की चाबी दुल्हन को उपहार में नही मिलती।" बेला सोच में पड़ गई जब चमेली ने कहा ।
"जो पौधे धारा के विपरीत बहते है, उन पर जड़ से उखड़ जाने का ख़तरा बना ही रहता है ।" समझ रही है ना सखी । "वे वक्त के बहाव के आगे दम तोड़ देते है।"
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(21). सुश्री जानकी वाही जी 
जले चावल

स्कूल में मध्याह्न का भोजन शुरू ही हुआ था कि शोर मचना शुरू हो गया ।
" अम्मा मुझे ,अम्मा मुझे।
" क्या हुआ ?" उर्मिला उठ कर देखने लगी
" मैडम जी ! कछु बड़ी बात नाही है।उ आज जरा चावल बर्तन से लग गया तो ये किरन और रजनी आपस में झगड़ने लगी।"
" मैं कुछ समझी नहीं ?"
" उ मैडम जी ! आज चावल कछु जल गया था वही निगोड़े खाने के मारे लड़ रयी हैं।यहाँ भरपेट खाने को मिल रहा फिर भी आदत तो कम और जले खाने की हो गई इन लड़किन को।"
" अरे ! इसमें लड़ना क्या और बड़ी अज़ीब बात है जला चावल खाने के लिए झगड़ा ? खीर के लिए लड़ती तो कोई बात थी ।कुछ पल सोचकर बोली
कौन -कौन जला चावल खाना पसन्द करता है ?"
सुनते ही चार-पांच हाथ खड़े हो गए पर वे सब लड़कियों के थे। जब से
उर्मिला इस स्कूल में आयी है उसने देखा पढ़ने और सीखने में लड़कियां आगे रही हैं।उसे तरस भी आता है इन पर। ये लड़कियां जानवर चराती, लकड़ी लाती ,पेड़ पर चढ़ चारा काटती ,घास काटती, चूल्हा चौका करती और अंत में बचा हुआ या जला खाना भी खाती हैं।कभी उफ़ नहीं करती हैं ।और पढ़ने की लौ भी जलाये रखती हैं।
" मैडम जी! ये लड़कियां जले चावल के लिए हमेशा मैं ...मैं... करती हैं, बकरियाँ कही की।"
लड़के बोले।ये सुन सारे बच्चे हँसने लगे।
उर्मिला ने सबको आँखें दिखाई।और बोली -
" हँसी आ रही है ना ? ये जला चावल खा कर भी पढ़ने में तुम लोगों से आगे हैं ।"
फिर भोजन माता को ठीक से चावल बनाने की हिदायत देकर वापस मुड़ी ही थी कि भोजन माता के बड़बड़ाने की आवाज़ सुनी।
" अम्मा ! कुछ कह रही हो तुम ?"
" कछु खास नहीं मैडम जी ! हम तो ये सोचत हैं।अगर माँ -बाप अपने लड़कन को हलवा पूरी की जगह जला चावल खिलात तो वो भी लड़किन नाई हुशियार हुई जात।"
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(22). श्री सतविन्द्र कुमार जी 
परम्परा
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धर्मबीर,एक छोटी-सी काश्त पर खेती करता था।पूरी गृहस्थी काश्त पर आधारित थी और काश्त साहूकार के रहमो-कर्म पर।फसल बेचने पर साहूकार बस हिसाब करके एक पर्ची धर्मबीर के हाथ में दे देता जिसमें हमेशा ही धर्मबीर का कर्ज बढ़ जाता।सूद और मूल का हिसाब हमेशा एक तरफा ही रहता।
धर्मबीर का बड़ा लड़का सतबीर उसके साथ खेती के काम में पूरा हाथ बँटाता था।वह एक मेधावी विद्यार्थी था।खानदान में वह पहला व्यक्ति था जिसने पाँचवी कक्षा के आगे पढ़ना जारी रखा।अब वह आठवीं में पढ़ता था और घर के हालात को भी समझने लगा था।उसके आग्रह पर धर्मबीर लेन-देन का हिसाब उससे लिखवाने लगा।अबकी बार फसल बेचने के बाद भी साहूकार ने हिसाब की पर्ची धर्मबीर को थमा दी।धर्मबीर ने सूद का दर सहित सतबीर से हिसाब करवाया तो सूद में बहुत बड़ा अंतर आ गया।बार-बार हिसाब जोड़ने पर यही अंतर आया तो सतबीर झट से बोला,"हर सीजन में यूँ कट रहे हैं,वह साहू सही हिसाब नहीं करता।"
धर्मबीर ,सतबीर को लेकर साहू के पास गया तथा पुनः हिसाब करने की बात कही।कहा कि हिसाब समझ नहीं आ रहा,लड़का कह रहा है।
कुटिल मुस्कान के साथ साहू ने सतबीर की और देखते हुए कहा,"क्या बात हुई बेटा?हिसाब तो हर बार की तरह सही है।कोई दिक्कत है तो मैं समझाए देता हूँ।"
साहू ने कई बार कोशिश की हिसाब को सही साबित करने की पर वह हर बार नाकाम रहा।झल्लाकर बोला,"भाई धर्मबीर!हम लोग एक दूसरे पर विश्वास करते रहे हैं।पीढ़ियों से अपना यह रिश्ता है।आधी रात को भी तुम्हें मना नहीं था।"
फिर सतबीर की ओर घूरते हुए,"अब तुम्हारा हमसे ही विश्वास उठ गया तो कैसे निभेगी?"
उसकी बात सुनकर धर्मबीर भी सतबीर की ओर ही घूरने लगा।
"सब हमेशा इसी धारा में बहेंगे,जरूरी तो नहीं।",बुदबुदाते हुए सतबीर चुपके से घर की ओर चल दिया।
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(23). श्री मुज़फ्फर इकबाल सिद्दीक़ी
साहस
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“रचना  ये बार-बार  तुम्हारा सर-सर करना मुझे पसन्द नहीं। जब हमारा डेजिगनेशन एक है, हम एक ही तरह का काम करते हैं तो फिर?
“नहीं विमल सरI”
“रचना तुम्हारी आज एनर्जी कहां गायब हो गई?"
"कुछ नहीं सर।"
"कुछ तो है"
“है तो बहुत कुछ, लेकिन आप सुन कर क्या करेंगे। आप को भी दुख होगा।“
“अरे! ऐसा क्या है?”
“सर, मे्रे लिये आज बहुत बड़ा दिन है। कोर्ट ने आज मुझे डिवोर्स दे दी।  मैं तो ग़ैर हाज़िर थी। दरअसल, चाहती मैं भी यही थी।“
फिर उसने भावना मेंं बहकर विमल को अपने पति के अवैध रिश्ते से लेकर उस पर् होने वाले हर अत्याचार का चिट्ठा खोल कर रख दिया।
"सो सॉरी रचना”
"नो सर! ये तो मेरी किस्मत में तय था। इसे होना ही था। इसे मैं अपनी ज़िन्दगी की एक दुर्घटना मानती हूँ। जिसमें, मेरी अपेक्षाओं, आकांक्षाओं, परिकल्पओं या यूँ कहें कि हर वह चीज़ जो मेरी ज़िन्दगी को चलाय मान बना सकती थी, उसका खून हुआ है।  केवल मैं बची हूँ, विडम्बना ये है कि मुझे जीना है। ठीक उस विकलांग की तरह जिसके हाथ पैर कट चुके होते हैं  और वह जीता है, ज़िन्दगी, कभी बैसाखियों के सहारे तो कभी ...लेकिन, मैं तो उससे भी बदतर हूँ क्योंकि उसके पास तो केवल हाथ पैर नहीं हैं। उसकी आशाएँ, अपेक्षाएं तो ज़िन्दा हैं। एक मैं हूँ मेरे पास सब कुछ है लेकिन उस दुर्घटना ने मेरे सपने चकना चूर कर दिये। जिनके सहारे जीवन गतिमान होता है। फिर भी मैं ज़िन्दा रहूंगी। मैं कायर नहीं हूँ कि डर जाऊं। मुझे देखना है एक इंसान बिना आशाओं के कैसे जी सकता है?"
विमल के दिल के किसी कोने में रचना की व्यथा ने एक जगह बना ली थी। उसने पूरे विश्वास से कहा:
“तुम जी सकती हो रचना, बेशक  तुम जी सकती हो। क्योंकि तुम्हारा साहस अभी ज़िंदा है।"
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(24). श्री गुरप्रीत सिंह जी 
धारा के विपरीत

दिल्ली शहर, नवम्बर 1984 के शुरुआती दिनों में से एक। चौक में कुछ रिक्शा वाले खड़े बतिया रहे हैं। तभी वहाँ एक घबराये और भयभीत सरदार जी अपनी पत्नी और दो नन्हे बच्चों के साथ आते हैं और एक रिक्शा वाले को कहीं चलने को बोलते हैंI, लेकिन वह मना कर देता है। जिस पर सरदार जी बाकी के रिक्शा चालकों तरफ़ मुड़ते है लेकिन उनके चेहरे पर लिखा जवाब पढ़कर तेज़ कदमों से वहाँ से चले जाते हैं।
“कहाँ जाने के लिए बोल रहा था?” साथ खड़े दूसरे रिक्शा वाले ने पूछा।
पहले ने जगह का नाम बताया, तो दूसरा बोला:
"ले जाता यार। बेचारे कहाँ भटकते फिरेंगे?"
“ना बाबा ना, मुझे तो डर लगता है। कौन जाने रास्ते में क्या हो जाए। कोई टोली मिल जाए ।
“लोगों के सर पर खून सवार हो रखा है आजकल" पहला बोला।
इस पर तब से चुप खड़ा तीसरा बोला:
"अरे इन लोगों के साथ ऐसा ही होना चाहिए। जानते हो न इन लोगों ने क्या किया हमारे साथ पंजाब में?"
“ऐसा मत बोलो भाई, इसमें इस बेचारे का क्या कसूर है? हम सब अब तक मिलजुल कर रहते रहे हैं। क्या ये एक घटना ही हमें अलग कर देगी?"
यह सुनकर चौथा बोला:
"तुझे इतनी हमदर्दी है तो तू ले जाता उनको, वो भी मुफ्त में।"
"क्या करूँ भाई, आजकल ऐसी हवा चल रही है कि चाह कर भी इनकी मदद नही कर सकता।“
उसकी बात अभी पूरी नहीँ हुई थी कि उन्होंने देखा कि चौक के दूसरे तरफ़ से एक तिलकधारी रिक्शावाला एक वृद्ध सिख दम्पत्ति को बिठाए हुए उनके सामने से गुज़र रहा थाI. यह दृश्य देखकर वे रिक्शाचालक एक दूसरे से नज़रें नहीँ मिला पा रहे थे।
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(25). सुश्री कल्पना भट्ट जी 
क़ैदी नम्बर 12

हाथों में हथकड़ी और पाँव में बेड़ी पहने उस क़ैदी ने जैसे ही जेल में प्रवेश किया तो सभी kकी आँखें फटी रह गईंII गोरा-चिट्टा, इकहरे बदन का लड़का जिसकी आयु 18-20 साल से अधिक नहीं होगी, उसे देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वह इतना बड़ा अपराधी होगा। जेल में हर उम्र के क़ैदी थे, सब के जुर्म भी अलग-अलग थे उसे बहुत उत्सुकता से देख रहे थे लेकिन एक बूढा कैदी एक कोने में चुपचाप बैठा हुआ था। उसी का मज़ाक उड़ाते हुए एक कैदी बोल पड़ा:
"ए लो दद्दा, तुम्हारा पोता भी आ गया।“
बूढ़े ने नए कैदी की ओर देखा और मुस्कराते हुए पूछा:
"ओह तो ये ही है क़ैदी नम्बर 12 जोकि एक खतरनाक आतंकवादी है।"
नए क़ैदी ने ठहाका लगाते हुए कहा:
"ओह! तो मेरी तारीफ़ मुझसे पहले ही यहाँ पहुँच गयी?"
बाक़ी सभी कैदी भी उसके ठहाके में शामिल हो गए पर बूढे क़ैदी की आँखों में आसूँ आ गए। उसने एक क़ैदी को सम्बोधित करते हुए कहा:
"सच कहते हो तुम, मेरे पोते जैसा ही हैं ये। वह भी अब इतना ही बड़ा हो गया होगा।“
“मेरे दादा जी की उम्र भी तुम्हारे जितनी ही होगीII” बूढ़े के पास बैठते हुए उसने कहाI.
“मगर ये तो बताओ तुम अपराध की दुनिया में आए कैसे?” एक अधेड़ क़ैदी ने उसके कंधे पर हाथ रहते हुए पूछाI
“मेरे पिता जी किसानो और मजदूरों के हक में लड़ा करते थे, अचानक उनकी हत्या कर दी गई.”
“क्या पुलिस ने कुछ नहीं किया?”I एक अन्य क़ैदी ने प्रश्न कियाI
“आतंकवादी बताकर, झूठे मुकाबले में उनकी जान पुलिस ने ही ली थीII”
“फिर क्या हुआ?” एक सामूहिक स्वर उभराI
“उग्रवादी की औलाद कहकर मुझे स्कूल से निकाल दिया गया. मेरी माँ बहुत गिड़गिड़ाई मगर किसी ने एक न सुनी” उसने एक ठण्डी आह भरते हुए उतर दियाI
“मगर तुमने किताबें छोड़ कर हथियार क्यों उठा लिए?” बूढ़े क़ैदी ने पूछाI
“इसलिए दद्दा, ताकि जो मेरे बाप के साथ हुआ और किसी के साथ न होI”
बूढ़े क़ैदी ने उसके सर पर हाथ रखते हुए कहा:
“मगर कभी ये भी सोचा कि अगर तुम्हें कुछ हो गया तो तुम्हारी विधवा माँ और बूढ़े दादा जी का क्या होगा?
क़ैदी नम्बर 12 अब मौन थाI
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(26). श्री विनय कुमार जी 
परिवर्तन
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"कब से चल रहा है ये सब इस घर में", कर्नल साहब गुस्से से आग बबूला हुए जा रहे थे|
सामने बैठे बेटे के चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगीं, वह कुछ कहने का साहस जुटा पाने में अपने आप को असमर्थ महसूस कर रहा था|
"बोलते क्यों नहीं, अब सांप सूंघ गया तुमको| कभी सोचा नहीं कि ऐसा करके अपने खानदान की प्रतिष्ठा को गर्त में ढकेल दोगे ", कर्नल साहब की ऑंखें अलमारी की तरफ बढ़ गयीं जहाँ पर रखे हुए तमाम मैडल उनके गौरवशाली अतीत को दर्शा रहे थे|
"पापा, जाने दीजिये, आखिर उसने गलत क्या किया है", बेटी ने हिम्मत दिखाई और पापा के सामने आ खड़ी हुई|
"तुम चुप रहो, तुमने तो अपने पिता की इज़्ज़त रखी है, किसी की भी परवाह न करके तुमने एयर फ़ोर्स में जाने का फैसला लिया| और एक ये हैं कि ?, कर्नल साहब फिर से गुस्से में उफन पड़े|
"वही तो मैं भी कह रही हूँ पिताजी, आखिर जब मैंने सबकी सोच के खिलाफ अपना करियर चुना तो आपको फ़क़्र हुआ था, तो आज इसको क्यों नहीं चुनने देते", बेटी ने उनको पीछे से पकड़ लिया|
कर्नल साहब कुछ नम्र हुए, बेटी का हाथ सहलाते हुए बोले "लेकिन बेटे, लोग क्या कहेंगे कि कर्नल का बेटा और ये कर रहा है"|
"पापा, लोगों की सोच पर अपने फैसले मत कीजिये, जैसे आपने मुझे अपना फील्ड चुनने दिया, उसी तरह इसको भी अपना करियर बनाने दीजिये", कह कर उसने पापा को एक बार फिर से प्यार से देखा|
"भाई कल से तुम अपने कत्थक गुरु को घर पर ही बुला लो और खूब जम कर प्रैक्टिस करो, पापा का नाम तुमको भी तो ऊँचा करना है", कहते हुए बेटी ने भाई को अपनी तरफ बुलाया|
कर्नल साहब के खुले बाँहों में दोनों बच्चे समां गए, किनारे खड़ी उनकी पत्नी की आँखों से ख़ुशी के कुछ बूंद टपक गए|
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(27). सुश्री अन्नपूर्णा वाजपेई जी  
बदली धारा

मंच पर काँपते हाथों से अवार्ड लेते समय सुधाकर जी की आँखों से दो बूंद ढुलक आये । उनसे अपने यहाँ तक के सफर के बाबत कुछ शब्द कहने को कहा गया तो रुँधे गले से बोलना शुरू किया ,' ये अवार्ड मेरी बहू को जाना चाहिए , आज यदि मैं यहाँ हूँ तो उसी के प्रयासों के बदौलत हूँ । काबिलियत सबमें होती है लेकिन परखने वाले जौहरी कम ही होते है वो जौहरी है मेरी बहू , मैं हमेशा उसमें कमियाँ देखता रहा । उसे हमेशा कमतर मानता रहा । मैं अपनी पत्नी के निधन के बाद बिखर सा गया था , जीवन जीने की इच्छा ही शेष न थी । इसने मुझे जीना सिखाया , मुझे आगे बढ़ाया । और आज जब यहाँ हूँ तो मुझे कोई ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि मेरी बहू मेरे घर का हीरा है । इसने हमेशा मेरा टूटा विश्वास सहेजा । इसलिए मैं अपनी बहू को बेटी से भी बढ़कर मानता हूँ । "
पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा । सकुचाई सी खड़ी बहू और ससुर दोनों की आंखे  बरस रही थी ।
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आ सर लघुकथा 23 की सफलता और इस संकलन के लिए हार्दिक बधाई । आपकी कथा का इंतज़ार रहा ... ।

हार्दिक आभार आ० कल्पना भट्ट जी. अति-व्यस्त होने के कारण इस बार रचना पोस्ट नहीं कर पाया.   

आदरणीय योगराज प्रभाकर जी आदाब,लघुकथा गोष्ठी23 के शानदार आयोजन के लिए हार्दिक बधाई ।

बहुत बहुत शुक्रिया आ० मोहम्मद आरिफ साहिब. 

हार्दिक बधाई आदरणीय योगराज प्रभाकर भाई जी ,ओ बी ओ लाइव लघुकथा गोष्ठी अंक-२३ के सफल आयोजन,त्वरित संपादन और संकलन हेतु।

हार्दिक आभार आ० तेजवीर सिंह जी. 

आदरणीय योगराज सर, "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-23 के सफल सञ्चालन व तीव्र संकलन की हार्दिक बधाई। सादर।

बहुत बहुत शुक्रिया भाई महेंद्र कुमार जी. 

आदरणीय योगराज सर लघु कथा गोष्ठी के अंक 23 की सभी चुनिंदा रचनाओं के संकलन के लिए हार्दिक बधाई सादर

हार्दिक आभार आ० डॉ आशुतोष मिश्रा जी. 

एक और सफल आयोजन व बेहतरीन संकलन हेतु आदरणीय मंच संचालक महोदय जनाब योगराज प्रभाकर जी और सभी सहभागी रचनाकारों को बहुत बहुत हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ। एक बार फिर मेरी रचना को स्थान देकर प्रोत्साहित करने के लिए तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया।
इस बार के आयोजन में कुछ बातें उल्लेखनीय रहीं, जैसे कि कुछ अंतराल के बाद कुछ रचनाकारों की बेहतरीन सहभागिता, नये सहभागियों की रचना सहित उपस्थिति और नये चौंका देने वाले सार्थक कथानकों पर बढ़िया रचनाएँ। सभी संबंधित रचनाकारों को सादर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।

हार्दिक आभार, आपने बिलकुल सही कहा, इस बार का आयोजन वाकई बहुत बढ़िया रहा भाई उस्मानी जी, हालाकि कई सदस्यों की अनुपस्थिति खलती रही.  

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